कोरोना का खौफ: क्राफ्ट पेपर मिलों ने बढ़ाए दाम, उद्योगों पर तालाबंदी की नौबत
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कोरोना वायरस का असर हिमाचल के उद्योगों पर पड़ने लगा है। चीन से आने वाले कच्चे माल की कमी ने फार्मा उद्योगों की कमर तोड़ दी है। अब पेपर के दामों में हुई बेतहाशा वृद्धि से पैकेजिंग गत्ता उद्योग के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो गया है। उत्तर भारत की पेपर मिलों ने कच्चे माल के रूप में प्रयोग होने वाले पेपर के दाम 25 फीसदी बढ़ा दिए हैं। इससे राज्य के लगभग 300 उद्योगों पर संकट पैदा हो गया है। प्रदेश में कुल पांच मिले हैं। ये राज्य के 15 हजार टन प्रति माह क्राफ्ट पेपर बनाती हैं। हिमाचल में क्राफ्ट पेपर की कुल खपत 60 हजार टन प्रतिमाह है। प्रदेश की पेपर मिलें राज्य की गत्ता उद्योगों की आपूर्ति पूरा नहीं कर पाती हैं। इसी का फायदा उठाकर और कोरोना वायरस की आड़ का हवाला देकर उत्तर भारत की पेपर मिलों ने ब्लेकमैलिंग शुरू कर दी है।
नुकसान में उद्योग को किया जा सकता है बंद : सुरेंद्र
प्रदेश कारोगेटिड बॉक्स मैन्युफैक्चर एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष सुरेंद्र जैन, महामंत्री विशाल गोयल व कोषाध्यक्ष संजीव जैन ने बताया कि यदि क्राफ्ट पेपर के रेटों में बढ़ोतरी होती रही और पेपर समय पर नहीं मिला तो उन्हें कुछ दिन के लिए उद्योग बंद करने पड़ेंगे। ग्राहक रेट बढ़ाने पर कोई बात नहीं कर रहे हैं। यदि रेट नहीं बढ़ पाए और हम नुकसान में काम करते रहे तो शायद उद्योग बंद ही करने पड़ेंगे। हिमाचल के उद्योगों को बचाने के लिए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर को सारी स्थिति से अवगत करवाने के लिए ई-मेल भेजी जाएगी।
कम लेबर से काम भी कम : हेमराज
बीबीएन गत्ता उद्योग प्रधान हेमराज चौधरी एवं महामंत्री अशोक राणा ने कहा कि कोरोना के संकट के समय लेबर बहुत कम आ रही है। इस स्थिति में फिर भी उद्योगों में उत्पादन को जारी रखा जा रहा है, क्योंकि पैकिंग के बिना कोई भी उत्पादन पूरा नहीं हो सकता। अगर यही स्थिति रही, उद्योग बंद होते हैं तो हिमाचल में गत्ते की कमी हो जाएगी।
कोरोना वायरस से संकट में हिमाचल का फार्मा उद्योग
कोरोना वायरस की बढ़ती दहशत के बीच हिमाचल प्रदेश के फार्मा उद्योग की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। लगातार बढ़ती विकट परिस्थितियों में उद्योग चौतरफा संकट में घिरता जा रहा है। कच्चे माल की कमी से फार्मा उद्योगों में उत्पादन लागत बढ़ गई है। तैयार माल निर्यात नहीं हो पा रहा है, साथ ही लगातार घटती मांग ने उद्योगों में उत्पादित माल की आपूर्ति भी प्रभावित कर दी है। तैयार और कच्चे माल को यहां से वहां लाने और ले जाने की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। इन हालातों में फार्मा उद्योग पर वित्तीय संकट के आसार भी बन गए हैं।
डिमांड हो गई कम
सीआईआई हिमाचल चैप्टर के अध्यक्ष हरीश अग्रवाल के अनुसार दवाओं का निर्यात बंद हो गया है। डिमांड भी कम हो गई है। उद्योगों को भुगतान नहीं हो रहा है। वित्तीय संकट के आसार बन गए हैं। हालात ऐसे ही रहे तो बेरोजगारी की समस्या बढ़ जाएगी और उद्योग जगत में भारी संकट छा जाएगा।
ब्लैक मार्केटिंग की वजह से दामों में उछाल
हिमाचल दवा निर्माता संघ के अध्यक्ष डॉ. राजेश गुप्ता ने कहा कि फार्मा उद्योगों के पास दो तीन माह का स्टॉक तैयार है। उत्पादन लागत में इजाफा हुआ है। कालाबाजारी से दामों में उछाल आया है।
10 से 15 फीसदी का असर
उत्तर भारत की बड़ी ट्रक यूनियनों में शुमार द ट्रक ऑपरेटर यूनियन नालागढ़ के प्रधान विद्या रतन चौधरी ने कहा कि दो दिनों में ही माल ढुलाई 10 से 15 फीसदी गिरी है। हालात इसी तरह से बने रहे तो और गिरावट आएगी। ऐसे में ऑपरेटरों और मालिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।