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आजादी का अमृत महोत्सव: कुल्लू घाटी में भाईचारे की मिसाल है जुआरी प्रथा

Tue, 14 Sep 2021 01:57 PM IST
अरविन्द ठाकुर अमर उजाला नेटवर्क, सैंज (कुल्लू)
अमर उजाला नेटवर्क, सैंज (कुल्लू) Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Tue, 14 Sep 2021 01:57 PM IST
सार

जरूरत के समय काम के बदले काम की यह अनोखी प्रथा कुल्लू जिला में आपसी भाईचारे की मिसाल है। इस प्रथा के तहत खेतीबाड़ी, घास व फसल कटाई और मकान बनाने का कार्य निशुल्क किया जाता है।

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azadi ka amrit mahotsav kullu valley story of Juari pratha
कुल्लू जिले के सैंज में जुआरी प्रथा के तहत खेतीबाड़ी का मिलकर काम करते हुए ग्रामीण। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आधुनिकता की चकाचौंध में कुल्लू जिला की सदियों पुरानी जुआरी प्रथा का प्रचलन कम हुआ है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में इस प्रथा के बिना गुजारा मुश्किल है। भौतिकवादी युग में घर और खेतों के काम के लिए अभी भी यहां पैसा मायने नहीं रखता। इस तरह के कारज के लिए सदियों से चली आ रही जुआरी प्रथा ही सबसे अधिक विश्वसनीय मानी जाती है। 

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जरूरत के समय काम के बदले काम की यह अनोखी प्रथा कुल्लू जिला में आपसी भाईचारे की मिसाल है। इस प्रथा के तहत खेतीबाड़ी, घास व फसल कटाई और मकान बनाने का कार्य निशुल्क किया जाता है। बुजुर्ग बताते हैं कि यह प्रथा कुल्लू घाटी में सदियों से चली आ रही है। शहरी इलाकों में जिन खेतों में काम करने और मकान बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, कुल्लू के ग्रामीण क्षेत्र में यह काम मुफ्त में करने की पुरानी प्रथा है।
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यहां देव कारज, शादी, समारोह आदि में भी जुआरी का आदान- प्रदान किया जाता है। महिलाएं एक-दूसरे की फसल और घाटी कटाई की जुआरी देती हैं, जबकि पुरुष देव कारज और मकान बनाने के लिए एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। 
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जुआरी की यह संख्या दस से 50  लोगों तक की होती है। 

पहले के मुकाबले कम प्रचलन
देवता शंगचुल महादेव के पुजारी जगदीश शर्मा और देवी दुर्गा के पुजारी ओम दत बताते हैं कि आपसी सहयोग से यहां कई गांव बसे हैं। कई घरों का निर्माण हुआ है और खेतों को उपजाऊ बनाया गया है। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में लोगों ने अब जमीन को वीरान छोड़ दिया है और जुआरी प्रथा का प्रचलन भी कम हुआ है।

लॉकडाउन ने लौटाई यह प्रथा
दो वर्षों से कोरोना वायरस के खतरे को लेकर लग रहे लॉकडाउन ने ग्रामीण क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाया है। बीते वर्ष लॉकडाउन के दौरान जैसे ही प्रशासन और सरकार ने कृषि और बागवानी कार्य करने के लिए छूट दी, वैसे ही ग्रामीणों ने अपने वर्षों से वीरान पड़े खेतों को उपजाऊ बनाने का काम शुरू कर दिया। उन खेतों की खुदाई कर संवारने के लिए जुआरे बुलाए गए। आपसी भाईचारे के तहत मकानों का निर्माण हुआ।


गाए जाते हैं पारपंरिक लोकगीत
कुल्लू घाटी में जुआरी के दौरान पारंपरिक लोकगीतों और लामणों को गाने का प्रचलन है। प्रसिद्ध रंगकर्मी केहर सिंह ठाकुर कहते हैं कि गीत गाने के पीछे मान्यता है कि इससे काम के दौरान मनोरंजन भी होता है और थकान भी महसूस नहीं होती। 

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