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दिवाली के एक माह बाद यहां मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली

Sat, 22 Nov 2014 07:19 PM IST
Updated Sat, 22 Nov 2014 07:19 PM IST
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Budhi Diwali in sirmour paonta sahib.

हिमाचल के सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र की 125 पंचायतों में बूढ़ी दिवाली की तैयारियां हो चुकी हैं। यहां बूढ़ी दिवाली को ‘मशराली’ के नाम से मनाया जाता है। दिवाली के एक माह बाद अमावस्या को गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली को हर साल हर्षोल्लास एवं पारंपरिक तरीके के साथ मनाया जाता है। गिरिपार के अतिरिक्त शिमला जिला के कुछ गांव, उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र एवं कुल्लू जिला के निरमंड में भी बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है।

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ग्रामीण परोकड़िया गीत, विरह गीत भयूरी, रासा, नाटियां, स्वांग के साथ साथ हुड़क नृृत्य करके जश्न मनाते हैं। कुछ गांवों में बूड़ी दिवाली के त्यौहार पर बढ़ेचू नृत्य करने की परंपरा भी है जबकि कुछ गांव में अर्ध रात्रि के समय एक समुदाय के लोगों द्वारा बुड़ियात नृत्य करके देव परंपरा को निभाया जाता है।
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बूढ़ी दिवाली के उपलक्ष्य पर ग्रामीण पारंपरिक व्यंजन बनाने के अतिरिक्त आपस में सूखे व्यंजन मूड़ा, चिड़वा, शाकुली, अखरोट वितरित करके दिवाली की शुभकामनाएं देते हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय ग्रामीण द्वारा हारूल गीतों की ताल पर लोक नृत्य होता है। ग्रामीण इस त्यौहार पर अपनी बेटियों और बहनों को विशेष रूप से आमंत्रित करते हैं।
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लेट मिली थी भगवान श्रीराम के लौटने की खबर

Budhi Diwali in sirmour paonta sahib.

गिरिपार में किवदंति है भगवान राम के अयोध्या पहुंचने की खबर एक महीना देरी से मिली थी। इस कारण क्षेत्र के लोग अन्य क्षेत्रों की बजाय एक महीना बाद दिवाली की परंपरा का निर्वहन करते हैं। हालांकि मुख्य दिवाली यहां धूमधाम से मनाया जाती है। बूढ़ी दिवाली के दिन 22 नवंबर को शनैचरी अमावस्या होने से इस पर्व का महत्व और बढ़ गया है।

यहां बलिराज के दहन की प्रथा भी है। विशेषकर कौरव वंशज के लोगों द्वारा अमावस्या की आधी रात में पूरे गांव की मशाल के साथ परिक्रमा करके एक भव्य जलूस निकाला जाता है और बाद में गांव के सामूहिक स्थल पर एकत्रित घास, फूस तथा मक्की के टांडे में अग्नि देकर बलिराज दहन की परंपरा निभाई जाती है।

पांडव वंशज के लोग ब्रहृम मुहूर्त में बलिराज का दहन करते हैं। लोगों का विश्वास है कि अमावस्या की रात को मशाल जलूस निकालने से क्षेत्र में नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश नहीं होता और गांव में समृृद्धि के द्वार खुलते है।

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