{"_id":"58dea08b4f1c1bc20463f034","slug":"cag-report-reveals-illegal-construction-in-himachal-pradesh","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिमाचल में बार-बार पॉलिसी लाने से भी बढ़ा अवैध निर्माण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हिमाचल में बार-बार पॉलिसी लाने से भी बढ़ा अवैध निर्माण
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
Updated Sat, 01 Apr 2017 08:41 AM IST
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बार-बार रिटेंशन पॉलिसी लाने से सूबे में अवैध निर्माण बढ़ गया है। यह बात सीएजी ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में कही है। प्रधान महालेखाकार राममोहन जौहरी ने कहा कि सरकार 1997 से 2009 तक छह बार अवैध निर्माणों को राहत पहुंचाने के लिए रिटेंशन पॉलिसी ला चुकी है। सरकार की इसी नीति की वजह से प्रदेश में अवैध निर्माण की बाढ़ सी आ गई है। कैग ने वन भूमि पर बढ़ते अवैध कब्जों के लिए भी सरकार को जिम्मेदार माना है।
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आपदा प्रबंधन पर तत्परता को लेकर हुए ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रधान महालेखाकार ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। बताया कि ऑडिट के दौरान यह बात सामने आई कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की 2013 की एक असेसमेंट रिपोर्ट में भूकंप जैसी आपदा के समय करीब चौदह लाख लोगों के गंभीर घायल होने का अनुमान जताया था, लेकिन इस रिपोर्ट को राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में कभी पेश ही नहीं किया गया।
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शिमला के संजौली और कृष्णा नगर में भवन निर्माण में हुई नियमों की अनदेखी पर चिंता जताते हुए कहा कि भले ही इन्हें नियमित कर दिया जाए, लेकिन आपदा होने पर बचाव करने में सरकार को ही भारी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा। कहा कि शहरों में भले ही टीसीपी और नगर निगम जैसी कई संस्थाएं शहरीकरण को नियंत्रित करने के लिए हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों के निर्माणों पर सरकार का कोई भी नियंत्रण नहीं है।
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कहा कि गांवों में अब तक आपदा प्रबंधन कमेटी तक नहीं बन सकी है। वहीं, अब तक लाइफ लाइन इमारतों की भी क्लासिफकेशन नहीं किया जा सका है। इसके अलावा आग की स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश की 3243 ग्राम पंचायतों में से महज 24 ग्राम पंचायतों में फायर पोस्ट स्थापित हो सके हैं। रिपोर्ट के अनुसार 28 साल में प्रदेश सरकार वन भूमि की डिमार्केशन तक नहीं कर सकी। इस वजह से जमीन पर कब्जे अतिक्रमण कर दिया।
विशेष पथकर जमा न कराने पर परिवहन विभाग को 1.53 करोड़ का चूना
परिवहन निगम और निजी बस मालिकों की ओर से परिवहन विभाग में विशेष पथ कर जमा न कराने पर 1.53 करोड़ का चूना लगा है। यह मामला वर्ष 2011-16 का है। हिमाचल के रूटों पर बसें चलाने पर परिवहन निगम और निजी बस ऑपरेटरों को हर महीने विशेष पथ कर जमा कराना होता है।
विभाग की लापरवाही से न तो परिवहन निगम ने यह पैसा जमा कराया, न ही निजी ऑपरेटरों ने कर जमा कराने की हामी भरी। कैग रिपोर्ट के मुताबिक कर जमा न कराने पर उपभोक्ताओं को 25 फीसदी वार्षिक दर से राशि वसूल की जानी चाहिए, लेकिन विभाग ने ऐसा नहीं किया। विशेष पथकर में 15 बस परमिट को शामिल नहीं किया गया।
पैसा पड़ा रहा, नहीं बनाए पशु चिकित्सालय भवन
वर्ष 2011 से 2016 के बीच प्रदेश सरकार ने पशु चिकित्सालय भवनों का निर्माण नहीं किया। इन भवनों के निर्माण के लिए प्रदेश सरकार के पास 20.21 करोड़ था। भवन बनाने के लिए प्रदेश सरकार के पास दो साल का समय था, लेकिन सरकार इस पैसे को खर्च नहीं कर पाई।
सरकार ने केंद्र में जमा नहीं कराया पैसा
