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Punjab Election 2022: कांग्रेस का ये मास्टर स्ट्रोक, किसे कितना फायदा और कितना नुकसान पहुंचाएगा?
Mon, 07 Feb 2022 10:36 AM IST
जयदेव सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जयदेव सिंह
Updated Mon, 07 Feb 2022 10:36 AM IST
सार
पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ही कांग्रेस की तरफ से आधिकारिक तौर पर सीएम पद के दावेदार रहेंगे। रविवार को लुधियाना में राहुल गांधी ने इसका एलान कर दिया।
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चरणजीत सिंह चन्नी, राहुल गांधी, नवजोत सिंह सिद्धू और सुनील जाखड़।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
पंजाब कांग्रेस में मचा सियासी घमासान कुछ हद तक स्थिर होता नजर आ रहा है। हालांकि, ये कब तक रहेगा इसका कोई ठिकाना नहीं। राहुल गांधी ने चरणजीत सिंह चन्नी को गरीब घर का बेटा बताते हुए कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया। नवजोत सिंह सिद्धू और सुनील जाखड़ को किनारे करके चन्नी के दलित चेहरे को चुनना कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।
इस सियासी चाल का असल परिणाम तो 10 मार्च को आएगा, लेकिन रूझान कुछ ही दिनों में देखने को मिलने लगेंगे। पार्टी में एक बार फिर गुटबाजी बढ़ने का खतरा है। इस रिपोर्ट में हम बताएंगे कि कांग्रेस को आखिर मुख्यमंत्री पद का चेहरा क्यों घोषित करना पड़ा? इससे उसे क्या फायदा हो सकता है? मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होने के बाद कौन से बड़े नुकसान हो सकते हैं?
सबसे पहले जान लीजिए क्यों सीएम फेस घोषित करना पड़ा?
पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मोहम्मद खालिद कहते हैं, 'आम आदमी पार्टी पहले ही भगवंत मान को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुकी है। अकाली दल में भी सुखबीर बादल सीएम का चेहरा हैं। इस वजह से कांग्रेस पर दबाव था कि वो भी मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ चुनाव में उतरे। कांग्रेस के लिए ये एक तरह से मजबूरी थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वोटिंग से पहले ही अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया गया था।'
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मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना फयादेमंद या नहीं करने पर होता फायदा?
प्रोफेसर खालिद के अनुसार, कांग्रेस को दोनों ही स्थितियों में फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। क्योंकि सिद्धू और चन्नी दोनों की कमियां और खूबिया हैं। वो कहते हैं कि इस फैसले के बाद क्या आपको लगता है कि सिद्धू अब शांत हो जाएंगे। शुक्रवार को उन्होंने जिस तरह का बयान दिया था उससे आने वाले दिनों में सिद्धू के तेवर का अंदाजा लगाया जा सकता है। जिन प्रियंका और राहुल से सिद्धू अपनी दोस्ती का दम भरते हैं उनके लिए ही उन्होंने कहा था कि कांग्रेस आलाकमान किसी ईमानदार को सीएम का चेहरा बनाए। मतलब वो खुद को ईमानदार प्रोजेक्ट कर रहे हैं। दूसरी ओर वो चरणजीत चन्नी के परिवार पर चल रहे छापे के बहाने उनका दावा कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे।
कांग्रेस ने चन्नी को क्यों चुना?
चन्नी की अपनी मजबूतियां हैं। कांग्रेस हर मंच पर ये डंका बजा रही है कि उसने पहली बार पंजाब में एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया है। पंजाब में 32% दलित वोट है। ऐसे में तीन महीने बाद ही चन्नी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर कांग्रेस दलितों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी।
प्रोफेसर खालिद कहते हैं कि लंबी दौड़ के लिए कौन ज्यादा बेहतर होगा कांग्रेस को यह तय करना था। सिद्धू एक बेलगाम घोड़े की तरह हैं। अगर वो मुख्यमंत्री बन जाते तो वे शायद हाईकमान की भी नहीं सुनते। हाईकमान ऐसे नेता को ही मुख्यमंत्री बनाता है जो उसकी सुने। इस वजह से भी चन्नी का दावा ज्यादा मजबूत बन गया।
आगे कौन सी चुनौतियां करेंगी कांग्रेस को परेशान?
