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किडनैपिंग मामले में दो पुलिस वालों को उम्र कैंद
Updated Sun, 30 Sep 2018 01:25 AM IST
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- सीबीआई की विशेष अदालत ने सुनाया फैसला
- पीड़ित परिवार को मिलेगा एक लाख रुपये का मुआवजा
- दोषियों को पटियाला जेल भेजा, बोले जाएंगे हाईकोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
मोहाली। 26 साल पुराने हरजीत सिंह उर्फ गौरा 24 की किडनैपिंग, अवैध कस्टडी में रखने व साजिश रचने के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दो रिटायर पुलिस मुलाजिमों को दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई है। दोषियों में इंस्पेक्टर ज्ञान सिंह व सब इंस्पेक्टर नरिंद सिंह मल्ली शामिल हैं। नरिंदर सिंह को पहले चार महिलाओं के माथे पर जेब कतरियां लिखने के मामले में सजा हो चुकी है।
अदालत द्वारा दोषियों को आईपीसी की धारा 364 के तहत उम्र कैद व पचास हजार रुपये जुर्माना, धारा -344 के तहत दो साल की कैद व पांच हजार जुर्माना व धारा 120 बी के के तहत दो साल पांच हजार जुर्माना लगाया है। पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये मुआवजा भी दिया जाएगा। यह फैसला सीबीआई के विशेष जज हरजीत सिंह की अदालत ने सुनाया। दोषियों को सजा सुनाए जाने के बाद पटियाला जेल भेज दिया गया। हालांकि आरोपियों ने कहा कि उन्होंने पंजाब से आतंकवाद मिटाने के लिए काम किया है। इस फैसले के खिलाफ वह हाईकोर्ट की शरण लेंगे।
आंखों पर पट्टियां बांधकर उठा ले गए थे घर से
जानकारी के मुताबिक यह मामला अमृतसर जिले के गांव पट्टी बलोल में 11 नवंबर 1992 को सामने आया था। जब हरजीत सिंह उर्फ गोरा व उसके पिता बलबीर सिंह को आंखों में काली पट्टियां बांधकर पुलिस जबरदस्ती घर से उठाकर ले गई। इस टीम की अगुवाई में सब इंस्पेक्टर नरिंदर सिंह मल्ली कर रहे थे। केवल एक दिन बलबीर सिंह को सुल्तानविंड थाने में रखा गया। इसके बाद विजय नगर पुलिस थाने में शिफ्ट कर दिया गया।
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लोग पिता को छुड़ा लाए, बेटे का नहीं लगा सुराग
करीब 22 दिनों तक बलबीर सिंह को गैर कानूनी तरीके से हिरासत में रखा। उसका किसी तरह का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। इसके बाद जब इलाके के लोग थाने में इकट्ठे होकर गए और बलबीर सिंह को छुड़ाकर लाए थे। हालांकि हरजीत सिंह उर्फ गोरा को भी पिता के साथ उठाया गया था। लेकिन तब से लेकर अब तक उसका कोई सुराग नहीं है। परिवार का मानना है कि पुलिस वालों ने उसे मौत के घाट उतार दिया है।
पिता पुत्र को उठाने के बाद एक बेटे का कर दिया था एनकाउंट
बलबीर सिंह व उनका बेटा हरजीत सिंह गौरा दोनों मिस्त्री का करते थे। बलबीर सिंह के चार बेटे व तीन बेटियां थी। इनमें से हरजीत सिंह उर्फ गौरा का 26 सालों से कोई पता नहीं है। जबकि जब पुलिस ने हरजीत व उसके पिता को उठाया था । इसी बीच 21 नवंबर 1992 को उनके बेटे कुलदीप सिंह उर्फ काला की पुलिस एनकाउंटर में हत्या कर दी थी। परिवार व इलाके के लोगों को अखबार से पता चला था कि कुलदीप की हत्या कर दी गई है।
बेटे की तलाश में डीजीपी से लेकर सीएम तक पहुंचे
बलबीर सिंह को जब आरोपियों की अवैध कस्टडी से छूट कर आए तो उन्होंने अपने बेटे की तलाश में पूरी जान लगा दी, लेकिन उन्हें अपने बेटे का कहीं सुराग नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने इस मामले में 20 दिसंबर 1992 और पंद्रह मार्च 1993 को डीजीपी पंजाब से मुलाकात की। साथ ही उनसे अपने बेटे को तलाशने की गुहार लगाई। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पंजाब को भी पत्र लिखा। लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की शरण ली थी।
फिर मामला पहुंच गया सीबीआई के पास
इसके बाद पांच सितंबर 97 दोषी नरिंदर सिंह मल्ली की तरफ से एक एफिडेविट दिया। साथ ही कहा कि उसे हरजीत के बारे में कोई नॉलेज नहीं है। 1999 में सीबीआई ने केस की जांच शुरू की। हालांकि मौजूदा केस सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुआ था। 2001 में सीबीआई ने चालान पेश किया। इसमें उनकी तरफ से चार गवाह और सबूत रखे थे। इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट की शरण ली। साथ ही मामले पर स्टे लग गई। 2018 में मामले की नए सिरे से शुरू हुई थी।
