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Shimla News: बादल फटने की तबाही का सटीक आकलन करेगा एआई मॉडल
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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने किया तैयार, भविष्य में होने वाली घटनाओं से होगा बचाव
भवन क्षति पहचान में 95.34 प्रतिशत सटीकता
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने के बाद राहत एवं बचाव कार्यों की वैज्ञानिक योजना अब और अधिक सटीक हो सकेगी। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने ऐसा सत्यापित हाइड्रोडायनामिक मॉडल (एआई मॉडल) विकसित किया है, जो आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के प्रभावों का भवन स्तर पर आकलन करने में सक्षम है। यही नहीं इससे भविष्य के लिए ऐसी योजनाएं भी तैयार की जा सकेंगी जो बादल फटने की घटनाओं से होने वाले नुकसान से बचाएंगी।
सरकारी क्षति अभिलेखों के साथ तुलना में इस मॉडल ने भवन क्षति की पहचान में 95.34 प्रतिशत सटीकता हासिल की है, जिससे इसकी विश्वसनीयता प्रमाणित हुई है। यह अध्ययन एचपीयू के हिमालयन सेंटर फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड रेजिलिएंस (एचआईएम-डीआर) के उपनिदेशक डॉ. महेश शर्मा के नेतृत्व में किया गया। शोध दल में दिल्ली विश्वविद्यालय और इम्पीरियल कॉलेज लंदन के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने मंडी जिले के थुनाग में वर्ष 2025 में बादल फटने से आई फ्लैश फ्लड का डिजिटल पुनर्निर्माण कर मॉडल का परीक्षण किया। अध्ययन में नासा के जीपीएम-आईएमईआरजी उपग्रह वर्षा आंकड़ों, उच्च-रिजॉल्यूशन भू-भाग आंकड़ों, क्षेत्रीय सर्वेक्षण, आधिकारिक क्षति अभिलेखों तथा द्वि-आयामी एचईसी-आरएएस हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग को एकीकृत किया गया। इसके आधार पर बाढ़ के फैलाव, जलभराव की गहराई, प्रवाह वेग और प्रत्येक भवन पर संभावित प्रभाव का आकलन किया गया। मॉडल ने गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, आधारभूत ढांचे के जोखिम के मूल्यांकन और प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति के अनुमान में उच्च सटीकता प्रदर्शित की।
मंडी जिले के थुनाग गांव में वर्ष 2025 में बादल फटने से अचानक आई बाढ़ का आकलन शीर्षक से प्रकाशित यह शोध जुलाई में टेलर एंड फ्रांसिस की क्यू-एक श्रेणी की अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका जियोमैटिक्स, नेचुरल हैजर्ड्स एंड रिस्क में प्रकाशित हुआ है। एचपीयू के कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने इसे हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान बताया। इस अध्ययन का नेतृत्व एचआईएम-डीआर के उपनिदेशक डॉ. महेश शर्मा ने किया। उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस से पोस्टडॉक्टोरल अनुसंधान किया है। वह हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और आपदा लचीलापन (रेजिलिएंस) पर कार्य कर रहे हैं।
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संभावित खतरे से हो सकता है बचाव
हाइड्रोडायनामिक मॉडल विशेष रूप से डाटा की कमी वाले पर्वतीय क्षेत्रों को ध्यान में रखकर विकसित किया है। यदि इसे वास्तविक समय की वर्षा सूचना, मौसम पूर्वानुमान और वैज्ञानिक चेतावनी प्रणाली से जोड़ा जाए तो यह संभावित जलभराव वाले क्षेत्रों और संवेदनशील बस्तियों की पहले से पहचान कर सकता है। इससे निकासी योजना, आपातकालीन तैयारी, बाढ़ जोखिम मानचित्रण, महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा तथा दीर्घकालीन आपदा प्रबंधन रणनीति को वैज्ञानिक आधार मिलेगा और संभावित खतरे से बचा जा सकता है।
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भवन क्षति पहचान में 95.34 प्रतिशत सटीकता
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने के बाद राहत एवं बचाव कार्यों की वैज्ञानिक योजना अब और अधिक सटीक हो सकेगी। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने ऐसा सत्यापित हाइड्रोडायनामिक मॉडल (एआई मॉडल) विकसित किया है, जो आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के प्रभावों का भवन स्तर पर आकलन करने में सक्षम है। यही नहीं इससे भविष्य के लिए ऐसी योजनाएं भी तैयार की जा सकेंगी जो बादल फटने की घटनाओं से होने वाले नुकसान से बचाएंगी।
सरकारी क्षति अभिलेखों के साथ तुलना में इस मॉडल ने भवन क्षति की पहचान में 95.34 प्रतिशत सटीकता हासिल की है, जिससे इसकी विश्वसनीयता प्रमाणित हुई है। यह अध्ययन एचपीयू के हिमालयन सेंटर फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड रेजिलिएंस (एचआईएम-डीआर) के उपनिदेशक डॉ. महेश शर्मा के नेतृत्व में किया गया। शोध दल में दिल्ली विश्वविद्यालय और इम्पीरियल कॉलेज लंदन के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने मंडी जिले के थुनाग में वर्ष 2025 में बादल फटने से आई फ्लैश फ्लड का डिजिटल पुनर्निर्माण कर मॉडल का परीक्षण किया। अध्ययन में नासा के जीपीएम-आईएमईआरजी उपग्रह वर्षा आंकड़ों, उच्च-रिजॉल्यूशन भू-भाग आंकड़ों, क्षेत्रीय सर्वेक्षण, आधिकारिक क्षति अभिलेखों तथा द्वि-आयामी एचईसी-आरएएस हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग को एकीकृत किया गया। इसके आधार पर बाढ़ के फैलाव, जलभराव की गहराई, प्रवाह वेग और प्रत्येक भवन पर संभावित प्रभाव का आकलन किया गया। मॉडल ने गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, आधारभूत ढांचे के जोखिम के मूल्यांकन और प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति के अनुमान में उच्च सटीकता प्रदर्शित की।
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मंडी जिले के थुनाग गांव में वर्ष 2025 में बादल फटने से अचानक आई बाढ़ का आकलन शीर्षक से प्रकाशित यह शोध जुलाई में टेलर एंड फ्रांसिस की क्यू-एक श्रेणी की अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका जियोमैटिक्स, नेचुरल हैजर्ड्स एंड रिस्क में प्रकाशित हुआ है। एचपीयू के कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने इसे हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान बताया। इस अध्ययन का नेतृत्व एचआईएम-डीआर के उपनिदेशक डॉ. महेश शर्मा ने किया। उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस से पोस्टडॉक्टोरल अनुसंधान किया है। वह हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और आपदा लचीलापन (रेजिलिएंस) पर कार्य कर रहे हैं।
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संभावित खतरे से हो सकता है बचाव
हाइड्रोडायनामिक मॉडल विशेष रूप से डाटा की कमी वाले पर्वतीय क्षेत्रों को ध्यान में रखकर विकसित किया है। यदि इसे वास्तविक समय की वर्षा सूचना, मौसम पूर्वानुमान और वैज्ञानिक चेतावनी प्रणाली से जोड़ा जाए तो यह संभावित जलभराव वाले क्षेत्रों और संवेदनशील बस्तियों की पहले से पहचान कर सकता है। इससे निकासी योजना, आपातकालीन तैयारी, बाढ़ जोखिम मानचित्रण, महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा तथा दीर्घकालीन आपदा प्रबंधन रणनीति को वैज्ञानिक आधार मिलेगा और संभावित खतरे से बचा जा सकता है।