राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश: सीमावर्ती इलाकों में बिना सुनवाई नहीं चलेगा बुलडोजर, सरकार ने दिया आश्वासन
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने सीमावर्ती क्षेत्रों में मस्जिदों और अन्य निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई से पहले कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई अनिवार्य कर दी है। गफूर बनाम राजस्थान राज्य मामले में अदालत ने प्रभावित पक्षों को जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
विस्तार
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने सीमावर्ती क्षेत्रों में मस्जिदों और अन्य निर्माणों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी निर्माण को ध्वस्त करने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा। प्रभावित पक्ष को अपना जवाब देने और सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिए बिना प्रशासन कोई ढांचा नहीं गिरा सकेगा। वहीं, राज्य सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया है कि जारी किए गए कारण बताओ नोटिस पर अंतिम निर्णय होने तक संबंधित निर्माणों को ध्वस्त नहीं किया जाएगा।
6 नवंबर को खंडपीठ ने सुनाया आदेश
न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने 6 नवंबर को 'गफूर बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य' मामले में सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने प्रभावित पक्षों को अपना विस्तृत जवाब पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। खंडपीठ ने निर्देश दिया कि जवाब मिलने के बाद सक्षम अधिकारी प्रभावित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर देंगे। इसके बाद सभी संबंधित दस्तावेजों और साक्ष्यों की जांच कर कानून के अनुसार कारण सहित लिखित आदेश पारित करना होगा।
नोटिस का जवाब मिलने से पहले कार्रवाई पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत को बताया कि कुछ मामलों में कारण बताओ नोटिस का जवाब प्राप्त करने और उस पर विचार करने से पहले ही बुलडोजर कार्रवाई की जा रही है। प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया जा रहा है। इस मामले में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर अधिवक्ता हरीश कुमार पुरोहित और इकबाल खान ने पैरवी की। अधिवक्ता ताहिर हकीम और लीगल सेल के संयोजक प्रोफेसर निसार अहमद अंसारी ने सहयोग किया।
बाड़मेर-जैसलमेर की चार अन्य अपीलों का भी निस्तारण
खंडपीठ ने मुख्य मामले में दिए गए आदेश के आधार पर चार अन्य समान अपीलों का भी निस्तारण कर दिया। अदालत ने माना कि इन मामलों के तथ्य और परिस्थितियां मुख्य याचिका के समान हैं। इनमें बाड़मेर की आदर्श नगरी स्थित मस्जिद, मनोहर मस्जिद, जैसलमेर के भरीवाला निवासी हसन हुसैन और बाड़मेर के मलाना गांव निवासी मुस्तफा खान की ओर से दाखिल अपीलें शामिल हैं। अदालत के आदेश के बाद इन सभी मामलों में संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को पहले कानूनी प्रक्रिया के तहत सुनवाई पूरी करनी होगी। इसके बाद ही निर्माणों को लेकर आगे की कार्रवाई की जा सकेगी।
14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त करने का दावा
जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के अनुसार, राज्य के सीमावर्ती इलाकों में धार्मिक स्थलों और अन्य निर्माणों को हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई 18 जून 2026 को शुरू हुई थी। संगठन का दावा है कि इस दौरान 14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त कर दिया गया और प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया। कार्रवाई की जानकारी मिलने के बाद जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के महासचिव मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री ने प्रभावित लोगों को कानूनी सहायता देने की घोषणा की थी। इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं, जिन्हें 13 जुलाई को खारिज कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हाईकोर्ट में फिर पहुंचा मामला
राजस्थान हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद जमीयत ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वहां वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रभावित पक्षों की ओर से पैरवी की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश मिला। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ में दोबारा अपीलें दाखिल की गईं। इन्हीं अपीलों पर सुनवाई करते हुए अब हाईकोर्ट ने प्रभावित पक्षों को जवाब देने और सुनवाई का अवसर देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राज्य सरकार ने भी अंतिम निर्णय होने तक संबंधित निर्माणों को नहीं गिराने का आश्वासन दिया है।