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Sumerpur Assembly Rajasthan: 1990 में पहली बार जीती BJP, 2013 से कांग्रेस का कब्जा, जानें इस सीट की पूरी गणित
Mon, 28 Aug 2023 12:52 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पाली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पाली
Published by: अरविंद कुमार
Updated Mon, 28 Aug 2023 12:52 PM IST
सार
राजस्थान में पाली जिले और नवगठित पाली संभाग में स्थित सुमेरपुर विधानसभा सिरोही जिले की सिरोही विधानसभा, जालोर जिले की आहोर विधानसभा सहित पाली जिले की पाली और बाली विधानसभा को छूती है। इसमें पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा जल स्त्रोत जवाई बांध स्थित है। इस बांध ने कई दशकों तक पाली और जोधपुर जिले की प्यास बुझााई है।
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मंशाराम परमार-बीजेपी, रंजू रामावत-कांग्रेस और हरिशंकर मेवाड़ा-कांग्रेस
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पाली जिले की सुमेरपुर विधानसभा क्षेत्र में साल 1962 से 2018 तक एक-एक बार स्वतंत्र पार्टी, जनता पार्टी, सात बार कांग्रेस और चार बार भारतीय जनता पार्टी विजयी रही है। साल 1990 में यहां पर पहली बार भाजपा का खाता उस वक्त खुला, जब यहां से भाजपा प्रत्याशी गुलाब सिंह राजपुरोहित जीतकर विधानसभा में पहुंचे।
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हालांकि, साल 1993 में कांग्रेस की बीना काक ने भाजपा से इस सीट को छीन लिया और इसके बाद साल 1998 में भी यहां से लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर विधानसभा में प्रवेश किया। इससे पहले साल 1985 में भी बीना काक यहां से कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल कर चुकी थी। इसके पश्चात साल 2003 में भाजपा के मदन राठौड़, साल 2008 में फिर से बीना काक, साल 2013 में फिर से मदन राठौड़ विधायक रहे।
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साल 2018 में भाजपा ने यहां से मदन राठौड़ को दोबारा टिकट न देकर जोराराम कुमावत पर दांव खेला और कुमावत ने यहां से जीत हासिल कर इस सीट को एक बार फिर भाजपा की झोली में डाल दिया। अब देखना यह है कि साल 2013 और 2018 से यहां काबिज भाजपा 2023 में इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रख पाती है या एक बार फिर यहां के मतदाता कांग्रेस प्रत्याशी को चुनते हैं।
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गजेंद्र सिंह राणावत-कांग्रेस, महेश परिहार-कांग्रेस, जोराराम कुमावत, मदन राठौड़-बीजेपी और पुष्प जैन-बीजेपी
सुमेरपुर विधानसभा चुनाव 2018 के परिणामों पर एक नजर
पाली जिले को पानी पिलाने वाली सुमेरपुर विधानसभा में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने साल 2018 में नए चेहरों पर दांव खेला था। इन चुनावों में भाजपा ने जहां पूर्व विधायक मदन राठौड़ का टिकट काटकर जोराराम कुमावत पर दांव खेला, तो कांग्रेस ने भी तीन बार मंत्री रह चुकी बीना काक का टिकट काटकर सिरोही जिले की रंजू रामावत को प्रत्याशी बनाया था। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने इन चुनावों में बाजी मारी और जोराराम कुमावत 42 हजार से अधिक मतों से विजयी हुए, जबकि रंजू रामावत को हार का सामना करना पड़ा। विधानसभा चुनाव 2023 के नवंबर में होने जा रहे विधानसभा चुनाव की दोनों ही दलों ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं, जिसके चलते दोनों दलों से पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने टिकट मांगना भी शुरू कर दिया है।
भाजपा से कांग्रेस में ज्यादा दावेदार
इस साल नवंबर महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अब यहां भी राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। दोनों ही दलों के नेतओं ने टिकट के लिए दावेदारी करना शुरू कर दिया है। भाजपा से वर्तमान विधायक जोराराम कुमावत, पूर्व विधायक मदन राठौड़, पूर्व सांसद पुष्प जैन, महावीर प्रसाद शर्मा, भाजपा जिलाध्यक्ष मंशाराम परमार, व्यापार प्रकोष्ठ जिला संयोजक दीपक भाटी, भाजपा जिला उपाध्यक्ष नारायण लाल कुमावत, प्रताप सिंह बिठिया, पूर्व जिलाध्यक्ष करण सिंह नेतरा, अनोप सिंह राठौड़, रविकांत रावल और महेंद्र माली सहित कई नेता टिकट की दौड़ में शामिल हैं।
कांग्रेस से टिकट की दौड़ में पूर्व विधानसभा प्रत्याशी रंजू रामावत, पूर्व काबिना मंत्री बीना काक, पूर्व सांसद बद्रीराम जाखड़ पाली, जिला परिषद सदस्य और पूर्व प्रधान हरिशंकर मेवाड़ा भागीरथ सिंह राजपुरोहित रावलवास, मोहन सिंह हेमावास, महेश परिहार सुमेरपुर, प्रकाश चौधरी खेतावास, सुभाष मेवाड़ा सुमेरपुर, राघव मदेरणा, ललकार सिंह, सुमेर सिंह मनवार, खूबचंद खत्री, महेश कुमार जोशी, जेसाराम देवासी रोजडा, वींजाराम मीणा गुडा एंदला, कमल किशोर राईका, करण सिंह चाणोद, इंद्र सिंह राजपुरोहित, पाबू सिंह राणावत खटुकडा, प्रेम सिंह राठौड़ मीठडी, चेतन प्रकार मीणा सुमेरपुर, सत्यप्रकाश पटेल तखतगढ़, जगदीश सिंह राजपुरोहित सुमेरपुर, कंचन परमार कोसेलाव, सुरेंद्र परमार कोसेलाव, शिशुपाल सिंह निंबाड़ा, गजेन्द्र सिंह राणावत, अरुण कुमार पांडे गुड़ा एंदला, प्रेमाराम देवासी नेतरा, यशपाल सिंह कुंपावत, गोवर्धन देवासी भांगेशर, हर्षद देवड़ा, पीसीसी सचिव भूराराम सीरवी और पूर्व यूथ जिलाध्यक्ष जगदीश राजपुरोहित सहित कई नेता शामिल हैं।
जीत के समीकरण
जो पार्टी स्थानीय और ओबीसी प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारेगी, उसका पलड़ा भारी रहेगा और यदि दोनों ही पार्टियां इस बात को ध्यान में रखकर प्रत्याशी का चयन करेंगी तो कड़े मुकाबले की स्थिति पैदा हो सकती है।