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पढ़िए, सब्जी मंडी में लूट पर क्या बोले डीसी साहब
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
Updated Thu, 13 Aug 2015 12:43 PM IST
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खेतों में खून पसीना बहाने के बाद भी किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिल रही। किसानों के लिए फसल की लागत निकालना तक मुश्किल हो गया है। नियंत्रण न होने से रिटेल में सब्जियां मनमाने दामों पर बेची जा रही हैं। उपभोक्ता महंगाई से परेशान हैं।
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मुनाफाखोर और बिचौलिये मालामाल हो रहे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि किसान खेती छोड़ने की सोचने लगे हैं। इन गंभीर हालातों में प्रशासन का पक्ष जानने के लिए बुधवार को ‘अमर उजाला’ ने उपायुक्त शिमला दिनेश मल्होत्रा से कुछ सीधे सवाल किए।
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प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश :
सवाल: रिटेल में कई गुना अधिक दामों पर सब्जियां बिक रही हैं, प्रशासन का कंट्रोल क्यों नहीं है?
जवाब: हर आदमी के पीछे एक पुलिस वाला नहीं लगाया जा सकता। कीमतें नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे मामलों में तीन फैक्टर काम करते हैं, सोसाइटी कंट्रोल, कंज्यूमर अवेयरनेस और प्रशासन का कंट्रोल। अकेले प्रशासन कुछ नहीं कर सकता।
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सवाल: प्रशासन ने रिटेल का लाभांश तय किया गया है, इसे लागू क्यों नही किया जा रहा?
जवाब: हमने सभी चीजों के रेट फिक्स किए हैं, मनमानी करने वालों के चालान किए जा रहे हैं। डीएफएसई दफ्तर नियमित तौर पर कार्यवाई कर रहा है। सवाल : किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिल रही, फसलें खेतों में सड़ रही हैं, ऐसा क्यों?
जवाब: कीमतें गिरना कोई नई बात नहीं है। बारिश में किसान सब्जियों को खेतों में नहीं रख सकते, सड़ने का खतरा रहता है। कंजप्शन कम और प्रोडक्शन ज्यादा होने से दिक्कत पैदा हुई है। बरसात में सब्जियों की यातायात सुविधा भी नहीं हो पाती।
सवाल: प्रभावित किसानों की सरकार कैसे मदद कर सकती है?
जवाब: ऐसे में सब्जियों की प्रोसेसिंग ही सबसे सही तरीका है। सरकार स्पेशल प्रोजेक्ट चला रही है, आधारभूत संरचना के लिए 50 फीसदी से भी अधिक सब्सिडी दी जा रही है। उम्मीद है मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए किसान प्रोसेसिंग की तरफ मुड़ेंगे।
सवाल: इस स्थिति में अब किसान घाटे से कैसे उबरेगा ?
जवाब: यह रियेलटी ऑफ लाइफ है। इंटेलिजेंट फार्मर अधिक फसल नहीं उगाएगा। जब दस टन फसल ही मार्केट में खप सकती है तो सौ टन लगाने का क्या मतलब। यह लर्निंग प्रोसेस है, सीखना तो पड़ेगा।