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Navratri 2024: नवरात्रि के पहले दिन ईडाणा माता का अग्नि स्नान, आग लगने के निशान नहीं मिलते, वैज्ञानिक भी हैरान

Tue, 09 Apr 2024 03:45 PM IST
उदित दीक्षित न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर Published by: उदित दीक्षित Updated Tue, 09 Apr 2024 03:45 PM IST
सार

Navratri 2024: ईडाणा माता मंदिर में आग लगने का समय और दिन निर्धारित नहीं है। साल में पड़ने वाली दोनों नवरात्रि में किसी भी दिन और किसी भी समय मंदिर आग की लपटों से भर जाता है। मंगलवार को नवरात्रि की शुरुआत के पहले दिन ही ईडाणा माता ने अग्नि स्नान किया।  

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Navratri 2024: Jodhpur Idana Mata took fire bath on the first day of Navratri
ईडाणा माता ने किया अग्नि स्नान। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नवरात्रि शुरू होने के साथ ही देशभर में देवी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया है। देवी मां के भक्तों की भीड़ मंदिरों में पूजा अर्चना करने के लिए उमड़ रही है। राजस्थान के जोधपुर जिले के मेहरानगढ़ में ऐतिहासिक ईडाणा माता मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा अजीत सिंह ने करवाया था। 

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इस मंदिर की सबसे विशेष बात है कि साल में आने वालीं दोनों नवरात्रि में मां ईडाणा अग्नि स्नान करती हैं। इस दौरान मंदिर धू-धू कर जलने लगता है। करीब दो किमी दूर से आग की लपटें दिखाई देती हैं। कुछ देर बाद आग अपने आप शांत हो जाती है। आग बुझने पर देवी मां के अंग वस्त्र, पर्दे और पूजन सामग्री पूरी तरह सुरक्षित मिलती है। मंदिर में आग लगने का समय और दिन निर्धारित नहीं है। साल में पड़ने वाली दोनों नवरात्रि में किसी भी दिन और किसी भी समय मंदिर आग की लपटों से भर जाता है। मंगलवार को नवरात्रि की शुरुआत के पहले दिन ही मां ईडाणा ने अग्नि स्नान किया।  
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भारत-पाकिस्तान युद्ध में मां चामुंडा ने बम को फटने से रोका 
मान्यता है कि साल 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जोधपुर पर गिरे बम को मां ईडाणा ने अपने अंचल का कवच पहना दिया था। इससे  एक भी बम नहीं फटा और लोगों की जान बच गई। लोगों का मानना है कि देवी मां ने अपने हाथों से बम को फटने से रोका था। इस कारण हर साल घरों के बाहर मेहंदी के हाथ जाते हैं। 9 अगस्त 1857 को गोपाल पोल के पास बारूद के ढेर पर बिजली गिरी, जिससे मां चामुंडा मंदिर कण-कण होकर उड़ गया। लेकिन, मां की प्रतिमा को कोई भी नुकसान नहीं हुआ।  
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हजारों साल पुरानी है मां की प्रतिमा
मंदिर स्थापित माता की प्रतिमा हजारों साल पुरानी है। पहले यह प्रतिमा जोधपुर के पास स्थित मंडोर रियासत के किले में स्थापित थी। माना जाता है कि जोधपुर के शासक राव जोधा ने परिहार वंश में विवाह किया और उन्हें दहेज में मंडोर रियासत मिली। इसके बाद मां की मूर्ति को मेहरानगढ़ किले में स्थापित किया गया।


बताया जाता है कि मां चामुंडा देवी को इससे पहले मंडोर के परिहारों की कुल देवी के रूप में पूजा जाता था। राठौड़ वंश की कुल देवी नागणेच्या माता थी। जोधपुर में स्थापित करने के बाद चामुंडा माता को मारवाड़ के शासक ने अपनी कुल देवी के रूप में स्वीकार किया। वर्ष 1460 ई. में माता की मूर्ति मेहरानगढ़ में लाई गई थी। 561 वर्ष पहले मेहरानगढ़ के निर्माण के साथ किले के दक्षिणी छोर के तलहटी में मां का मंदिर बनाया गया है।  ये मंदिर जोधपुरी पत्थर से बनाया गया है। मंदिर कि छत और खंभों पर पत्थर की नक्काशी अकल्पनीय स्थापत्य कला का अनुभव देता है। मंदिर की छत पर मूर्तियां बनी है और मुख्य द्वार पर अंग रक्षक की मूर्तियों की नक्काशी की गई है।  

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