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Jaipur News: निजी स्कूलों पर लटकी आर्थिक संकट की तलवार, निजी स्कूल संघर्ष समिति ने सरकार को घेरा
Mon, 24 Aug 2026 01:06 PM IST
जयपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: जयपुर ब्यूरो
Updated Mon, 24 Aug 2026 01:06 PM IST
सार
राजस्थान निजी स्कूल संघर्ष समिति ने सरकार के सामने गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि राज्य के करीब 90 प्रतिशत निजी स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। यदि ऐसा हुआ तो करीब 10 लाख कर्मचारियों के रोजगार और लाखों बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ सकता है।
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लालसिंह झाला, प्रदेश संयोजक, निजी स्कूल संघर्ष समिति
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजस्थान में सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं को लेकर चल रही बहस के बीच अब निजी स्कूलों की स्थिति भी गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। राजस्थान निजी स्कूल संघर्ष समिति के प्रदेश संयोजक लालसिंह झाला ने दावा किया कि राज्य के करीब 90 प्रतिशत निजी विद्यालय बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। यदि मध्यम श्रेणी और ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूल बड़ी संख्या में बंद होते हैं तो करीब 10 लाख कर्मचारी बेरोजगार हो सकते हैं और लाखों बच्चों की शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी।
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झाला ने कहा कि सरकार की नीतियां ऐसी होती जा रही हैं, जिनसे निजी विद्यालयों के लिए काम करना लगातार कठिन होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि संगठन की ओर से 30 जनवरी से लगातार सरकार को ज्ञापन दिए जा रहे हैं। 25 जून को शिक्षा मंत्री से मुलाकात भी की गई लेकिन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाया। उन्होंने निजी स्कूलों की प्रमुख समस्याओं में आरटीई के तहत मिलने वाले भुगतान का वर्षों से लंबित होना बताया। उनके अनुसार सरकार ने केवल सत्र 2024-25 का भुगतान किया है, जबकि अन्य बकाया राशि अब भी लंबित है। उन्होंने कहा कि निजी स्कूल आर्थिक दबाव के बावजूद आरटीई के तहत बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
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निजी स्कूलों की जांच व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए। उनका कहना था कि वर्ष 2018 से चल रही जांच प्रक्रिया के कारण विद्यालयों की व्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। भवन, स्टाफ, प्रवेश और अन्य मानकों की जांच जरूरी है, लेकिन जांच प्रक्रिया में विद्यालय प्रतिनिधियों को विश्वास में लेकर गुणवत्ता सुधार पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि जांच व्यवस्था कहीं-कहीं इंस्पेक्टर राज का रूप लेती जा रही है।
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झाला ने यह भी कहा कि निजी विद्यालयों को बंद करने से पहले सरकार को यह बताना चाहिए कि क्या उसके पास इतने बच्चों को तत्काल सरकारी स्कूलों में समायोजित करने के लिए पर्याप्त भवन, शिक्षक और अन्य संसाधन मौजूद हैं। उनके मुताबिक निजी विद्यालयों में करीब 85 लाख बच्चे अध्ययनरत हैं। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को अचानक सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन होगा। उन्होंने कहा कि हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा उससे बेहतर जीवन जिए और शिक्षा ही गरीब एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए आगे बढ़ने का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि निजी स्कूल बड़ी संख्या में बंद होते हैं तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर पड़ेगा।
सरकारी और निजी स्कूलों की गुणवत्ता पर पूछे गए सवाल के जवाब में झाला ने कहा कि निजी विद्यालय सरकार का विकल्प बनने के लिए नहीं आए थे, बल्कि सरकारी व्यवस्था में जहां कमी रही, वहां निजी क्षेत्र ने शिक्षा की जरूरत पूरी की। उनका कहना था कि यदि सरकारी स्कूलों में पर्याप्त गुणवत्ता और संसाधन उपलब्ध हों तो अभिभावक स्वयं वहां बच्चों को भेजना पसंद करेंगे। उन्होंने निजी स्कूलों की फीस और सुविधाओं को लेकर उठने वाले सवालों पर कहा कि निजी स्कूलों की अपनी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं और सरकार को पूरी व्यवस्था को एक नजर से देखने के बजाय विद्यालयों की वास्तविक स्थिति के आधार पर नीति बनानी चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल उन लाखों बच्चों के भविष्य को लेकर है, जो निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यदि बड़ी संख्या में निजी विद्यालय बंद होते हैं तो क्या सरकारी स्कूल इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को तत्काल समायोजित कर पाएंगे? निजी स्कूल संघर्ष समिति का दावा है कि मौजूदा संसाधनों के आधार पर ऐसा करना आसान नहीं होगा। ऐसे में सरकार के सामने निजी और सरकारी, दोनों शिक्षा व्यवस्थाओं के बीच संतुलन बनाते हुए बच्चों की शिक्षा को निर्बाध रखने की बड़ी चुनौती है।