डॉ. सतीश पूनिया की पुस्तक के विमोचन में BJP प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को नहीं मिला अतिथि सूची में स्थान
जयपुर में डॉ. सतीश पूनिया की पुस्तक ‘अग्निपथ नहीं जनपथ’ के विमोचन समारोह में राजनीतिक हलचल देखने को मिली। मुख्य अतिथि पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया रहे, जबकि कांग्रेस नेता टीकाराम जूली और जिला प्रमुख वरजी बाई भील विशिष्ट अतिथि बने।
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भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष एवं आमेर से पूर्व विधायक डॉ. सतीश पूनिया की विधायक कार्यकाल पर आधारित पुस्तक अग्निपथ नहीं जनपथ का विमोचन समारोह राजनीतिक संदेशों से भरपूर रहा। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया उपस्थित थे, जबकि विशिष्ट अतिथियों में कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और भीलवाड़ा की जिला प्रमुख वरजी बाई भील मौजूद रहीं। हालांकि, डॉ. सी. पी. जोशी, पूर्व अध्यक्ष राजस्थान विधानसभा, का नाम विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्ड पर अंकित था, पर वे कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए।
डॉ. सतीश पूनिया ने इस आयोजन के लिए बड़े प्रेमपूर्वक आमंत्रण भेजे, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि भाजपा के वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ का नाम विशिष्ट अथवा मुख्य अतिथियों की सूची में नहीं था। इसके बावजूद राठौड़ ने अपनी सादगी और संगठन के प्रति निष्ठा का परिचय देते हुए केवल आमंत्रण पर ही कार्यक्रम में भाग लिया।
डॉ. पूनिया ने अपने संबोधन में स्वीकार किया कि उन्हें संकोच था कि मदन राठौड़ का नाम अतिथियों में नहीं है, लेकिन जब वे गेट पर खड़े थे, तो राठौड़ पहले व्यक्ति थे जो पहुंचे। जब डॉ. पूनिया ने उनका फूलों का गुच्छा देकर स्वागत करने की कोशिश की, तो उन्होंने कहा,“मैं आज यहां कार्यकर्ता के रूप में आया हूं।” कार्यक्रम के दौरान पूनिया ने कांग्रेस नेता टीकाराम जूली का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया और कहा कि टीकाराम जी का यह उपकार वे कभी नहीं भूल सकते, क्योंकि वे केवल एक फोन पर यहां आए।
इस कार्यक्रम में दो प्रमुख कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी और भाजपा के वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष की औपचारिक अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि क्या यह कार्यक्रम केवल साहित्यिक विमोचन था या भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी की झलक दिखाई दी। भाजपा नेता बार-बार यह दावा करते हैं कि पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं है, लेकिन अग्निपथ नहीं जनपथ के विमोचन मंच पर जो दृश्य दिखा, उसने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मदन राठौड़ मंच पर तो बैठे, मगर विशिष्ट अतिथि की सूची से उनका नाम गायब रहना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।