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इस मेले में न्योते पर कोसों दूर से आते हैं देवता, 369 साल पहले शुरू हुई थी परंपरा

Fri, 20 Sep 2019 04:19 PM IST
Krishan Singh रोशन ठाकुर, अमर उजाला, कुल्लू
रोशन ठाकुर, अमर उजाला, कुल्लू Published by: Krishan Singh Updated Fri, 20 Sep 2019 04:19 PM IST
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Deities come from far at invitation in kullu dussehra the tradition started 369 years ago
कुल्लू दशहरा

कुल्लू दशहरा के लिए 369 साल पहले राजा जगत सिंह ने देवताओं को बुलाने के लिए न्योता देने की परंपरा शुरू की जो आज भी चली आ रही है। बिना न्योते के देवता अपने मूल स्थान से कदम नहीं उठाते।

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न्योते पर करीब 200 किलोमीटर तक पैदल यात्रा कर नदियों, जंगलों, पहाड़ों से होते हुए अठारह करड़ू की सोह ढालपुर पहुंचते हैं। सात दिनों में एक जगह पर 331 देवी-देवताओं के दर्शन के लिए करीब 10 लाख से ज्यादा लोग, देशी-विदेशी पर्यटक, शोधार्थी हाजिरी भरते हैं।
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वर्ष 1650 में तत्कालीन राजा जगत सिंह की ओर शुरू किया कुल्लू दशहरा कई परंपराओं और मान्यताओं को समेटे हुए है। 369 सालों से पहले राजवंश और अब प्रशासन हर बार 300 के करीब घाटी के देवी-देवताओं को दशहरे का न्योता देता आ रहा है। इस बार रिकॉर्ड 331 निमंत्रण दिए गए। इसमें 26 नए देवता भी शामिल हैं।
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इस न्योते के बिना देवता अपने मूल स्थान से कदम तक नहीं उठाते। भले ही कुल्लू के राजा जगत सिंह ने पंडित दुर्गादत्त की ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त होने के लिए अयोध्या से लाई भगवान रघुनाथ की मूर्तियों की पूजा के लिए दशहरा शुरू किया, लेकिन आज यह उत्सव देव-मानस मिलन के महाकुंभ में परिवर्तित हो गया है। 

दो सप्ताह पहले देवता प्रस्थान करना शुरू कर देते हैं

Deities come from far at invitation in kullu dussehra the tradition started 369 years ago

दशहरे से दो सप्ताह पहले खराहल, ऊझी, बंजार, सैंज घाटी के देवता प्रस्थान करना शुरू कर देते हैं। कई देवता अपने देवलुओं-कारिंदों के साथ 200 किलोमीटर तक पैदल यात्रा के दौरान उफनती नदियों, जंगलों, पहाड़ों से होते हुए अठारह करड़ू की साेह कुल्लू के ढालपुर पहुंचते हैं।

देवता सदियाें पुराने अपने रास्त्ााें से आते हैं। उनके विश्राम करने, रुकने, पानी पीने तक के स्थान तय हैं। धूप, बारिश हर मौसम में उनका आगमन नहीं रुकता। देवताओं के कारकून व देवलु दशहरा के सात दिनों तक अस्थायी शिविरों में तपस्वियाें की तरह रहते हैं।

कारकून कड़े देव नियमों से बंधे होते हैं। न बाहर जा सकते और न दूसरों का बना खाना खा सकते हैं। एक जगह पर 250 देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए रोजाना डेढ़ लाख लोग, देशी-विदेशी पर्यटक, शोधार्थी हाजिरी भरते हैं।

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