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Rajasthan: दुर्लभ आयुर्वेद पांडुलिपियों के संरक्षण में जुटा यह संस्थान, हजारों साल पुरानी बताई गई; जानें सबकुछ
Tue, 11 Feb 2025 07:15 AM IST
शबाहत हुसैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: शबाहत हुसैन
Updated Tue, 11 Feb 2025 07:15 AM IST
सार
Rajasthan News: गुलाबी नगर जयपुर के परकोटे में स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में देश का एकमात्र पांडुलिपि इकाई मौजूद है, जो हस्त लिखित आयुर्वेद के ग्रंथों को सुरक्षित कर रही है। खास बात यह है कि इन ग्रंथों को सुरक्षित करने के लिए डिजिटल तकनीकी का सहारा लिया जा रहा है।
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दुर्लभ आयुर्वेद पांडुलिपी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजधानी जयपुर के परकोटे में स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान देश की सबसे प्रचीन उपचार पद्दति आयुर्वेद का संरक्षण भी कर रहा है। यहां हर रोज हजारों की संख्या में लोग प्राचीन पद्दति से अपना उपचार करवाने आते हैं, लेकिन उपचार के साथ यहां एक और बड़ा काम हो रहा है। हजारों साल पुराने आयुर्वेद के हस्त लिखिल ग्रंथों का डिजिटलाइजेशन प्रोजेक्ट भी यहां चलाया जा रहा है।
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खास बात यह है कि जयपुर का यह राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान देश का एकमात्र ऐसा संस्थान है, जहां पांडुलिपि संरक्षित करने के लिए अलग से इकाई मौजूद हैं और जो आयुर्वेद से जुड़े इन ग्रंथों को सुरक्षित कर रही है। आयुष मंत्रालय की तरफ से आयुर्वेद से जुड़ी पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन करने के लिए जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
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शारदा, कन्नड़, देवनागरी में लिखे ग्रंथ
जिन आयुर्वेद के ग्रंथों का डिजिटलाइजेशन किया जा रह है, उनमें से कुछ शारदा लिपी, कुछ देवनागरी, तुलू, प्राचीन कन्नड़, बंगाली, उड़िया, असमिया, मलयालम व संस्कृत भषा में लिए गए हैं। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के प्रोफेसर असित कुमार पांजा इन प्राचीन ग्रंथों को सहेजकर इनका डिजटलाइजेशन करने का काम कर रहे हैं।
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पांजा का कहना है कि आयुर्वेद से जुड़े इतना प्राचीन ग्रंथों को डिजिटल तरीके से सुरक्षित किया जा रहा है। इस दौरान न केवल खराब और गंदे कागजों को सही किया जाता है, बल्कि उन्हें पूर्ण रूप से सुरक्षित भी किया जा रहा है। संस्थान के विभाग में कागज को जांचने के लिए लैब और ट्रीटमेंट की सुविधा भी उपलब्ध है। उन्होंने बताया कि अब तक हम लोग आयुर्वेद ग्रंथों की एक लाख से ज्यादा पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन कर चुके हैं।
बॉक्स में सुरक्षित रखा जा रहा
प्रोफेसर असित कुमार ने बताया कि सबसे पहले तो जिन ग्रंथों के कागज खराब हो चुके हैं, उन्हें विशेष लेप लगाकर सुरक्षित किया जाता है। जिससे कागज से नमी को खत्म किया जा सके। वहीं ग्रंथ को संरक्षित रखने के लिए विशेष प्रकार के गत्ते का उपयोग किया जाता है, ताकि उसमें नमी और कीड़े नहीं लगे और इसके बाद ग्रंथ को सूती कपड़े में बांधकर बॉक्स में संरक्षित किया जाता है। इसके बाद उन्हें स्कैन कर हार्ड डिस्क और क्लाउड पर सेव किया जाता है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में सभी तरह की बीमारियों का इलाज मौजूद हैं, लेकिन जानकारी नहीं होने के चलते आयुर्वेद से उपचार के प्राचीन तरीके भुला दिए गए हैं। इसलिए हम इन प्राचीन ग्रंथों को सहेज रहे हैं। इनमें प्राचीन आयुर्वेद सूत्र मौजूद हैं और इनके बारे में यहां अध्ययन कर रहे स्टूडेंट्स को भी सिखाया जा रहा है।
600 से ज्यादा ग्रंथों को किया सुरक्षित
प्रो. असित कुमार पांजा ने बताया की आयुर्वेद संस्थान की सहायता से जयपुर स्थित जैन ग्रंथालय में 600 से अधिक ग्रंथों को संरक्षित किया गया है। इसके अलावा आयुर्वेदाचार्य के विद्यार्थी वैभव जैन, दीपक कुमार जैन, शुभम जैन, सिद्धांत शाह पुणे, प्रसन्न जैन, धैर्य डांगरा एवं अर्चित जैन ने पांडुलिपि की माइक्रोफिल्मिंग एवं उनको संरक्षित करने का कार्य कर रहे है।