केबल कंपनियों की ओर से हिमाचल में सड़कों के किनारे खुदाई की। सरकार ने कंपनियों से पैसा वसूल कर यह राशि केंद्र पथ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में जमा नहीं कराई। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक यह राशि 117.20 करोड़ की है।
इसी तरह जुलाई 2011 में 6 राष्ट्रीय राजमार्गों के टू लेन का काम होना था। पैसा होने के बावजूद निर्धारित समय में यह राशि खर्च नहीं हो पाई। सड़कों में कार्य की गुणवत्ता सही न पाए जाने पर लोक निर्माण विभाग ने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
बिजली बोर्ड को 73 करोड़ के संभावित राजस्व की हानि
कैग रिपोर्ट के मुताबिक राज्य बिजली बोर्ड को साल 2015-16 में 73 करोड़ के संभावित राजस्व की हानि हुई है। बोर्ड ने निर्धारित समय में पुनर्गठित त्वरित विद्युत विकास एवं सुधार कार्यक्रम को पूरा नहीं किया। बोर्ड संविदाकारों से प्रवेश कर काटने में विफल रहा। सरकारी निर्देशों में निर्धारित राशि से कम राशि की बैंक प्रत्याभूति स्वीकृत करने और बार-बार की चूक के बावजूद उपचारात्मक कार्रवाई करने में विलंब से 18.64 करोड़ के विद्युत प्रभारों की वसूली में विफल रहा।
एक औद्योगिक उपभोक्ता को 39.49 लाख की वापसी पर देय साधारण ब्याज के स्थान पर मासिक चक्रवृद्धि आधार पर ब्याज का भुगतान करने के परिणामस्वरूप 1.24 करोड़ का अधिक भुगतान हुआ। बोलियों के गलत मूल्यांकन के चलते संविदाकार को 2.55 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान हुआ।
सामान्य ब्याज की गणना का प्रावधान ना होने से 1.44 करोड़ के ब्याज की अल्प वसूली हुई। एशियन विकास बैंक द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं को भारत सरकार द्वारा स्वीकृत की गई आबकारी शुल्क की छूट का दावा करने में विफलता के चलते 36.11 करोड़ के आबकारी शुल्क का परिहार्य भुगतान हुआ।
सीएजी रिपोर्ट ने खोली विभागीय अफसरों की कलई
हिमाचल प्रदेश विधानसभा के सदन में पेश की गई सीएजी रिपोर्ट में कई विभागों की कलई खुल गई। आडिट रिपोर्ट के अनुसार आबकारी एवं कराधान विभाग ने टोल बैरियरों के पट्टादारों से करीब 51.40 करोड़ की राशि वसूलने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं, कई व्यापारियों पर कम कर व गलत दर लगाने की वजह से राजस्व अर्जन में कमी आई। वहीं, एक व्यापारी ने 6.91 करोड़ के भुगतान लायक प्रवेश कर के बजाय महज 3.40 करोड़ का भुगतान किया लेकिन विभाग ने कोई रिकवरी नहीं की।
वहीं, 29 शराब लाइसेंस धारियों से 8.59 करोड़ की लाइसेंस फीस की कम वसूली की गई। इसके अलावा 451 बिक्री केंद्रों के लाइसेंस धारियों द्वारा 20 लाख प्रूफ लीटर शराब कम उठाने पर 5.34 करोड़ की अतिरिक्त फीस नहीं वसूली गई। विभाग ने केबल आपरेटरों पर मनोरंजन कर नहीं लगाया जिससे प्रदेश को 55 लाख के राजस्व का नुकसान हुआ। वहीं, भूमि लीज पर देते समय प्रावधानों का पालन कराने में विफल रहने की वजह से करीब 101 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ।
इसके अलावा 10 करोड़ के निर्मित ढांचे के लिए गलत बाजारी दर लगाने के कारण .79 करोड़ के स्टाम्प शुल्क एवं पंजीकरण फीस की अल्प वसूली हुई। वहीं, मोटर वाहन पंजीकरण और आबकारी एवं कराधान विभाग के अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी के चलते 84.90 करोड़ का कम राजस्व अर्जित हुआ।
इसके अलावा साल 2012-13 से 2014-15 के लिए 11018 वाहनों के संदर्भ में 4.09 करोड़ के टोकन टैक्स की न तो मांग की गई और न ही वाहन स्वामियों ने इसे जमा किया। विभिन्न स्टेज कैरिजों व परिवहन निगम से करीब 1.53 करोड़ का विशेष पथ कर नहीं वसूला गया।
वहीं, वन निगम ने रायल्टी के लिए गलत दरें लगा दी जिसकी वजह से 8.30 करोड़ की कम वसूली की गई। इसके अलावा परियोजना क्षेत्र में आने वाले 536 खड़े पेड़ों की 32.50 लाख की लागत को प्रयोक्ता एजेंसी से वसूल नहीं किया। साथ ही इमारती लकड़ी के 36 लाट्स की पटावधि को 17.20 लाख की विस्तार फीस की मांग किए बिना ही बढ़ा दिया।