इस बार अफीम खूब दौड़ाएगी पुलिस को...
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अफीम की खेती के लिए राजस्थान काफी मशहूर है। देश में जितनी भी अफीम की पैदावार होती है उसका 60 फीसदी राजस्थान में पैदा होता है। इस वर्ष राजस्थान में अफीम की बंपर पैदावार हुई। अफीम की खेती प्रमुख रूप से राज्य के तीन जिलों कोटा, प्रतापगढ़ व चित्तौड़गढ़ में होती है। इस वर्ष पैदावार अधिक होने से इसकी अधिक तस्करी होने की प्रबल संभावना है। जिसके चलते इस बार नारकोटिक्स विभाग व स्थानीय पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।
माना जा रहा है कि इस वर्ष मानसून सीजन अच्छा होने के कारण अफीम की पैदावार अच्छी हुई है। सेंट्रल ब्यूरो आॅफ नारकोटिक्स के अनुसार इस अफीम की खेती के लिए राजस्थान,मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में 19823 लाईसेंस दिए गए है। जिसमें से करीब आठ हजार लाईसेंस राजस्थान के किसानों को दिए गए हैं। वहीं बंपर पैदावार की जानकारी के बाद अब पुलिस ने भी कार्रवाई प्रारंभ कर दी है। हाल ही में कोटा में पुलिस ने अवैध रुप से पैदा की जा रही अफीम को नष्ट करने का अभियान चलाया था।
इसलिए मुनाफे का सौदा है अफीम की खेती
पिछले वर्ष राज्य में अफीम की खेती को मौसम का साथ नहीं मिला था। लेकिन इस वर्ष पैदावार अच्छी होने के कारण किसान को खासा फायदा होने की उम्मीद है। जानकारी के अनुसार स्थानीय बाजार में अफीम का भाव इस बार 70000—100000 रुपए प्रति किलो रहने का अनुमान है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में वर्तमान में अफीम के भाव करीब 50000 रुपए प्रति किलो है। पिछले वर्ष करीब 70 फीसदी फसल खराब होने के कारण इस बार पंजाब में अफीम की अच्छी खासी मांग है।
इसलिए ज्यादा होती है तस्करी
अफीम की तस्करी का प्रमुख कारण है इससे होने वाली कमाई। क्योंकि अफीम की खेती करने वाले किसानों से सरकार जो अफीम खरीदती है कि मूल्य 3000 रुपए प्रति किलो होता है। जिसका उपयोग मुख्य रुप से दवाई बनाने में किया जाता है। जबकि तस्करों को जो अफीम बेची जाती है उसकी कीमत सरकारी कीमत से 100 गुना अधिक तक रहती है।
यहां रहेगी पुलिस की निगाहें
राज्य से सबसे अधिक अफीम की तस्करी पंजाब के लिए होती है। पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार कोटा, प्रतापगढ़ व चित्तौड़गढ़ से अफीम जोधपुर व जैसलमेर के रास्ते तस्करी के माध्यम से पंजाब पहुंचती है। तस्करी को रोकने के लिए इस वर्ष पुलिस व नारकोटिक्स विभाग की ओर से स्पेशल टीम गठित की गई है। हालांकि विभाग के अधिकारियों का कहना है तस्करों को 100 प्रतिशत रोकना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि तस्कर गांव के रास्तों का अधिक उपयोग करते है। साथ ही प्रतिवर्ष तस्करी करने का तरीका भी बदल जाता है। इसके अतिरिक्त अफीम की तस्करी करने वाले तस्कर अकले ही आॅपरेट करते है। अधिकतर इनका कोई ग्रुप नहीं होता है।