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अब एमसी को नहीं मिलेगा मुफ्त पानी, देना होगा बिल
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नगर निगम कार्यालय समेत वार्ड दफ्तरों में होने वाली पेयजल खपत की होगी मीटर रीडिंग
साल 2018 में नगर निगम ने ही पेयजल व्यवस्था संभालने के लिए बनाई थी कंपनी
सार्वजनिक शौचालयों, पार्कों में सप्लाई होने वाली पानी की भी होगी रीडिंग, देंगे निशुल्क
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजधानी में सालों तक शहरवासियों से पेयजल बिल वसूलने वाले नगर निगम को अब खुद पानी के बिल चुकाने होंगे। साल 2018 में नगर निगम ने शहर की पेयजल व्यवस्था संभालने के लिए जिस कंपनी का गठन किया था, अब वही शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड कंपनी नगर निगम से बिल वसूल करेगी।
अभी तक निगम के दफ्तरों से पानी बिल नहीं लिया जाता। लेकिन अब नगर निगम कार्यालय समेत वार्ड दफ्तरों में होने वाली पेयजल खपत का बिल लिया जाएगा। कंपनी अपने दफ्तरों के भी बिल जारी करेगी। शहरवासियों की तरह इन दफ्तरों में लगे पेयजल मीटरों की रीडिंग करने के बाद कंपनी नगर निगम से बिल लेगी। हालांकि, शहर के सार्वजनिक शौचालयों और पार्कों को पहले की तरह निशुल्क पानी की सप्लाई दी जाएगी, लेकिन इनमें भी कितना पानी खर्च हो रहा है, उसकी निगरानी के लिए नियमित मीटर रीडिंग ली जाएगी। यदि किसी शौचालय में काफी ज्यादा पानी का खर्च हो रहा है, तो उसे चेक किया जाएगा। पेयजल कंपनी का कहना है कि शहर में पानी की बर्बादी रोकने और नॉन रेवेन्यू वाटर का रिकॉर्ड रखने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हाल ही में हुई सब कमेटी की बैठक में यह फैसला लिया गया है। इस कमेटी में स्वतंत्र निदेशक दिग्विजय चौहान, नगर निगम आयुक्त आशीष कोहली और एजीएम अनिल जसवाल सदस्य हैं।
कंपनी का तर्क, इसलिए जरूरी है बिलिंग
पेयजल कंपनी के अनुसार शहर में रोजाना औसतन 40 से 45 एमएलडी पानी की सप्लाई हो रही है। लेकिन इस पानी में सिर्फ 20 से 22 एमएलडी पानी की ही बिलिंग हो रही है। आधे से ज्यादा पानी कहां जा रहा है, उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। यदि पांच से सात एमएलडी पानी लीकेज में बह जाता है तो भी 12 से 15 एमएलडी पानी का कोई रिकॉर्ड नहीं है। विश्वबैंक की शर्तों के अनुसार करीब 80 फीसदी से अधिक पेयजल की बिलिंग होनी चाहिए। ऐसे में शहर में सप्लाई होने वाले पेयजल का रिकॉर्ड रखने के लिए कुछ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। जिन्हें निशुल्क पानी दिया जाएगा, उनका भी मीटर रीडिंग से खपत का पूरा रिकॉर्ड रखा जाएगा। इससे पानी की बर्बादी कम हो सकती है और शहर के उपभोक्ताओं को इसका फायदा हो सकता है।
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विरोध के बावजूद भाजपा ने बना दी थी कंपनी
साल 2018 में तत्कालीन महापौर कुसुम सदरेट की अध्यक्षता में नगर निगम सदन ने ही पेयजल कंपनी के गठन को मंजूरी दी थी। सदन में कांग्रेस और माकपा ने इसका कड़ा विरोध किया था। लेकिन सरकार के दबाव में भाजपा पार्षदों को दबी जुबान में इसका समर्थन करना पड़ा। कंपनी का गठन होने के बाद नगर निगम की पेयजल सप्लाई से होने वाली सालाना 16 करोड़ की आय बंद हो गई। पेयजल बिलों को लेकर अब भाजपा पार्षद ही ज्यादा परेशान हैं।
