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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Biological Diversity Act: Himachal High Court makes Ministry of Environment, Forests respondent, summons reply

जैविक विविधता अधिनियम: हिमाचल हाईकोर्ट ने पर्यावरण, वन मंत्रालय को बनाया प्रतिवादी, सचिव से जवाब तलब

Thu, 17 Aug 2023 05:50 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 17 Aug 2023 05:50 PM IST
सार

अदालत ने वन निगम की कार्यप्रणाली से असंतोष जताते हुए भारत के अटॉर्नी जनरल से पैरवी करने का आग्रह किया है। अदालत ने पर्यावरण और वन मंत्रालय को प्रतिवादी बनाते हुए सचिव से जवाब तलब किया है। 

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Biological Diversity Act: Himachal High Court makes Ministry of Environment, Forests respondent, summons reply
हिमाचल हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश जैविक विविधता अधिनियम-2002 के कार्यान्वयन को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। अदालत ने वन निगम की कार्यप्रणाली से असंतोष जताते हुए भारत के अटॉर्नी जनरल से पैरवी करने का आग्रह किया है। अदालत ने पर्यावरण और वन मंत्रालय को प्रतिवादी बनाते हुए सचिव से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 18 सितंबर को निर्धारित की है। हिमाचल प्रदेश जैविक विविधता अधिनियम के कार्यान्वयन में विफल रही सरकार और वन निगम के बाद अदालत ने भारत के सबसे बड़े न्यायवादी से इस मामले में पैरवी करने का आग्रह किया है। पीपल फॉर रिसपांसिबल गोर्वनैंस ने जैविक विविधता अधिनियम-2002 के कार्यान्वयन के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

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आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में पूरी तरह से विफल रही है। यह अधिनियम राज्य को स्वयं के जैविक संसाधनों का उपयोग करने के लिये उनके संप्रभु अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। अधिनियम ने जैव संसाधनों तक पहुंच और विनियमित करने के लिये त्रिस्तरीय संरचना का प्रावधान किया गया है। इसमें राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन किया गया है। पिछले आदेशों में अदालत ने वन, आयुष और कृषि विपणन बोर्ड को जैविक संसाधनों के इस्तेमाल के लिए जैविक बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने के आदेश दिए थे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि आयुर्वेदिक, सिद्धा, युनानी और होम्योपैथी दवाइयों को निर्यात परमिट जारी करने से पहले एनओसी जारी करेगा। अदालत को बताया गया था कि राज्य सरकार की ओर से संबंधित कंपनियों को जैविक विविधता अधिनियम की धारा-7 में नोटिस जारी किया जा रहा है।
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जबकि अधिनियम की धारा-23 और-24 में राज्य जैव विविधता बोर्ड से अनुमति लेने का प्रावधान है। यदि कोई कंपनी जैविक संसाधनों को बिना स्वीकृति से इस्तेमाल करती है तो उस स्थिति में अधिनियम की धारा-56 में एक लाख रुपये जुर्माने की सजा का प्रावधान है। याचिकाकर्ता ने अदालत को सुझाव दिया था कि राज्य सरकार की ओर से दिए जाने वाले नोटिस में ये सारे आदेश होने चाहिए। संबंधित कंपनियों को आदेश दिए जाए कि प्रदेश के जैविक संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिए राज्य जैव विविधता बोर्ड से स्वीकृति ली जाए। बता दें कि एनएचएआई की इंजीनियरिंग और किरतपुर-नेरचौक फोरलेन निर्माण के दौरान जंगलों में मलबा फेंकने के मामलों में अदालत ने अटॉर्नी जनरल से पैरवी करने का आग्रह किया है। एनएचएआई की ओर से जंगलों में फेंकने की लापरवाही और अवैज्ञानिक तरीके से सुरंगें और राजमार्ग बनाने के मामलों की सुनवाई 21 अगस्त को निर्धारित की गई है।
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