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सत्ता मिलते ही बदल गया शिअद का एजेंडा: प्रो. मनजीत
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 14 Dec 2013 11:50 PM IST
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आजादी से पहले के दलों में शिरोमणि अकाली दल शुमार है। जैसे कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के समाजवादी विचारधारा से कारपोरेट विचारधारा में तब्दीली की है, वैसे ही शिअद भी पंथक पार्टी से पूरी तरह गैर पंथक पार्टी का रूप अपना चुकी है।
हालांकि पार्टी पर सत्ता में आते ही पंथक एजेंडा छोड़ने के आरोप लगते रहे हैं, परंतु अब सत्ता में आने के लिए भी पंथक एजेंडा छोड़ दिया गया है।
1920 में बनी इस पार्टी का 14 दिसंबर को स्थापना दिवस है। शिरोमणि अकाली दल के महासचिव और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महासचिव रहे मनजीत सिंह कलकत्ता कहते हैं कि पार्टी पंथक हितों को पूरा करने के लिए बनी थी।
1966 तक पार्टी को सत्ता में आने का अवसर नहीं मिला, इसलिए इसने पंथक हितों पर फोकस किया।
आंदोलन के बाद बने न्यू पंजाब में पार्टी ने सत्ता का स्वाद चख लिया।
शिअद सत्ता में आने के लिए हमेशा पंथक एजेंडे को उभारती थी, लेकिन सत्ता में आते ही पार्टी के एजेंडे से यह गायब होता रहा है।
पंजाब विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री प्रो. मनजीत सिंह ने कहा कि अब जेलों में जाकर राजनीति की मेरिट बनाने वाले जत्थेदारों का दौर खत्म हो गया है।
अब अन्य दलों की तरह ही पैसे के जोर पर सत्ता में काबिज होने की क्षमता वाले नेता पार्टी पर लगातार दबदबा बना रहे हैं।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथी पार्टी की उच्च कमेटियों में हैं, लेकिन गुजरते समय के साथ लगातार उनका प्रभाव खत्म होता जा रहा है।
अकाली दल किसी समय हिंदू प्रत्याशी को टिकट नहीं देता था, लेकिन अब दल में सबसे ज्यादा हिंदू विधायक हैं।
वरिष्ठ समाजवादी नेता बलवंत सिंह खेड़ा ने कहा कि अकाली दल दोहरा रूप अपना रहा है।
पार्टी ने एसजीपीसी चुनाव लड़ने के लिए अलग हलफिया बयान देकर खुद को धार्मिक पार्टी और चुनाव आयोग को एक अलग हलफिया बयान देकर पार्टी को धर्म निष्पक्ष बताया है।
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इस संबंध में उन्होंने दिल्ली की एक अदालत में मुकदमा भी दायर कर रखा है।
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हालांकि पार्टी पर सत्ता में आते ही पंथक एजेंडा छोड़ने के आरोप लगते रहे हैं, परंतु अब सत्ता में आने के लिए भी पंथक एजेंडा छोड़ दिया गया है।
1920 में बनी इस पार्टी का 14 दिसंबर को स्थापना दिवस है। शिरोमणि अकाली दल के महासचिव और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महासचिव रहे मनजीत सिंह कलकत्ता कहते हैं कि पार्टी पंथक हितों को पूरा करने के लिए बनी थी।
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1966 तक पार्टी को सत्ता में आने का अवसर नहीं मिला, इसलिए इसने पंथक हितों पर फोकस किया।
आंदोलन के बाद बने न्यू पंजाब में पार्टी ने सत्ता का स्वाद चख लिया।
शिअद सत्ता में आने के लिए हमेशा पंथक एजेंडे को उभारती थी, लेकिन सत्ता में आते ही पार्टी के एजेंडे से यह गायब होता रहा है।
पंजाब विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री प्रो. मनजीत सिंह ने कहा कि अब जेलों में जाकर राजनीति की मेरिट बनाने वाले जत्थेदारों का दौर खत्म हो गया है।
अब अन्य दलों की तरह ही पैसे के जोर पर सत्ता में काबिज होने की क्षमता वाले नेता पार्टी पर लगातार दबदबा बना रहे हैं।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथी पार्टी की उच्च कमेटियों में हैं, लेकिन गुजरते समय के साथ लगातार उनका प्रभाव खत्म होता जा रहा है।
अकाली दल किसी समय हिंदू प्रत्याशी को टिकट नहीं देता था, लेकिन अब दल में सबसे ज्यादा हिंदू विधायक हैं।
वरिष्ठ समाजवादी नेता बलवंत सिंह खेड़ा ने कहा कि अकाली दल दोहरा रूप अपना रहा है।
पार्टी ने एसजीपीसी चुनाव लड़ने के लिए अलग हलफिया बयान देकर खुद को धार्मिक पार्टी और चुनाव आयोग को एक अलग हलफिया बयान देकर पार्टी को धर्म निष्पक्ष बताया है।
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इस संबंध में उन्होंने दिल्ली की एक अदालत में मुकदमा भी दायर कर रखा है।