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साल 2018 में नगर निगम ने ही पेयजल व्यवस्था संभालने के लिए बनाई थी कंपनी
सार्वजनिक शौचालयों, पार्कों में सप्लाई होने वाली पानी की भी होगी रीडिंग, देंगे निशुल्क
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजधानी में सालों तक शहरवासियों से पेयजल बिल वसूलने वाले नगर निगम को अब खुद पानी के बिल चुकाने होंगे। साल 2018 में नगर निगम ने शहर की पेयजल व्यवस्था संभालने के लिए जिस कंपनी का गठन किया था, अब वही शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड कंपनी नगर निगम से बिल वसूल करेगी।
अभी तक निगम के दफ्तरों से पानी बिल नहीं लिया जाता। लेकिन अब नगर निगम कार्यालय समेत वार्ड दफ्तरों में होने वाली पेयजल खपत का बिल लिया जाएगा। कंपनी अपने दफ्तरों के भी बिल जारी करेगी। शहरवासियों की तरह इन दफ्तरों में लगे पेयजल मीटरों की रीडिंग करने के बाद कंपनी नगर निगम से बिल लेगी। हालांकि, शहर के सार्वजनिक शौचालयों और पार्कों को पहले की तरह निशुल्क पानी की सप्लाई दी जाएगी, लेकिन इनमें भी कितना पानी खर्च हो रहा है, उसकी निगरानी के लिए नियमित मीटर रीडिंग ली जाएगी। यदि किसी शौचालय में काफी ज्यादा पानी का खर्च हो रहा है, तो उसे चेक किया जाएगा। पेयजल कंपनी का कहना है कि शहर में पानी की बर्बादी रोकने और नॉन रेवेन्यू वाटर का रिकॉर्ड रखने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हाल ही में हुई सब कमेटी की बैठक में यह फैसला लिया गया है। इस कमेटी में स्वतंत्र निदेशक दिग्विजय चौहान, नगर निगम आयुक्त आशीष कोहली और एजीएम अनिल जसवाल सदस्य हैं।
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कंपनी का तर्क, इसलिए जरूरी है बिलिंग
पेयजल कंपनी के अनुसार शहर में रोजाना औसतन 40 से 45 एमएलडी पानी की सप्लाई हो रही है। लेकिन इस पानी में सिर्फ 20 से 22 एमएलडी पानी की ही बिलिंग हो रही है। आधे से ज्यादा पानी कहां जा रहा है, उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। यदि पांच से सात एमएलडी पानी लीकेज में बह जाता है तो भी 12 से 15 एमएलडी पानी का कोई रिकॉर्ड नहीं है। विश्वबैंक की शर्तों के अनुसार करीब 80 फीसदी से अधिक पेयजल की बिलिंग होनी चाहिए। ऐसे में शहर में सप्लाई होने वाले पेयजल का रिकॉर्ड रखने के लिए कुछ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। जिन्हें निशुल्क पानी दिया जाएगा, उनका भी मीटर रीडिंग से खपत का पूरा रिकॉर्ड रखा जाएगा। इससे पानी की बर्बादी कम हो सकती है और शहर के उपभोक्ताओं को इसका फायदा हो सकता है।
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विरोध के बावजूद भाजपा ने बना दी थी कंपनी
साल 2018 में तत्कालीन महापौर कुसुम सदरेट की अध्यक्षता में नगर निगम सदन ने ही पेयजल कंपनी के गठन को मंजूरी दी थी। सदन में कांग्रेस और माकपा ने इसका कड़ा विरोध किया था। लेकिन सरकार के दबाव में भाजपा पार्षदों को दबी जुबान में इसका समर्थन करना पड़ा। कंपनी का गठन होने के बाद नगर निगम की पेयजल सप्लाई से होने वाली सालाना 16 करोड़ की आय बंद हो गई। पेयजल बिलों को लेकर अब भाजपा पार्षद ही ज्यादा परेशान हैं।