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Panchkula News: पर्यावरण रहेगा सुरक्षित, गोकाष्ठ से होगा अंतिम संस्कार, हवन और लोहड़ी
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पंचकूला। जिले के गोशालाओं को आत्म निर्भर बनाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक खास मुहिम चलाई जा रही है। इसकी शुरुआत पिंजौर कामधेनु गोशाला और कालका राधे श्याम गोशाला की ओर से की गई है। दोनों गोशालाओं में गोकाष्ठ (गोबर की लकड़ी) का निर्माण किया जा रहा है। इसका उपयोग हवन, होलिका दहन, लोहड़ी व अंतिम संस्कार सहित पूजा-पाठ में किया जाता है। इसके साथ ही पेड़ों की लगातार हो रही कटाई से छुटकारा मिलेगा।
कामधेनु गोशाला के चेयरमैन नवराज राय धीर ने बताया कि पिंजौर और कालका की गोशाला में गाय के गोबर से लकड़ी यानि गोकाष्ठ तैयार करने की प्रक्रिया शुरु की गई है। इसका इस्तेमाल अंतिम संस्कार, हवन, होली, दिवाली या अन्य पूजा पाठ में किया जाएगा। ऐसा करने से गोशाला आत्मनिर्भर बनेंगी। साथ ही बड़े पेड़ों का बचाया जा सकेगा और प्रदूषण भी कम होगा। धीर ने आगे कहा कि श्मशान घाटों में हर महीने हजारों क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल होता है। इसके लिए हरे-भरे पेड़ों की बलि चढ़ाई जाती है, जबकि एक पौधे को पेड़ बनने में कई साल लग जाते हैं।
हर दिन तैयार होती है गोकाष्ठ
कामधेनु गोशाल में हर दिन 5 से 10 क्विंटल तक गोकाष्ठ तैयार की जाती है। इसमें करीब 15 क्विंटल गोबर का इस्तेमाल होता है। गोकाष्ठ को तैयार करने में करीब चार घंटे का समय लगाता है, इसमें दो लोगों की जरूरत होती है। - जयंत, इंजीनियर, कामधेनु गोशाला पिंजौर, पंचकूला
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राधे श्याम गोशाला में इतना निर्माण
10 क्विंटल गोकाष्ठ का निर्माण हर दिन होता है। यहां से कालका श्मशान घाट के लिए गोकाष्ठ जाती है। इसकी कीमत 10 रुपये किग्रा है। एक अंतिम संस्कार में करीब तीन क्विंटल गोकाष्ठ लगती है। इसके साथ ही होटल, ढाबों के लिए भी सप्लाई होती है। -राधे श्याम गोशाला प्रधान, खुशदेव, कालका पंचकूला।
लकड़ी और गोकाष्ठ में अंतर
श्मशान घाट के प्रबंधक के अनुसार एक अंतिम संस्कार में पौने चार क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल होता है, जबकि एक सामान्य पेड़ से करीब तीन क्विंटल लकड़ी निकलती है। इसके एवज में दो से तीन पेड़ को काटना पड़ता है। वर्तमान में सामान्य लकड़ी की कीमत 700 से 800 रुपये प्रति क्विंटल है। अंतिम संस्कार के लिए गोकाष्ठ की कीमत 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल है। कम खर्च के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह बेहतर विकल्प है।
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कामधेनु गोशाला के चेयरमैन नवराज राय धीर ने बताया कि पिंजौर और कालका की गोशाला में गाय के गोबर से लकड़ी यानि गोकाष्ठ तैयार करने की प्रक्रिया शुरु की गई है। इसका इस्तेमाल अंतिम संस्कार, हवन, होली, दिवाली या अन्य पूजा पाठ में किया जाएगा। ऐसा करने से गोशाला आत्मनिर्भर बनेंगी। साथ ही बड़े पेड़ों का बचाया जा सकेगा और प्रदूषण भी कम होगा। धीर ने आगे कहा कि श्मशान घाटों में हर महीने हजारों क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल होता है। इसके लिए हरे-भरे पेड़ों की बलि चढ़ाई जाती है, जबकि एक पौधे को पेड़ बनने में कई साल लग जाते हैं।
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हर दिन तैयार होती है गोकाष्ठ
कामधेनु गोशाल में हर दिन 5 से 10 क्विंटल तक गोकाष्ठ तैयार की जाती है। इसमें करीब 15 क्विंटल गोबर का इस्तेमाल होता है। गोकाष्ठ को तैयार करने में करीब चार घंटे का समय लगाता है, इसमें दो लोगों की जरूरत होती है। - जयंत, इंजीनियर, कामधेनु गोशाला पिंजौर, पंचकूला
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राधे श्याम गोशाला में इतना निर्माण
10 क्विंटल गोकाष्ठ का निर्माण हर दिन होता है। यहां से कालका श्मशान घाट के लिए गोकाष्ठ जाती है। इसकी कीमत 10 रुपये किग्रा है। एक अंतिम संस्कार में करीब तीन क्विंटल गोकाष्ठ लगती है। इसके साथ ही होटल, ढाबों के लिए भी सप्लाई होती है। -राधे श्याम गोशाला प्रधान, खुशदेव, कालका पंचकूला।
लकड़ी और गोकाष्ठ में अंतर
श्मशान घाट के प्रबंधक के अनुसार एक अंतिम संस्कार में पौने चार क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल होता है, जबकि एक सामान्य पेड़ से करीब तीन क्विंटल लकड़ी निकलती है। इसके एवज में दो से तीन पेड़ को काटना पड़ता है। वर्तमान में सामान्य लकड़ी की कीमत 700 से 800 रुपये प्रति क्विंटल है। अंतिम संस्कार के लिए गोकाष्ठ की कीमत 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल है। कम खर्च के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह बेहतर विकल्प है।