मोहाली के हाल: सिंचाई और औद्योगिकीकरण से गिर रहा जिले का भूजल स्तर, दो सब डिवीजन डॉर्क जोन में
मोहाली में अभी करीब 200 कुएं हैं। इनमें से करीब 164 निजी हैं और इसके बराबर ही ट्यूबवेल भी हैं। हालांकि सरकार खेती के नए तरीके अपना रही है। लेकिन स्थिति सुधरने में समय लगेगा। इसी तरह अधिकतर सरकारी इमारतों सहित बड़े संस्थानों और स्कूलों में रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं।
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भले ही पांच नदियों की गोद में बसे प्रदेश को पंजाब कहा जाता है लेकिन इसी प्रदेश के वीआईपी जिले मोहाली का भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक औसतन एक साल में सात फुट तक भूजल स्तर नीचे गिर रहा है। गिरते जल स्तर से कई तरह की बीमारियां भी लग रही हैं। इसमें मोहाली जिला अलार्मिंग स्थिति में है। जिले के खरड़ और डेराबस्सी हलकों को डॉर्क जोन में शामिल किया गया है।
गिरते भूजल स्तर का सबसे बड़ा कारण खेतों में होने वाली सिंचाई और औद्योगिकीकरण है। लगातार खेतों में भूमिगत सिंचाई से लगातार स्थिति बिगड़ने लगी है। जिले में सिंचाई भूमिगत जल पर निर्भर है। जिले में कुल फसली क्षेत्र 1,09,000 हेक्टेयर है। इसमें शुद्ध सिंचित क्षेत्र 77,000 हेक्टेयर है। जबकि नहरी और ट्यूबवेल सिंचित क्षेत्र 99,000 हेक्टेयर है।
जिले में अभी करीब 200 कुएं हैं। इनमें से करीब 164 निजी हैं और इसके बराबर ही ट्यूबवेल भी हैं। हालांकि सरकार खेती के नए तरीके अपना रही है। लेकिन स्थिति सुधरने में समय लगेगा। इसी तरह अधिकतर सरकारी इमारतों सहित बड़े संस्थानों और स्कूलों में रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोर्ट में दो सब डिवीजन का जिक्र किया गया है। उधर, नगर निगम और जल सप्लाई विभाग का दावा है कि पानी की बर्बादी को रोकने के लिए चेकिंग की जाती है। पानी वैसे बर्बाद नहीं होता है, बल्कि सिंचाई में ज्यादा जाता है। ऐसे में वितरण सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है। स्काडा सिस्टम लगाया गया है, जिससे जहां भी पानी की बर्बादी हो पता चल सके। इसके अलावा जागरूकता मुहिम और चालान मुहिम भी चलाई जाती है।
ऐसे रोगों से पीड़ित हो रहे लोग
भूजल स्तर तेजी से गिरने के बावजूद जमीनी पानी का जरूरत से ज्यादा दोहन हानिकारक रसायनों को ऊपर ले आता है। पर्यावरणविद बताते हैं कि भूजल स्तर के काफी नीचे गिर जाने के बाद भी हो रहे दोहन के कारण आर्सेनिक, फ्लोराइड जैसे घातक रसायन पानी के साथ आते हैं, जो गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। जंगलों की घटती संख्या और फसली चक्र में बदलाव न किया जाना भी इसके लिए जिम्मेदार है। इससे आदमी से लेकर पशु तक बीमार हो रहे हैं। आर्सेनिक भी सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह है। इसके लक्षणों में अतिसार वमन, शरीर में ऐंठन आदि देखने को मिलती है। यह फेफड़ों, किडनी, लीवर और त्वचा को प्रभावित करता है। इससे किडनी और लीवर का कैंसर भी हो सकता है। भूजल में नाइट्रेट की मौजूदगी कैंसर कारक है। इसके कारण छोटे बच्चों में साइनोसिस नाम का रोग होता है जिसे बच्चों का नीला रोगज (ब्लू बेबी सिंड्रोम) भी कहते हैं। यह मवेशियों को भी प्रभावित करता है, जिससे उनके दुग्ध उत्पादन में भारी कमी आ जाती है।
सीजीडब्ल्यू बोर्ड और आईआईटी मुंबई के सुझावों पर नहीं हुआ काम
मोहाली में बारिश के दौरान सबसे बड़ी समस्या जलभराव की होती है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड ने मोहाली में रेन हार्वेस्टिंग के जरिए बारिश के पानी को रीफिल करने का सुझाव दिया था। इसके बाद नगर निगम ने फेज-3 में दो जगह रीफिलिंग के लिए सिस्टम लगाए थे। इससे जलभराव से निपटने में भी फायदा हुआ। नगर निगम दो रीफिलिंग सिस्टम लगाकर चुप बैठ गया। वहीं, कुछ साल पहले मुंबई आईआईटी की टीम ने सर्वे कर गमाडा को हर 50 मीटर की दूरी पर रीफिलिंग के लिए रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने का सुझाव दिया था। गमाडा ने आज तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की है।
ऐसे सुधारा जा रहा है गिरता भूजल स्तर
जिले में भूजल के गिरते स्तर को सुधारने के लिए माजरी एरिया में चार प्रोजेक्ट इस समय चल रहे हैं। इनमें 75 मीटर गहरे तक चार कुएं शामिल हैं। डैम भी जल स्तर को गिरने से रोक रहे हैं। इसी तरह खेती के पैटर्न, सिंचाई नीति में बदलाव, अलाइन चैनलों की लाइनिंग, धान की समय पर बुआई, स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई आदि को बढ़ावा देकर इस चीज में जोर दिया जा रहा है, जिससे किसी तरह इसे रोका जाए। यहां तक कि मोहाली से खरड़ तक बनाए गए फ्लाईओवर में वर्षा के पानी को भी रिचार्ज के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए रेन वाटर हार्वेसिस्टंग सिस्टम लगाया है। इसके अलावा कई डैमों और नदियों का जिक्र पंजाब सरकार की रिपोर्ट में किया गया है। जिससे गिरता भूजल स्तर रुकेगा।
शहर में नहरी पानी की सप्लाई से रोकेंगे गिरता भूजल स्तर
शहर में अभी तक ट्यूबवेल चल रहे हैं। लेकिन आने वाले 10-12 दिनों में हमें कजौली वाटर वर्क्स से करीब बीएस एमजीडी पानी मिल जाएगा। जिससे पूरे शहर में नहरी पानी की सप्लाई होगी। नहरी पानी गिरते भूजल स्तर को रोकने में अहम कड़ी की भूमिका निभाता है। जहां पर लोग खुद अपने लिए पानी की बर्बादी नहीं करते हैं। शहरी एरिया में 135 लीटर प्रति दिन एक व्यक्ति को पानी जरूरत है। जो हम मुहैया करवा रहे हैं। - सुनील कुमार, एक्सईएन वाटर सप्लाई विभाग।