ब्रिटिश शासनकाल में बड़ोग रेलवे स्टेशन पर तैयार होती थी बिजली
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कालका-शिमला रेललाइन के बड़ोग स्टेशन पर अंग्रेजों ने सबसे पहले बिजली तैयार करना शुरू कर दिया था। इसमें अंग्रेज दो किलोवॉट बिजली तैयार करते थे। इसका खुलासा शुक्रवार को देर शाम अमर उजाला लाइव में बातचीत के दौरान बड़ोग स्टेशन प्रभारी ने किया। उन्होंने बताया कि बड़ोग स्टेशन पर भरपूर मात्रा में पानी है।
जब रेल लाइन का निर्माण हुआ था, कालका-शिमला रेलवे लाइन पर बड़ोग ऐसा स्टेशन था, जहां बिजली थी। इसमें अंग्रेज शासन के बड़े अधिकारी भी यहां ठहरने आते थे। उन्होंने बताया कि स्टेशन के समीप अभी भी विद्युत एकत्रित करने वाला कमरा भी है। हालांकि, विद्युत से संबंधित उपकरण अब नहीं रहे हैं, लेकिन जहां से विद्युत तैयार की जाती थी और उसके कंट्रोल के लिए बनाया गया कमरा अभी भी बड़ोग स्टेशन पर है।
शीशे की रोशनी से सुरंग में किया था कार्य
बड़ोग टनल विश्व की सबसे लंबी सीधी टनल है। इसकी दूरी 1143 मीटर है। टनल में घना अंधेरा है। इसमें विद्युत लाइट से भी ज्याद रोशनी नहीं होती है। टनल में कार्य के लिए सूर्य की रोशनी को शीशे से सुरंग के अंदर गुजारा जाता था। इसके बाद इसमें कार्य किया जाता था। शीशे से वर्तमान समय भी रोशनी कर कार्य किया जाता है। सुरंग में रेलवे विभाग की ओर से 56 लाइटें भी लगाई गई हैं।
दिल्ली पहुंचता था बड़ोग स्टेशन से पानी
बड़ोग रेलवे स्टेशन पर बहुत अधिक पानी है। इसमें मिनरल की बहुत अच्छी गुणवत्ता है। ब्रिटिश शासन काल के दौरान ब्रिटिश के बड़े अधिकारी ने यहां पर पेयजल के लिए टैंक का निर्माण भी किया था। यहां से ब्रिटिश के बड़े अधिकारियों को मटके में दिल्ली तक पानी पहुंचाया जाता था। सुरंग के अंदर भी 24 घंटे पानी टपकता रहता है। इसमें विभाग की ओर से पानी को स्टोर कर उसे रेल के जरिये अन्य स्टेशनों तक भी सप्लाई किया जाता है।
कालका-शिमला रेललाइन पर गिरा पेड़
कालका-शिमला रेलवे लाइन पर कुमारहट्टी के समीप शुक्रवार देर शाम एक पेड़ गिर गया। हालांकि, इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है। लॉकडाउन के चलते सभी ट्रेनें भी बंद हैं। इसमें सिर्फ एक विशेष ट्रेन कालका से शिमला तक सभी स्टेशनों को पानी देने के लिए आती है, लेकिन जब यह ट्रेन शुक्रवार को आई तो उससे पहले ही गिरे पेड़ को ट्रैक से हटा दिया था।
जानकारी के अनुसार कालक-शिमला की सभी ट्रेनों को बंद किया गया है, इसमें सिर्फ एक ट्रेन पानी की सप्लाई के लिए चलाई गई है। पेड़ गिरने के दौरान उक्त ट्रेन कालका में ही थी, जब तक ट्रेन कुमारहट्टी पहुंची इतने में रेल कर्मियों ने पेड़ को हटाकर रास्ता साफ कर दिया था।