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राजस्थान टिकट बंटवारे में वसुंधरा राजे की चली है या बस ऐसा लग रहा है?

Tue, 13 Nov 2018 12:35 PM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 13 Nov 2018 12:35 PM IST
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Rajasthan assembly elections vasundhara raje trumped amit shah ticket distribution
अमित शाह, वसुंधरा राजे
जब राजस्थान चुनाव के लिए 200 में से 131 टिकटों की भाजपा उम्मीदवारों की सूची बाहर आई तो उस पर दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे बस एक मुहर लगी थी--वसुंधरा राजे। इस सूची ने साफ कर दिया कि भले पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और सीएम वसुंधरा राजे के बीच अनबन की, मन-मुटाव की, बिगड़ते रिश्तों की बातें हवा में उठी हों लेकिन अंत में वसुंधरा अपने मन की मनवाने में कामयाब रहीं। 
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131 की सूची में से 85 मौजूदा विधायक चुनावी मैदान में एक बार फिर खम ठोकते दिखेंगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजे चाहती थीं कि जिन विधायकों की ताकत पर सवार होकर उन्होंने 2013 मे सत्ता हासिल की थी, उन्हें टिकट देने में बिल्कुल आनाकानी न की जाए। जब भी उनकी, केंद्रीय नेतृत्व से ठनी, ये विधायक उनके समर्थन में लामबंद हो गए। 
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सर्वे का क्या हुआ?

राजस्थान में एक सर्वे को लेकर बड़ी चर्चा हुई। खबरों की मानें तो शाह चाहते थे कि पार्टी के इसी सर्वे के आधार पर टिकट बांटे जाएं। सर्वे की रिपोर्ट 50 से ज्यादा विधायकों के हक में नहीं थी। अगर अमित शाह की चलती तो इस सूची में कई नाम नजर नहीं आते। लेकिन रविवार शाम भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक बिना किसी हील हुज्जत के ढाई घंटे में निपट गई और 131 उम्मीदवारों की सूची जारी हो गई।
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ये सूची जब बाहर आई तो हर कोई समझ गया कि वसुंधरा ने राउंड 1 में जीत हासिल कर ली है। यानी वो कमोबेश अपनी पसंद के उम्मीदवारों को टिकट दिलवाने में कामयाब रही हैं। कुछ नामों को अमित शाह का नेतृत्व खारिज करना चाहता था लेकिन माना जा रहा है कि राजे ने बगावत का डर दिखाकर आलाकमान को उन नामों को शामिल करने पर राजी कर लिया। 

इससे पहले प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी राजे का केंद्रीय नेतृत्व से टकराव हो चुका है। उपचुनाव के बाद तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी ने इस्तीफा दे दिया था। दिल्ली नेतृत्व उनकी जगह गजेंद्र सिंह शेखावत को काबिज करना चाहता था लेकिन राजे ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया। अंत में बाद मदन लाल सैनी पर जाकर बनी। 

इस बार बाड़मेर से सांसद कर्नल सोनाराम विधानसभा चुनाव के मैदान में होंगे। वो राजे के करीबी माने जाते हैं। 2014 में वो सोनाराम ही थे जिनके हाथों जसवंत सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा मदन दिलावर और जोगेश्वर गर्ग 10 साल बाद चुनावी मैदान में वापसी करेंगे।

अमित शाह ने 2019 की सोच कर बरती नरमी?

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अमित शाह
अमित शाह पर राजे ने रणनीतिक जीत हासिल की है या शाह ने उन्हें फिलहाल छोड़ दिया है, ये समझें उससे पहले जरा कुछ वक्त पीछे लौटिए। अलवर और अजमेर के उपचुनाव में पार्टी को मुंह की खानी पड़ी थी। इन दोनों लोकसभा सीटों के तहत आने वाली सभी 16 विधानसभाओं पर पार्टी पिट गई। तब राजे को हटाने को लेकर काफी शोर उठा।

'मोदी तुझसे बैर नहीं, रानी तेरी खैर नहीं' जैसे नारों में राजे के खिलाफ बनता मूड दिखने लगा। लेकिन वो किसी तरह कुर्सी बचाने में कामयाब रहीं। अब, आज पर आते हैं। माना जा रहा है कि अमित शाह जानबूझकर, राजे को अपनी मनमानी करने दे रहे हैं। इसकी दो वजह हो सकती हैं।

एक, राजस्थान में जनता हर चुनाव में सत्ताधारी पार्टी बदल देती है। इस बार भी आसार हैं कि लोग कांग्रेस को मौका दे सकते हैं। ऐसे में अगर भाजपा को हार का सामना करना पड़ता है तो जिम्मेदारी भी राजे की होगी, शाह की नहीं। क्योंकि कहा जाएगा कि टिकट बंटवारे में उन्हीं की चली है। 

दूसरी वजह 2019 लोकसभा चुनाव पर नजर हो सकती है। राजे की मनमानी के बाद हार की सूरत में 2019 लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका काफी सिमट जाएगी। शाह जिसको चाहेंगे, उसी को सूबे की 25 सीटों के लिए चुना जाएगा। वो 25 सीटें जिन पर 2014 में पार्टी ने क्लीन स्वीप किया था।

फिलहाल तो जिस तरह से पहली सूची में राजे की चली है, माना जा रहा है कि दूसरी लिस्ट पर भी वसुंधरा राजे की ही मुहर होगी। राजस्थान में 7 दिसंबर को मतदान होगा।
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