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Hindi News ›   Punjab ›   Prime Minister Narendra Modi Declared to Celebrate 26 December every year as Veer Bal Diwas

वीर बाल दिवस: सिखों के इतिहास का सुनहरा पन्ना है चार साहिबजादों की शहादत, धर्म के लिए बलिदान का ऐसा उदाहरण कहीं नहीं

Mon, 10 Jan 2022 10:04 AM IST
निवेदिता वर्मा सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 10 Jan 2022 10:04 AM IST
सार

सिख और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए कुर्बानी देने वाले चार साहिबजादों की याद में 21 से 27 दिसंबर का सप्ताह बलिदानी सप्ताह के तौर पर मनाया जाता है। साहिबजादा अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने अपनी शहादत दे दी, लेकिन धर्म पर आंच नहीं आने दी।

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Prime Minister Narendra Modi Declared to Celebrate 26 December every year as Veer Bal Diwas
26 दिसंबर को मनाया जाएगा वीर बाल दिवस। - फोटो : ANI

विस्तार

सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों बाबा जोराबर सिंह, बाबा फतेह सिंह और माता गुजरी जी की मानवता की रक्षा के लिए दी गई कुर्बानी को नमन करते हुए रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर साल 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस मनाने की घोषणा की है। 

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दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबजादों की शहादत इतिहास का ऐसा सुनहरा पन्ना है, जिसका उदाहरण बिरला ही मिलता है। धर्म की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इस कारण उन्हें सरबंस दानी भी कहा गया। उनके चारों बेटों की याद में सिख बलिदानी सप्ताह यानी शहीदी दिहाड़ा मनाते हैं।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साहिबजादों की याद में वीर बाल दिवस की घोषणा ऐसे समय में की है, जब पंजाब चुनाव की दहलीज पर खड़ा है। यही वजह है कि उनके इस कदम को भी सिखों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कुछ दिन पहले ही कहा कि हमें हिंदू राष्ट्र से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जब हमारे सिख खालसा राज की बात करते हैं तो उन पर देशद्रोह के मामले दर्ज कर जेलों में धकेला जाता है। यह अन्याय है और सिख संगत को इस अन्याय के सामने डटकर खड़े होना होगा। असल में बड़ा वर्ग ऐसा है जो मानता है कि इतिहास लेखन में बड़ा छल हुआ है। देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले अनगिनत वीर सपूतों को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबजादों की शहादत भी ऐसे ही ऐतिहासिक अन्याय की भेंट चढ़ गई। 

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जुल्म की दास्तां और बहादुरी की मिसाल

सिख और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए कुर्बानी देने वाले चार साहिबजादों की याद में 21 से 27 दिसंबर का सप्ताह बलिदानी सप्ताह के तौर पर मनाया जाता है। साहिबजादा अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने अपनी शहादत दे दी, लेकिन धर्म पर आंच नहीं आने दी। खालसा पंथ की स्थापना के बाद मुगल शासकों, सरहिंद के सूबेदार वजीर खां के आक्रमण के बाद 20-21 दिसंबर 1704 को मुगल सेना से युद्ध करने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने परिवार सहित श्री आनंदपुर साहिब का किला छोड़ा। सरसा नदी पर गुरु गोबिंद सिंह जी का परिवार जुदा हो गया। बड़े साहिबजादे अजीत सिंह, जुझार सिंह गुरु जी के साथ रह गए, जबकि छोटे बेटे जोरावर सिंह और फतेह सिंह माता गुजरी जी के साथ थे। रास्ते में माता गुजरी जी को गंगू मिला, जो किसी समय पर गुरु महल की सेवा करता था। गंगू उन्हें बिछड़े परिवार से मिलाने का भरोसा देकर अपने घर ले गया। 