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- पीड़ित परिवार को मिलेगा एक लाख रुपये का मुआवजा
- दोषियों को पटियाला जेल भेजा, बोले जाएंगे हाईकोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
मोहाली। 26 साल पुराने हरजीत सिंह उर्फ गौरा 24 की किडनैपिंग, अवैध कस्टडी में रखने व साजिश रचने के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दो रिटायर पुलिस मुलाजिमों को दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई है। दोषियों में इंस्पेक्टर ज्ञान सिंह व सब इंस्पेक्टर नरिंद सिंह मल्ली शामिल हैं। नरिंदर सिंह को पहले चार महिलाओं के माथे पर जेब कतरियां लिखने के मामले में सजा हो चुकी है।
अदालत द्वारा दोषियों को आईपीसी की धारा 364 के तहत उम्र कैद व पचास हजार रुपये जुर्माना, धारा -344 के तहत दो साल की कैद व पांच हजार जुर्माना व धारा 120 बी के के तहत दो साल पांच हजार जुर्माना लगाया है। पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये मुआवजा भी दिया जाएगा। यह फैसला सीबीआई के विशेष जज हरजीत सिंह की अदालत ने सुनाया। दोषियों को सजा सुनाए जाने के बाद पटियाला जेल भेज दिया गया। हालांकि आरोपियों ने कहा कि उन्होंने पंजाब से आतंकवाद मिटाने के लिए काम किया है। इस फैसले के खिलाफ वह हाईकोर्ट की शरण लेंगे।
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आंखों पर पट्टियां बांधकर उठा ले गए थे घर से
जानकारी के मुताबिक यह मामला अमृतसर जिले के गांव पट्टी बलोल में 11 नवंबर 1992 को सामने आया था। जब हरजीत सिंह उर्फ गोरा व उसके पिता बलबीर सिंह को आंखों में काली पट्टियां बांधकर पुलिस जबरदस्ती घर से उठाकर ले गई। इस टीम की अगुवाई में सब इंस्पेक्टर नरिंदर सिंह मल्ली कर रहे थे। केवल एक दिन बलबीर सिंह को सुल्तानविंड थाने में रखा गया। इसके बाद विजय नगर पुलिस थाने में शिफ्ट कर दिया गया।
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लोग पिता को छुड़ा लाए, बेटे का नहीं लगा सुराग
करीब 22 दिनों तक बलबीर सिंह को गैर कानूनी तरीके से हिरासत में रखा। उसका किसी तरह का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। इसके बाद जब इलाके के लोग थाने में इकट्ठे होकर गए और बलबीर सिंह को छुड़ाकर लाए थे। हालांकि हरजीत सिंह उर्फ गोरा को भी पिता के साथ उठाया गया था। लेकिन तब से लेकर अब तक उसका कोई सुराग नहीं है। परिवार का मानना है कि पुलिस वालों ने उसे मौत के घाट उतार दिया है।
पिता पुत्र को उठाने के बाद एक बेटे का कर दिया था एनकाउंट
बलबीर सिंह व उनका बेटा हरजीत सिंह गौरा दोनों मिस्त्री का करते थे। बलबीर सिंह के चार बेटे व तीन बेटियां थी। इनमें से हरजीत सिंह उर्फ गौरा का 26 सालों से कोई पता नहीं है। जबकि जब पुलिस ने हरजीत व उसके पिता को उठाया था । इसी बीच 21 नवंबर 1992 को उनके बेटे कुलदीप सिंह उर्फ काला की पुलिस एनकाउंटर में हत्या कर दी थी। परिवार व इलाके के लोगों को अखबार से पता चला था कि कुलदीप की हत्या कर दी गई है।
बेटे की तलाश में डीजीपी से लेकर सीएम तक पहुंचे
बलबीर सिंह को जब आरोपियों की अवैध कस्टडी से छूट कर आए तो उन्होंने अपने बेटे की तलाश में पूरी जान लगा दी, लेकिन उन्हें अपने बेटे का कहीं सुराग नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने इस मामले में 20 दिसंबर 1992 और पंद्रह मार्च 1993 को डीजीपी पंजाब से मुलाकात की। साथ ही उनसे अपने बेटे को तलाशने की गुहार लगाई। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पंजाब को भी पत्र लिखा। लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की शरण ली थी।
फिर मामला पहुंच गया सीबीआई के पास
इसके बाद पांच सितंबर 97 दोषी नरिंदर सिंह मल्ली की तरफ से एक एफिडेविट दिया। साथ ही कहा कि उसे हरजीत के बारे में कोई नॉलेज नहीं है। 1999 में सीबीआई ने केस की जांच शुरू की। हालांकि मौजूदा केस सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुआ था। 2001 में सीबीआई ने चालान पेश किया। इसमें उनकी तरफ से चार गवाह और सबूत रखे थे। इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट की शरण ली। साथ ही मामले पर स्टे लग गई। 2018 में मामले की नए सिरे से शुरू हुई थी।