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नाइपर में शुरू हुआ आईटेक प्रोग्राम, 11 देश ले रहे हिस्सा

Thu, 22 Aug 2019 01:48 AM IST
Panchkula bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Thu, 22 Aug 2019 01:48 AM IST
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NYPER
मोहाली। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्टिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (नाइपर) में बुधवार से आईटेक प्रोग्राम की शुरुआत हुई। इसमें 11 देशों के प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं।
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आईटेक प्रोग्राम के चलते भारत का एशिया, अफ्रीका, पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिका, कैरिबियन देशों के साथ-साथ 161 देशों के साथ आर्थिक सहयोग है। इस प्रोग्राम के तहत भागीदार देशों के सदस्यों को भारतीय विकास के अनुभवों को साझा करने के लिए बुलाया गया है। 11 भागीदार देशों से 20 प्रतिभागी इस प्रोग्राम में हिस्सा ले रहे हैं। रीसेंट ट्रेंड्स एंड चेलेंजिस इन बायोफार्मास्युटिकल विषय पर दो हफ्ते के ट्रेनिंग प्रोग्राम में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, इथियोपिया, मिस्त्र, होंडुरस, ईरान, मॉरीशियस, मोजाम्बिक, सूडान, तंजानिया और जिम्बाब्वे हिस्सा ले रहे हैं। इस प्रोग्राम में बायोफार्मास्युटिकल इंडस्ट्री, एजुकेशन, रिसर्च इंस्टिट्यूट्स और रेगुलेटरी एजेंसियों के स्पेशलिस्ट अपने अनुभव साझा करने के साथ ही अपनी बात भी रखेंगे। जैव प्रोद्यागिकी तकनीक पर ट्रेनिंग के 3 सेशन होंगे इसके अलावा बायोफार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीस की विजिट भी इस प्रोग्राम का हिस्सा होगी।
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बुधवार को शुरू हुए इस प्रोग्राम का उद्घाटन दीप जलाकर सरस्वती वंदना से हुआ। कोर्स कॉर्डिनेटर डॉ. अभय एच पांडे ने मेहमानों और प्रतिभागियों को प्रोग्राम के बारे में बताया। बायोफार्मास्यिुटकल डिपार्टमेंट के प्रो. यूसी बैनर्जी ने विदेशी प्रतिभागियों को प्रोग्राम के महत्व के बारे में बताया। नाइपर के डायरेक्टर प्रो. रघुराम राव अक्किनेपल्ली ने विदेशी प्रतिभागियों को नाइपर के बारे में जानकारी दी। वहीं उन्होंने आईटेक प्रोग्राम की जिम्मेदारी देने के लिए विदेश मंत्रालय का धन्यवाद किया।
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रिसर्च की तरफ ध्यान देने से बायोफार्मा दवाओं की लागत होगी कम
समारोह में डॉ. संजय त्रेहन ने बतौर मुख्य मेहमान शिरकत की। उन्होंने कहा कि भारत वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के लिए सबसे बड़े वैक्सीन सप्लायर के रूप में उभर कर सामने आया है। बायोफार्मा दवाओं का बेहतर भविष्य है। हालांकि बायोफार्मा का उत्पादन जेनरिक दवाओं के उत्पादन की तुलना में मुश्किल है। उन्होंने हर साइंटिस्ट को रिसर्च की तरफ ज्यादा ध्यान देने को कहा ताकि कम लागत में बायोफार्मा दवाओं का उत्पादन हो सके और हर आदमी उन्हें खरीदने में सक्षम हो।
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