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छात्रवृत्ति घोटाला: पहले सेमेस्टर के एससी छात्र दूसरे में बना दिए एसटी
Mon, 26 Aug 2019 05:34 PM IST
Krishan Singh
देवेंद्र ठाकुर, अमर उजाला, शिमला
देवेंद्र ठाकुर, अमर उजाला, शिमला
Published by: Krishan Singh
Updated Mon, 26 Aug 2019 05:34 PM IST
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250 करोड़ के छात्रवृत्ति घोटाले की जांच में निजी शिक्षण संस्थानों का गड़बड़झाला और सामने आने लगा है। अभी तक की जांच में पता चला है कि कई निजी शिक्षण संस्थानों ने छात्रवृत्ति हड़पने के लिए फर्जी बैंक खातों के अलावा फर्जी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातीय प्रमाण पत्र भी बना डाले।
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हैरानी इस बात की है कि शिक्षण संस्थानों से जिस छात्र को पहले सेमेस्टर में एससी का दर्शाया था, उसे दूसरे सेमेस्टर में एसटी दर्शाकर लाखों की अतिरिक्त छात्रवृत्ति हड़प ली।
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एससी के विद्यार्थी को हर सेमेस्टर की करीब 37 हजार रुपये छात्रवृत्ति मिलती है, जबकि एसटी के विद्यार्थी को करीब एक लाख रुपये की छात्रवृत्ति दी जाती है। इसका लाभ उठाने के लिए निजी शिक्षण संस्थानों ने एससी वर्ग के कई छात्रों को एसटी बना दिया।
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बाकायदा फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कर दस्तावेजों के साथ संलग्न कर दिए गए। इन प्रमाण पत्रों को संबंधित क्षेत्रों के तहसीलदारों ने सीबीआई की जांच में फर्जी करार दिया।
हैरानी इस बात की है प्रारंभिक जांच में शिक्षा विभाग के कई अफसर और कर्मचारी भी इसकी जद में आ रहे हैं, क्योंकि शिक्षा विभाग की पकड़ में भी यह बता नहीं आई।
ऊना, बंगाणा और अंब के विद्यार्थियों को बना दिया एसटी
सीबीआई की अब तक की जांच में पता चला है कि ऊना के एक निजी कॉलेज ने लाखों की छात्रवृत्ति हड़पने के लिए ऊना, अंब और बंगाणा के विद्यार्थियों को अनुसूचित जनजाति का छात्र बना दिया। हालांकि, हिमाचल में अनुसूचित जनजाति का दर्जा किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा का भरमौर और पांगी के स्थायी निवासियों को ही मिलता है।
सभी विद्यार्थियों के एक क्रमांक संख्या के प्रमाणपत्र
केंद्रीय जांच एजेंसी की जांच में खुलासा हुआ है कि निजी शिक्षण संस्थान के ज्यादातर प्रमाणपत्र एक ही क्रमांक संख्या के थे। यानी एक ही प्रमाणपत्र में नाम और पता बदलकर उसका इस्तेमाल किया गया है। ऊना, बंगाणा और अंब के तहसीलदार से जब इस बारे में छानबीन की गई तो यह सभी फर्जी पाए गए।
सभी विद्यार्थियों के एक क्रमांक संख्या के प्रमाणपत्र
केंद्रीय जांच एजेंसी की जांच में खुलासा हुआ है कि निजी शिक्षण संस्थान के ज्यादातर प्रमाणपत्र एक ही क्रमांक संख्या के थे। यानी एक ही प्रमाणपत्र में नाम और पता बदलकर उसका इस्तेमाल किया गया है। ऊना, बंगाणा और अंब के तहसीलदार से जब इस बारे में छानबीन की गई तो यह सभी फर्जी पाए गए।