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रेगिस्तानी रल्ली को मिली विदेश में भी पहचान
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Thu, 09 Mar 2017 10:50 AM IST
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जैसलमेर में लगी रल्ली की प्रदर्शनी
- फोटो : amar ujala
जैसलमेर के बाशिंदों की लगन व मेहनत का नमूना है कि रल्ली आज विदेशों में भी अपनी धाक जमा रही है। घर में पुराने कपड़ों के टुकड़ों से बनाई जाने वाली यह रल्ली पर्यटकों की भी खास पसन्द बन चुकी है। दरअसल यह रल्ली बैठने व बिस्तर पर बिछाने के लिए बैड शीट के रूप में बनाई जाती है।
यहां महिलाएं घर के उपयोग के लिए रल्ली बनाती थी, लेकिन अब इसे बड़े स्तर पर भी व्यापार का रूप मिलने लगा है। इसके लिए वन विभाग के इंदिरा गांधी नहर परियोजना स्टेज द्वितीय के प्रयास कारगर हुए हैं। विभाग ने पहले जैसलमेर, जोधपुर व झालावाड़ में इसकी प्रदर्शनी लगाई। जहां अच्छा रेस्पोंस मिलने के बाद अब इसे बाड़मेर के एक एनजीओ के सहयोग से जर्मनी में टेक्सटाइल फेयर में प्रदर्शित किया गया। इस फेयर में रली को 20 से अधिक देशों के लोगों ने सराहा और ऑर्डर भी दिए हैं।
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यहां महिलाएं घर के उपयोग के लिए रल्ली बनाती थी, लेकिन अब इसे बड़े स्तर पर भी व्यापार का रूप मिलने लगा है। इसके लिए वन विभाग के इंदिरा गांधी नहर परियोजना स्टेज द्वितीय के प्रयास कारगर हुए हैं। विभाग ने पहले जैसलमेर, जोधपुर व झालावाड़ में इसकी प्रदर्शनी लगाई। जहां अच्छा रेस्पोंस मिलने के बाद अब इसे बाड़मेर के एक एनजीओ के सहयोग से जर्मनी में टेक्सटाइल फेयर में प्रदर्शित किया गया। इस फेयर में रली को 20 से अधिक देशों के लोगों ने सराहा और ऑर्डर भी दिए हैं।
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यूं बनाई जाती है रल्ली
रली बनाने के बारे में बताती महिला
- फोटो : amar ujala
फिलहाल रल्ली का उपयोग केवल बैडशीट के लिए किया जाता था। जर्मनी में हुए फेयर के बाद विदेशी लोग अब इसे सोफा सैट कवर, टेबल कवर सहित इसका अलग—अलग रूप चाहते हैं। विभाग अब अपने स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को रल्ली को अलग तरह से तैयार करने के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला करेगी। हालांकि बाडमेर के एनजीओ के सहयोग से प्रोडक्शन बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्रों में घर—घर में रल्ली बनाने का चलन है। गांव की महिलाएं अपने घरों में पुराने कपड़ों के अलग—अलग साइज में टुकड़े करने के बाद उन्हें आपस में जोड़कर रल्ली बनाती है। यह रल्ली गलीचे की तरह घर में बिछाने के काम में ली जाती है। वन विभाग की ओर से बनाए गए 5 स्वयं सहायता समूह रल्ली बनाने के काम में जुटे हुए हैं। इन समूहों की रल्लियां जगह जगह प्रदर्शित की जा रही हैं।