{"_id":"696f6bb69a21424bf0074f30","slug":"taking-steps-towards-a-safe-childhood-school-children-were-given-information-about-laws-and-their-rights-dausa-news-c-1-1-noi1437-3862235-2026-01-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"Dausa: सरकारी स्कूलों में बच्चों को सिखाया गया ‘गुड टच-बैड टच’, साथ ही बताया गया ऑनलाइन खतरों से बचने का उपाय","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Dausa: सरकारी स्कूलों में बच्चों को सिखाया गया ‘गुड टच-बैड टच’, साथ ही बताया गया ऑनलाइन खतरों से बचने का उपाय
Tue, 20 Jan 2026 06:21 PM IST
दौसा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा
Published by: दौसा ब्यूरो
Updated Tue, 20 Jan 2026 06:21 PM IST
सार
Dausa: राजकीय विधि महाविद्यालय दौसा ने सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर महत्वपूर्ण पहल की है। बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’, डिजिटल खतरों और साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक किया गया।
विज्ञापन
दौसा बच्चों को जानकारी देते
विस्तार
राजकीय विधि महाविद्यालय दौसा ने सरकारी स्कूल परिसरों में बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक अहम पहल की है। सोमवार को महाविद्यालय की ओर से डॉक्टर श्वेता डूडी ने राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल खैरवाल में बच्चों के लिए शिविर आयोजित किया। इसमें विद्यार्थियों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य, ‘गुड टच-बैड टच’ और ‘वर्चुअल टच’ की जानकारी दी गई।
बच्चों को जागरूक करना आवश्यक
डॉक्टर श्वेता डूडी ने बताया कि डिजिटल युग में बच्चों को मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया से जुड़े खतरों के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज के समय में बच्चों को न केवल शारीरिक बल्कि ऑनलाइन माध्यमों से होने वाले शोषण और हिंसा के प्रति भी सुरक्षित रहना सीखना चाहिए।
बच्चों और अभिभावकों को दी गई जानकारी
कार्यक्रम में बच्चों को यह समझाया गया कि कौन-सा स्पर्श सुरक्षित है और कौन-सा असुरक्षित। साथ ही, उन्हें यह भी बताया गया कि किसी भी असहज या जोखिमपूर्ण स्थिति में वे किससे और कैसे मदद ले सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देते हुए बच्चों को तनाव, डर या दबाव की स्थिति में अपनी भावनाओं को पहचानने और खुलकर बात करने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
विज्ञापन
वर्चुअल टच की जानकारी जरूरी
राजू मधुकर ने जानकारी दी कि यह पहल सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के मानसिक, सामाजिक और कानूनी सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि मोबाइल और इंटरनेट का गलत उपयोग कर बच्चों को अनजान और अनचाहे खतरों का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए ‘वर्चुअल टच’ की जानकारी देना जरूरी है। इस दौरान धर्मेन्द्र कुमार मीणा ने बताया कि शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वे बच्चों की समस्याओं को समय रहते पहचान सकें और उचित कदम उठा सकें। कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाओं से जोड़ा जाएगा। विशेषज्ञ टीम स्कूलों में जाकर कार्यशालाएं आयोजित करेगी।
पॉक्सो कानून और डिजिटल खतरों की जागरूकता
शिविर में बच्चों को पॉक्सो कानून की जानकारी दी गई और उन्हें सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार, साइबर बुलिंग, सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव और डिजिटल संतुलन के बारे में समझाया गया। बच्चों को यह सिखाया गया कि वे अपने शरीर और व्यक्तिगत सीमाओं को पहचानें, गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाएं और आवश्यकता पड़ने पर मदद लें।
ड्रॉपआउट बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाएगा
कार्यक्रम का एक उद्देश्य विद्यालय छोड़ चुके या स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों की पहचान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ना भी है। इस पहल में बच्चों के साथ अभिभावकों और शिक्षकों को भी शामिल किया जाएगा, जिससे एक सुरक्षित और सहयोगी वातावरण तैयार किया जा सके।
ये भी पढ़ें: जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़, अचानक हुई मॉकड्रिल से हर कोई दिखा हैरान
मानसिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा
शिविर के माध्यम से बच्चों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाएगा। उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और संतुलित बनाने के लिए तीन चरणों में कार्यक्रम लागू किया जाएगा: तनाव प्रबंधन, भावनात्मक समझ और सहयोग लेने की क्षमता। इस पहल से बच्चों का व्यक्तित्व विकास और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
विज्ञापन
बच्चों को जागरूक करना आवश्यक
डॉक्टर श्वेता डूडी ने बताया कि डिजिटल युग में बच्चों को मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया से जुड़े खतरों के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज के समय में बच्चों को न केवल शारीरिक बल्कि ऑनलाइन माध्यमों से होने वाले शोषण और हिंसा के प्रति भी सुरक्षित रहना सीखना चाहिए।
विज्ञापन
बच्चों और अभिभावकों को दी गई जानकारी
कार्यक्रम में बच्चों को यह समझाया गया कि कौन-सा स्पर्श सुरक्षित है और कौन-सा असुरक्षित। साथ ही, उन्हें यह भी बताया गया कि किसी भी असहज या जोखिमपूर्ण स्थिति में वे किससे और कैसे मदद ले सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देते हुए बच्चों को तनाव, डर या दबाव की स्थिति में अपनी भावनाओं को पहचानने और खुलकर बात करने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
विज्ञापन
वर्चुअल टच की जानकारी जरूरी
राजू मधुकर ने जानकारी दी कि यह पहल सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के मानसिक, सामाजिक और कानूनी सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि मोबाइल और इंटरनेट का गलत उपयोग कर बच्चों को अनजान और अनचाहे खतरों का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए ‘वर्चुअल टच’ की जानकारी देना जरूरी है। इस दौरान धर्मेन्द्र कुमार मीणा ने बताया कि शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वे बच्चों की समस्याओं को समय रहते पहचान सकें और उचित कदम उठा सकें। कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों को बाल अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाओं से जोड़ा जाएगा। विशेषज्ञ टीम स्कूलों में जाकर कार्यशालाएं आयोजित करेगी।
पॉक्सो कानून और डिजिटल खतरों की जागरूकता
शिविर में बच्चों को पॉक्सो कानून की जानकारी दी गई और उन्हें सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार, साइबर बुलिंग, सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव और डिजिटल संतुलन के बारे में समझाया गया। बच्चों को यह सिखाया गया कि वे अपने शरीर और व्यक्तिगत सीमाओं को पहचानें, गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाएं और आवश्यकता पड़ने पर मदद लें।
ड्रॉपआउट बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाएगा
कार्यक्रम का एक उद्देश्य विद्यालय छोड़ चुके या स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों की पहचान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ना भी है। इस पहल में बच्चों के साथ अभिभावकों और शिक्षकों को भी शामिल किया जाएगा, जिससे एक सुरक्षित और सहयोगी वातावरण तैयार किया जा सके।
ये भी पढ़ें: जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़, अचानक हुई मॉकड्रिल से हर कोई दिखा हैरान
मानसिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा
शिविर के माध्यम से बच्चों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाएगा। उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और संतुलित बनाने के लिए तीन चरणों में कार्यक्रम लागू किया जाएगा: तनाव प्रबंधन, भावनात्मक समझ और सहयोग लेने की क्षमता। इस पहल से बच्चों का व्यक्तित्व विकास और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।