इसके बाद सोने की मोहरें के लालच में गंगू ने वजीर खां को उनकी खबर दे दी। वजीर खां के सैनिक माता गुजरी और 7 वर्ष के साहिबजादा जोरावर सिंह और 5 वर्ष के साहिबजादा फतेह सिंह को गिरफ्तार करके ले आए। उन्हें ठंडे बुर्ज में रखा गया। सुबह दोनों साहिबजादों को वजीर खां के सामने पेश किया गया, जहां उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा गया। लेकिन गुरु जी की नन्हीं जिंदगियों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। मुलाजिमों ने सिर झुकाने के लिए कहा तो दोनों ने जवाब दिया कि ‘हम अकाल पुरख और अपने गुरु पिता के अलावा किसी के भी सामने सिर नहीं झुकाते। ऐसा करके हम अपने दादा की कुर्बानी को बर्बाद नहीं होने देंगे, यदि हमने किसी के सामने सिर झुकाया तो हम अपने दादा को क्या जवाब देंगे, जिन्होंने धर्म के नाम पर सिर कलम करवाना सही समझा, लेकिन झुकना नहीं’।  वजीर खां ने दोनों को काफी डराया, धमकाया और प्यार से भी इस्लाम कबूल करने के लिए राजी करना चाहा, लेकिन दोनों अटल रहे। आखिर में दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवारों में चुनवाने का एलान किया गया। कहते हैं दोनों साहिबजादों को जब दीवार में चुनना आरंभ किया गया तब उन्होंने ‘जपुजी साहिब’ का पाठ शुरू कर दिया और दीवार पूरी होने के बाद अंदर से जयकारा लगाने की आवाज आई। दूसरी ओर साहिबजादों की शहीदी की खबर सुनकर माता गुजरी जी ने प्राण त्याग दिए। यह वाकया 27 दिसंबर सन 1704 को हुआ। इसकी खबर गुरुजी तक पहुंची तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है।  

साहिबजादा अजीत सिंह, जुझार सिंह की वीरता की कहानी 

अजीत सिंह श्री गुरु गोबिंद सिंह के सबसे बड़े पुत्र थे। चमकौर के युद्ध में अजीत सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। गुरु जी द्वारा नियुक्त किए गए पांच प्यारों ने अजीत सिंह को समझाने की कोशिश की कि वे युद्ध में ना जाएं। लेकिन पुत्र की वीरता को देखते हुए गुरु जी ने अजीत सिंह को स्वयं अपने हाथों से शस्त्र भेंट कर लड़ने भेजा। इतिहासकार बताते हैं कि रणभूमि में जाते ही अजीत सिंह ने मुगल फौज को कांपने पर मजबूर कर दिया। अजीत सिंह कुछ यूं युद्ध कर रहे थे मानो कोई बुराई पर कहर बरसा रहा हो। मुगल फौज पीछे भाग रही थी लेकिन अजीत सिंह के तीर खत्म होने लगे तो दुश्मनों ने उन्हें घेर लिया। लेकिन अजीत सिंह ने तलवार निकाली और अकेले ही मुगल फौज पर टूट पड़े। उन्होंने एक-एक करके मुगल सैनिकों का संहार किया, लेकिन तभी लड़ते-लड़ते उनकी तलवार भी टूट गई। महज 17 वर्ष की आयु में आखिरी सांस तक मुगलों से लड़ते हुए उन्होंने रणभूमि में शहादत दे दी। इनके नाम पर ही मोहाली का नाम साहिबजादा अजीत सिंह नगर रखा गया है। अजीत सिंह की शहादत के बाद साहिबजादा जुझार सिंह ने मोर्चा संभाला। वह भी उनके पदचिन्हों पर चलकर अतुलनीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 

गुरुजी के साहिबजादों की शहादत का बदला बाबा बंदा सिंह बहादुर ने लिया। उन्होंने सरहिंद में वजीर खान को उसके कर्मों की सजा दी और पूरे इलाके पर सिखों का आधिपत्य स्थापित किया। इसी बलिदान का परिणाम था कि आगे चल कर महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में एक बड़े सिख साम्राज्य का उदय हुआ। 

सराहनीय कदम, धर्म को मिलेगी मजबूती

अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार रंजीत सिंह का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कदम सराहनीय है। इससे सिख इतिहास को मजबूती मिलेगी और आने वाली तमाम पीढ़ियां दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार की शहादत को याद रखेंगी। उन्होंने परिवार की शहादत कर गुलामी से आजाद करवाया था। चारों साहिबजादों की शहादत की कोई दूसरी मिसाल इस धरती पर नहीं मिलती है।

एचजीपीसी ने सौंपा था ज्ञापन 

भाई बलजीत सिंह दादूवाल का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने 25 दिसंबर को ज्ञापन सौंपा था, जिसमें मांग की गई थी कि इस दिवस को शहादत का दिन घोषित किया जाए। यह मांग भारतीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन इकबाल सिंह के समक्ष भी की गई थी। पीएम ने सराहनीय कदम उठाते हुए सही फैसला लिया है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा सिखों के प्रति काफी सकारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं, जिसमें करतारपुर कॉरिडोर को खोलना, सिखों की काली सूची को खत्म करना आदि के लिए केंद्र सरकार का धन्यवाद है।

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