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Shimla News: सड़क के लिए अधिग्रहीत जमीन का दस लाख रुपये प्रति बीघा देना होगा मुआवजा

Thu, 29 Oct 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Thu, 29 Oct 2026 11:59 PM IST
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Compensation of ten lakh rupees per bigha must be paid for land acquired for the road.
जिला न्यायाधीश भुवनेश अवस्थी की अदालत ने सुनाया फैसला, प्रदेश सरकार को मुआवजा देने का आदेश
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26 साल पहले शुरू हुई थी जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया
रुचि सांख्यान
शिमला। राजधानी की अदालत ने शिमला बाईपास रोड के निर्माण के लिए अधिग्रहीत जमीन के मुआवजे को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जिला न्यायाधीश भुवनेश अवस्थी की अदालत ने संजौली निवासी अश्वनी कुमार की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए भूमि का बाजार मूल्य 25,000 रुपये प्रति बिस्वा यानी पांच लाख रुपये प्रति बीघा निर्धारित किया है।
इसके अलावा अदालत ने ग्रामीण क्षेत्र और राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना को ध्यान में रखते हुए दो का मल्टीप्लायर फैक्टर लागू किया और मुआवजे की दर बढ़ाकर 10 लाख रुपये प्रति बीघा करने के आदेश प्रदेश सरकार को दिए हैं। इसके साथ ही अदालत ने नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत याचिकाकर्ता को 100 प्रतिशत सोलैटियम (अतिरिक्त मुआवजा), 12 प्रतिशत वार्षिक अतिरिक्त राशि और 9 से 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देने का भी फैसला सुनाया। मामले के अनुसार संजौली बाजार निवासी अश्वनी कुमार की मौजा शेणन (तहसील शिमला ग्रामीण) स्थित खसरा नंबर 22 की 11 बिस्वा भूमि संजौली-शोघी बाईपास रोड के निर्माण के लिए अधिग्रहीत की थी। राज्य सरकार ने इसके लिए 24 अक्तूबर 1997 को धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद लैंड एक्विजिशन कलेक्टर विंटर फील्ड ने 3 अक्तूबर 2000 को अवार्ड नंबर 29/2000 पारित करते हुए मात्र 24,652.17 रुपये प्रति बीघा की दर से मुआवजा निर्धारित किया था।
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कलेक्टर द्वारा तय की मुआवजे की दर को अपर्याप्त बताते हुए भूमि मालिक ने अदालत में धारा 18 के तहत याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग से सटी हुई है और व्यावसायिक व आवासीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने साथ लगते मौजा सांगटी की सेल डीड का हवाला देते हुए बताया कि अधिसूचना जारी होने से ठीक पहले वहां चार बिस्वा जमीन एक लाख रुपये यानी 25,000 रुपये प्रति बिस्वा की दर से बेची गई थी।
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राजस्व श्रेणी पर नहीं कर सकते भेदभाव
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद प्रभावित भूमि मालिक को मुआवजे की एक भी पाई का भुगतान नहीं किया गया। ऐसे में वह 2013 के नए कानून के तहत मिलने वाले लाभों का हकदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उद्देश्य यानी सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे में उसकी राजस्व श्रेणी (घासनी या अन्य किस्म) के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसलिए पूरी अधिग्रहीत भूमि पर एक समान दर लागू होगी। अदालत ने संबंधित सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिए हैं कि यदि पहले कोई आंशिक राशि अदा की गई हो, तो उसे समायोजित करने के बाद शेष देय राशि की गणना कर याचिकाकर्ता को जल्द जारी की जाए।
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