राहुल ने कहा था कि नेता तय होने के बाद बाकी लोगों को उसकी मदद करनी होगी, लेकिन ऐसा होना आसान नहीं होगा। सिद्धू ने पहले अमरिंदर सिंह फिर चरणजीत चन्नी के खिलाफ लगातार मोर्चा खोल रखा था। उनके तेवर इतनी आसानी से नरम नहीं पड़ेंगे।
इस चुनाव में जिन उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा है उनमें 70% सिद्धू समर्थक बताए जाते हैं। ऐसे में चुनाव नतीजों में अगर सिद्धू समर्थक विधायकों की संख्या बल ज्यादा रहता है तो चन्नी के लिए सरकार चलाना बहुत मुश्किल हो सकता है। यहां तक कि अगर चुनाव नतीजे सिद्धू के पक्ष में रहते हैं तो हो सकता है कि नतीजे के बाद सिद्धू फिर से बगावती हो जाएं।
चन्नी को अब क्या करना होगा?
चन्नी को सबसे पहले तो सभी विरोधियों को साथ लाने की चुनौती होगी। जाखड़ से लेकर सिद्धू तक सबको साथ लेकर चलना होगा। सिद्धू जिस तरह की बयानबाजी करते हैं उससे भी निपटना चन्नी के लिए एक चुनौती होगी। जिन दोनों सीटों से चन्नी को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है उन्हें जीतकर खुद को बड़ा नेता साबित करने का मौका भी चन्नी के पास है।
क्या मुख्यमंत्री चेहरा नहीं बनाए जाने से कांग्रेस से अलग हो सकते हैं सिद्धू?
प्रोफेसर खालिद कहते हैं कि इसके आसार बिलकुल नहीं हैं। सिद्धू भाजपा छोड़कर आए हैं। सुखबीर बादल और विक्रमजीत सिंह मजीठिया से उनकी तल्खी जगजाहिर है। मजीठिया वैसे भी अमृतसर पूर्व में उनकी मुश्किल बढ़ा रहे हैं। सुखबीर बादल की वजह से वो भाजपा से निकले थे। ऐसे में उन्हें अपनी सीट पर जीत दर्ज करना ही बहुत बड़ी चुनौती हो सकती है। क्योंकि, भाजपा को सिद्धू से अपने हिसाब चुकता करने हैं, कैप्टन अमरिंदर सिंह भी उन्हें हराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देंगे। इन हालातों में सिद्धू के लिए फिलहाल कोई विकल्प नहीं है।
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इस सियासी चाल का असल परिणाम तो 10 मार्च को आएगा, लेकिन रूझान कुछ ही दिनों में देखने को मिलने लगेंगे। पार्टी में एक बार फिर गुटबाजी बढ़ने का खतरा है। इस रिपोर्ट में हम बताएंगे कि कांग्रेस को आखिर मुख्यमंत्री पद का चेहरा क्यों घोषित करना पड़ा? इससे उसे क्या फायदा हो सकता है? मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होने के बाद कौन से बड़े नुकसान हो सकते हैं?
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सबसे पहले जान लीजिए क्यों सीएम फेस घोषित करना पड़ा?
पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मोहम्मद खालिद कहते हैं, 'आम आदमी पार्टी पहले ही भगवंत मान को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुकी है। अकाली दल में भी सुखबीर बादल सीएम का चेहरा हैं। इस वजह से कांग्रेस पर दबाव था कि वो भी मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ चुनाव में उतरे। कांग्रेस के लिए ये एक तरह से मजबूरी थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वोटिंग से पहले ही अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया गया था।'
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मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना फयादेमंद या नहीं करने पर होता फायदा?
