बहुमत बचाने को सीएम गहलोत ने बदली विधायकों की जगह, लेकिन अदालत दे सकती है झटका
राजस्थान में बीते 22 दिन से चल रहे सियासी घमासान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खेमे के विधायकों को जयपुर से जैसलमेर पहुंचा दिया गया। ये विधायक विधानसभा सत्र शुरू होने तक यानी 14 अगस्त तक जैसलमेर में ही रहेंगे। सदन में अपना बहुमत सुरक्षित रखने की कोशिश के तहत मुख्यमंत्री गहलोत ने यह कदम उठाया, लेकिन जिन बसपा विधायकों को वह कांग्रेस के समर्थन में लाए थे उनका मामला राज्य के उच्च न्यायालय में पहुंच गया है।
बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय को चुनौती देते हुए भाजपा के विधायक मदन दिलावर और बसपा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अदालत ने इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष और सचिव के साथ बसपा के छहों विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और 11 अगस्त तक जवाब मांगा है। अब ऐसे में अगर अदालत का फैसला बसपा विधायकों के खिलाफ रहता है तो गहलोत सरकार पर संकट के बादल फिर बन सकते हैं।
बहुमत के दावे पर पानी फेर सकता है हाईकोर्ट
हालांकि, मुख्यमंत्री गहलोत का दावा है कि उनकी सरकार पर कोई संकट नहीं है। उन्होंने 102 विधायकों के साथ होने की बात कही है। लेकिन इसमें पेच यह है कि इन 102 विधायकों में विधानसभा स्पीकर भी शामिल हैं और वह तब तक वोट नहीं कर सकते जब तक दोनों पक्षों की ओर से वोट बराबर न पड़ें। दूसरी ओर कांग्रेस के विधायक भंवरलाल हैं जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। फ्लोर टेस्ट के दौरान उनका मौजूद रहना मुश्किल है।
फैसला आने तक न करने दिया जाए वोट : बसपा
वहीं, अपने विधायकों के कांग्रेस में विलय से नाराज बसपा ने अदालत से गुरुवार को अपील की थी कि जब तक इन विधायकों को लेकर कोई फैसला नहीं आ जाता है, तब तक इन्हें फ्लोर टेस्ट में किसी भी पार्टी के पक्ष में मतदान करने पर रोक लगाई जाए। राज्य के सदन में सदस्यों की संख्या 200 है और बहुमत के लिए 101 सदस्य जरूरी हैं। कांग्रेस के पास बसपा विधायकों को मिलाकर कुल 81 विधायक हैं और 14 अन्य पार्टियों के और निर्दलीय विधायक हैं।
बसपा के इन विधायकों ने थामा था कांग्रेस का हाथ
संदीप यादव, वाजिब अली, दीपचंद खेरिया, लखन मीणा, जोगेंद्र अवाना और राजेंद्र गुढ़ा ने साल 2018 में विधानसभा चुनाव बसपा के टिकट पर जीता था। ये सभी विधायक सितंबर 2019 में बसपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय से अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार को मजबूती मिली थी, क्योंकि 200 सदस्यीय सदन में सत्तारूढ़ दल के विधायकों की संख्या बढ़कर 107 हो गई थी।
14 अगस्त को आयोजित होगा विधानसभा का सत्र
विधानसभा सत्र के आयोजन को लेकर राज्य सरकार और राज्यपाल कलराज मिश्र के बीच चले 'युद्ध' के बाद अंतत: इसे 14 अगस्त से बुलाया जाना तय हुआ है। राज्यपाल ने इसे लेकर राज्य सरकार के प्रस्तावों को कई बार वापस कर दिया था। सीएम गहलोत ने इसे लेकर राज्यपाल पर केंद्र सरकार के दबाव में काम करने का भी आरोप लगाया था। हालांकि, राज्यपाल ने कहा था कि उन्होंने राज्य सरकार को सांविधानिक निर्देशों का पालन करने का ही निर्देश दिया था।
सब ठीक है तो विधायकों की बाड़ेबंदी क्यों : भाजपा
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने कांग्रेस के अशोक गहलोत खेमे के विधायकों को जैसलमेर ले जाए जाने पर कटाक्ष करते हुए शुक्रवार को कहा कि जब पार्टी के सभी विधायक एकजुट हैं तो बाड़ेबंदी किसलिए की जा रही है? पूनिया ने ट्वीट किया, ‘सब एक हैं, कोई खतरा नहीं है, लोकतंत्र है, सब ठीक है तो बाड़ाबंदी क्यों? और बिकाऊ कौन है? उनके नाम सार्वजनिक करो; बाड़े में भी अविश्वास! जयपुर से जैसलमेर के बाद आगे तो पाकिस्तान है।’