किसान आंदोलन की यादगारें: संघर्ष में जीने का सहारा बनीं झोपड़ियां अब आगामी पीढ़ियों को करेंगी प्रेरित
मोहाली के आसपास के गांवों के किसान हजारों की संख्या में आंदोलन में शामिल हुए थे। संघर्ष स्थगित होने के बाद दिल्ली की सीमाओं से यादों को संजोया जा रहा है। इसके लिए बाकायदा किसानों के परिवार गाड़ियां और अन्य सामान लेकर वहां गए हैं।
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किसान आंदोलन के दौरान किसानों ने जिन चीजों के सहारे समय बिताया था, अब वह सभी चीजें उनकी आने वाले वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेंगी। दिल्ली में आंदोलन स्थगित होने के बाद वहां बनाई गई अस्थायी झोपड़ियों और अस्पतालों को किसान बड़ी ट्रॉलियों में लादकर गांव ला रहे हैं। इन चीजों को अपने गांवों में स्थापित करेंगे। किसानों की मानें तो इन चीजों की कीमत किसी के लिए मात्र कुछ हजार रुपये से ज्यादा नहीं है। लेकिन उनके लिए यह किसी हीरे से कम नहीं है। क्योंकि इस संघर्ष में करीब 800 लोगों ने अपनी जान दी है। तब जाकर जीत की खुशियां हमारे घरों में आई हैं।
मोहाली के आसपास के गांवों के किसान हजारों की संख्या में आंदोलन में शामिल हुए थे। संघर्ष स्थगित होने के बाद दिल्ली की सीमाओं से यादों को संजोया जा रहा है। इसके लिए बाकायदा किसानों के परिवार गाड़ियां और अन्य सामान लेकर वहां गए हैं। मोहाली के किसानों की ओर से अपने रहने और बारिश से राशन-पानी को बचाने के लिए एक कलाकृतियों वाली झोपड़ी बनाई गई थी। इसके बाहर एक पार्क बनाया गया था, जिन्हें वे बठिंडा से आए किसानों के साथ साझा करते थे। संघर्ष खत्म हुआ तो किसानों ने झोपड़ी को तोड़ना मुनासिब नहीं समझा। मोहाली और बठिंडा के किसानों की ओर से श्रद्धा के साथ बनाई गई झोपड़ी को मोहाली से होते हुए बठिंडा ले जाया गया है, वहां पर उसे स्थापित किया जाएगा।
बठिंडा के किसानों को सम्मानित करके भेजा
मोहाली के किसानों ने दिल्ली संघर्ष में जो समय बिताया उन यादों को बयां नहीं किया जा सकता था। इसको देखते हुए किसानों ने अपनी यादें संजोए रखने के लिए दिल्ली बॉर्डर पर बनाई झोपड़ी को नई पीढ़ी के किसानों के देखने के लिए संभाल कर रखने का फैसला किया। बेस्टेक मॉल पर पक्का मोर्चा का नेतृत्व कर रहे गुरप्रीत सिंह धालीवाल ने बताया कि वह दिल्ली आंदोलन से पहले दिन से जुड़े हुए थे। यादगार झोपड़ी को बठिंडा के किसान साथियों ने संभालने का जिम्मा लिया है।
ऐसे में झोपड़ी को मोहाली के गांव मनौली के रहने वाले गुरतेज सिंह, जो ट्राला चलाते हैं, ने दिल्ली से बठिंडा तक ले जाने का खर्च सहित जिम्मा अपने हाथ में लिया था। उन्होंने बताया कि जब सभी किसान सिंघु बॉर्डर से चले गए थे तो मोहाली और बठिंडा के किसान कुटिया को लाने की तैयारियां कर रहे थे। इसके बाद सोमवार को इस झोंपड़ी को बेस्टेक मॉल के पास किसान मोर्चे में लाया गया। इस मौके पर बठिंडा के किसानों को फूल मालाओं और सिरोपा भेंट कर बठिंडा के लिए रवाना किया गया।
गुरुद्वारों में रखा जाएगा यह सामान
किसान जगवंत सिंह ने बताया कि दिल्ली संघर्ष में बचा राशन किसानों ने वहीं के आसपास के लोगों में बांट दिया था। इसके साथ ही वहां इस्तेमाल होने वाली जरूरत की चीजें, जिसमें गद्दे, पंखे, बर्तन, पानी की टंकी, चारपाइयां, बिस्तरे, चूल्हे आदि सामान को भविष्य में होने वाले संघर्षों के लिए, मोहाली के गांवों में बने गुरुद्वारों में रखा जाएगा।