प्रोफेसर खालिद के अनुसार, कांग्रेस को दोनों ही स्थितियों में फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। क्योंकि सिद्धू और चन्नी दोनों की कमियां और खूबिया हैं। वो कहते हैं कि इस फैसले के बाद क्या आपको लगता है कि सिद्धू अब शांत हो जाएंगे। शुक्रवार को उन्होंने जिस तरह का बयान दिया था उससे आने वाले दिनों में सिद्धू के तेवर का अंदाजा लगाया जा सकता है। जिन प्रियंका और राहुल से सिद्धू अपनी दोस्ती का दम भरते हैं उनके लिए ही उन्होंने कहा था कि कांग्रेस आलाकमान किसी ईमानदार को सीएम का चेहरा बनाए। मतलब वो खुद को ईमानदार प्रोजेक्ट कर रहे हैं। दूसरी ओर वो चरणजीत चन्नी के परिवार पर चल रहे छापे के बहाने उनका दावा कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे।
कांग्रेस ने चन्नी को क्यों चुना?
चन्नी की अपनी मजबूतियां हैं। कांग्रेस हर मंच पर ये डंका बजा रही है कि उसने पहली बार पंजाब में एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया है। पंजाब में 32% दलित वोट है। ऐसे में तीन महीने बाद ही चन्नी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर कांग्रेस दलितों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी।
प्रोफेसर खालिद कहते हैं कि लंबी दौड़ के लिए कौन ज्यादा बेहतर होगा कांग्रेस को यह तय करना था। सिद्धू एक बेलगाम घोड़े की तरह हैं। अगर वो मुख्यमंत्री बन जाते तो वे शायद हाईकमान की भी नहीं सुनते। हाईकमान ऐसे नेता को ही मुख्यमंत्री बनाता है जो उसकी सुने। इस वजह से भी चन्नी का दावा ज्यादा मजबूत बन गया।
आगे कौन सी चुनौतियां करेंगी कांग्रेस को परेशान?
राहुल ने कहा था कि नेता तय होने के बाद बाकी लोगों को उसकी मदद करनी होगी, लेकिन ऐसा होना आसान नहीं होगा। सिद्धू ने पहले अमरिंदर सिंह फिर चरणजीत चन्नी के खिलाफ लगातार मोर्चा खोल रखा था। उनके तेवर इतनी आसानी से नरम नहीं पड़ेंगे।
इस चुनाव में जिन उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा है उनमें 70% सिद्धू समर्थक बताए जाते हैं। ऐसे में चुनाव नतीजों में अगर सिद्धू समर्थक विधायकों की संख्या बल ज्यादा रहता है तो चन्नी के लिए सरकार चलाना बहुत मुश्किल हो सकता है। यहां तक कि अगर चुनाव नतीजे सिद्धू के पक्ष में रहते हैं तो हो सकता है कि नतीजे के बाद सिद्धू फिर से बगावती हो जाएं।
चन्नी को अब क्या करना होगा?
चन्नी को सबसे पहले तो सभी विरोधियों को साथ लाने की चुनौती होगी। जाखड़ से लेकर सिद्धू तक सबको साथ लेकर चलना होगा। सिद्धू जिस तरह की बयानबाजी करते हैं उससे भी निपटना चन्नी के लिए एक चुनौती होगी। जिन दोनों सीटों से चन्नी को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है उन्हें जीतकर खुद को बड़ा नेता साबित करने का मौका भी चन्नी के पास है।
क्या मुख्यमंत्री चेहरा नहीं बनाए जाने से कांग्रेस से अलग हो सकते हैं सिद्धू?
प्रोफेसर खालिद कहते हैं कि इसके आसार बिलकुल नहीं हैं। सिद्धू भाजपा छोड़कर आए हैं। सुखबीर बादल और विक्रमजीत सिंह मजीठिया से उनकी तल्खी जगजाहिर है। मजीठिया वैसे भी अमृतसर पूर्व में उनकी मुश्किल बढ़ा रहे हैं। सुखबीर बादल की वजह से वो भाजपा से निकले थे। ऐसे में उन्हें अपनी सीट पर जीत दर्ज करना ही बहुत बड़ी चुनौती हो सकती है। क्योंकि, भाजपा को सिद्धू से अपने हिसाब चुकता करने हैं, कैप्टन अमरिंदर सिंह भी उन्हें हराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देंगे। इन हालातों में सिद्धू के लिए फिलहाल कोई विकल्प नहीं है।