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बच्चों की कस्टडी में शैक्षणिक योग्यता के बजाय भावनात्मक सुरक्षा सर्वोपरि : कोर्ट
Mon, 06 Jul 2026 12:20 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
Updated Mon, 06 Jul 2026 12:20 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। जिला सत्र न्यायालय हमीरपुर ने बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता या आर्थिक स्थिति से अधिक बच्चे का कल्याण और उसकी भावनात्मक सुरक्षा सर्वोपरि है।
अदालत ने तीन साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने के एसीजेएम कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता की अपील खारिज कर दी।
बड़सर उपमंडल निवासी व्यक्ति ने 27 सितंबर, 2025 को लिए गए एसीजेएम कोर्ट हमीरपुर के फैसले को सत्र न्यायालय में चुनौती दी थी। मामले में पति-पत्नी के दो बच्चे हैं, जिनमें आठ साल का बेटा और तीन साल की बेटी शामिल हैं।
महिला ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि ससुराल में प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के कारण उसे 16 जनवरी, 2025 को घर छोड़कर सुजानपुर स्थित अपने मायके में शरण लेनी पड़ी।
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इसके साथ ही धारा 21 के तहत दोनों बच्चों की अंतरिम कस्टडी की मांग की गई थी। 27 सितंबर, 2025 को एसीजेएम कोर्ट ने तीन साल की बेटी की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का आदेश दिया था, जबकि आठ साल का बेटा पिता के पास ही रहने दिया गया।
इसी आदेश के खिलाफ पति ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। पति ने तर्क दिया कि वह एलएलएम और एमबीए डिग्रीधारी है तथा आर्थिक रूप से अधिक सक्षम होने के कारण बच्चों के भविष्य और शिक्षा को बेहतर ढंग से संभाल सकता है, जबकि पत्नी मैट्रिक पास है।
सत्र न्यायाधीश पंकज शर्मा ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि केवल शैक्षणिक योग्यता या आर्थिक स्थिति बच्चे की कस्टडी का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने टिप्पणी की कि आर्थिक संपन्नता उस भावनात्मक सुरक्षा और मातृत्व स्नेह का विकल्प नहीं बन सकती, जिसकी जरूरत एक छोटी बच्ची को होती है।
अदालत ने बड़े बेटे की कस्टडी में कोई बदलाव नहीं किया और पिता को यह छूट दी कि बच्ची के पांच वर्ष की आयु पूरी होने के बाद वह कस्टडी बहाली के लिए कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं। दोनों पक्षों को 27 अगस्त, 2026 को निचली अदालत में पेश होने के निर्देश दिए गए हैं, जहां मुख्य मामले की सुनवाई चल रही है।
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हमीरपुर। जिला सत्र न्यायालय हमीरपुर ने बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता या आर्थिक स्थिति से अधिक बच्चे का कल्याण और उसकी भावनात्मक सुरक्षा सर्वोपरि है।
अदालत ने तीन साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने के एसीजेएम कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता की अपील खारिज कर दी।
बड़सर उपमंडल निवासी व्यक्ति ने 27 सितंबर, 2025 को लिए गए एसीजेएम कोर्ट हमीरपुर के फैसले को सत्र न्यायालय में चुनौती दी थी। मामले में पति-पत्नी के दो बच्चे हैं, जिनमें आठ साल का बेटा और तीन साल की बेटी शामिल हैं।
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महिला ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि ससुराल में प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के कारण उसे 16 जनवरी, 2025 को घर छोड़कर सुजानपुर स्थित अपने मायके में शरण लेनी पड़ी।
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इसके साथ ही धारा 21 के तहत दोनों बच्चों की अंतरिम कस्टडी की मांग की गई थी। 27 सितंबर, 2025 को एसीजेएम कोर्ट ने तीन साल की बेटी की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का आदेश दिया था, जबकि आठ साल का बेटा पिता के पास ही रहने दिया गया।
इसी आदेश के खिलाफ पति ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। पति ने तर्क दिया कि वह एलएलएम और एमबीए डिग्रीधारी है तथा आर्थिक रूप से अधिक सक्षम होने के कारण बच्चों के भविष्य और शिक्षा को बेहतर ढंग से संभाल सकता है, जबकि पत्नी मैट्रिक पास है।
सत्र न्यायाधीश पंकज शर्मा ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि केवल शैक्षणिक योग्यता या आर्थिक स्थिति बच्चे की कस्टडी का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने टिप्पणी की कि आर्थिक संपन्नता उस भावनात्मक सुरक्षा और मातृत्व स्नेह का विकल्प नहीं बन सकती, जिसकी जरूरत एक छोटी बच्ची को होती है।
अदालत ने बड़े बेटे की कस्टडी में कोई बदलाव नहीं किया और पिता को यह छूट दी कि बच्ची के पांच वर्ष की आयु पूरी होने के बाद वह कस्टडी बहाली के लिए कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं। दोनों पक्षों को 27 अगस्त, 2026 को निचली अदालत में पेश होने के निर्देश दिए गए हैं, जहां मुख्य मामले की सुनवाई चल रही है।