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अब प्रबंधकीय कांप्लेक्स जाने पर होंगे जंगल के दीदार
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मोहाली। गुरु नानक देव के 550वें प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में अब प्रशासन ने प्रकृति के करीब जाने की कोशिश शुरू की है। इसके तहत जापानी तकनीक से सेक्टर-76 प्रबंधकीय कांप्लेक्स में खाली पड़ी जगह पर जंगली क्षेत्र विकसित किया जाएगा। ऐसी तकनीक अपनाने वाला मोहाली पंजाब का पहला जिला बन गया है।
एडीसी साक्षी साहनी ने बताया कि जिला प्रशासन ने इको सिख नाम की संस्था के साथ मिलकर यह कार्य शुरू किया है। जिला प्रबंधकीय कांप्लेक्स में खाली पड़ी जगह में 550 पौधे लगाकर एक जंगलनुमा क्षेत्र तैयार किया जा रहा है। इस तकनीक का पूरा नाम मियावाकी तकनीक है। इस तकनीक में उस एरिया में होने वाले पौधे ही लगाए जाते हैं, ताकि इनके विकास में कोई रुकावट न आए। वहीं, प्रोजेक्ट का सोमवार को आगाज हो गया है। जिला जंगलात अफसर डीएफओ गुरअमनप्रीत सिंह ने बताया कि यह तकनीक शहरी क्षेत्र में थोड़ी सी जगह के लिए बेहद कारगर है। इससे जहां जैविक विभिन्नता बनाए रखने में मदद मिलती है, साथ ही पौधों के विकसित होने की संभावना सबसे अधिक रहती है। इस तकनीक से पौधों की जड़ें एक-दूसरे के साथ जुड़ जाती हैं, जिससे उनका विकास तेजी से होता है। वहीं, ऐसे पौधों में पक्षी भी अपने आपको को सुरक्षित समझते हैं।
ऐसे तैयार किया जा रहा जंगल
इको संस्था के नुमाइंदे गुरप्रीत सिंह ने बताया कि पहले दो स्थानों पर तीन फुट तक खुदाई की जा रही है। इसके बाद तूड़ी, पराली के खाद का मिक्सचर तैयार करके भरा जाता है। इसके ऊपर पौधे लगाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह तकनीक इतनी कारगर है कि पौधों को साल या डेढ़ साल बाद पानी देने की जरूरत होती है, जोकि इस मिक्सचर से पूरी हो जाती है।
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गुरबाणी में जिन पौधों का जिक्र वही लगाए जाएंगे
संस्था के नुमाइंदों ने बताया कि यहां पर ढक, अर्जुन, किकर, बेहड़ा, जामुन, देसी अंब, बबूल, नीम, सिंबल, महुआ जैसे 40 किस्मों के पौधे लगाए जाएंगे। यह सारे वह पौधे हैं, जिनका जिक्र गुरबाणी में भी होता है।
क्या है यह जापानी तकनीक
यह तकनीक जापानी वनस्पति विज्ञानी अकिरा मियावाकी ने शुरू की है, जिनके नाम पर ही इस तकनीक का नाम पड़ा है। इस तकनीक के तहत थोड़ी-थोड़ी जगह पर दो टीले बनाकर पौधे लगाकर जंगली क्षेत्र तैयार किया जा सकता है। इस तकनीक से पौधे दस गुणा तेजी से बढ़ते है। वहीं, जंगल से पौधे 30 गुना घने होते हैं। दो साल में पौधो का विकास कई गुना हो जाता है। यह तकनीक प्रतिकूल वातावरण में लाभदायक रहती है।
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एडीसी साक्षी साहनी ने बताया कि जिला प्रशासन ने इको सिख नाम की संस्था के साथ मिलकर यह कार्य शुरू किया है। जिला प्रबंधकीय कांप्लेक्स में खाली पड़ी जगह में 550 पौधे लगाकर एक जंगलनुमा क्षेत्र तैयार किया जा रहा है। इस तकनीक का पूरा नाम मियावाकी तकनीक है। इस तकनीक में उस एरिया में होने वाले पौधे ही लगाए जाते हैं, ताकि इनके विकास में कोई रुकावट न आए। वहीं, प्रोजेक्ट का सोमवार को आगाज हो गया है। जिला जंगलात अफसर डीएफओ गुरअमनप्रीत सिंह ने बताया कि यह तकनीक शहरी क्षेत्र में थोड़ी सी जगह के लिए बेहद कारगर है। इससे जहां जैविक विभिन्नता बनाए रखने में मदद मिलती है, साथ ही पौधों के विकसित होने की संभावना सबसे अधिक रहती है। इस तकनीक से पौधों की जड़ें एक-दूसरे के साथ जुड़ जाती हैं, जिससे उनका विकास तेजी से होता है। वहीं, ऐसे पौधों में पक्षी भी अपने आपको को सुरक्षित समझते हैं।
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ऐसे तैयार किया जा रहा जंगल
इको संस्था के नुमाइंदे गुरप्रीत सिंह ने बताया कि पहले दो स्थानों पर तीन फुट तक खुदाई की जा रही है। इसके बाद तूड़ी, पराली के खाद का मिक्सचर तैयार करके भरा जाता है। इसके ऊपर पौधे लगाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह तकनीक इतनी कारगर है कि पौधों को साल या डेढ़ साल बाद पानी देने की जरूरत होती है, जोकि इस मिक्सचर से पूरी हो जाती है।
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गुरबाणी में जिन पौधों का जिक्र वही लगाए जाएंगे
संस्था के नुमाइंदों ने बताया कि यहां पर ढक, अर्जुन, किकर, बेहड़ा, जामुन, देसी अंब, बबूल, नीम, सिंबल, महुआ जैसे 40 किस्मों के पौधे लगाए जाएंगे। यह सारे वह पौधे हैं, जिनका जिक्र गुरबाणी में भी होता है।
क्या है यह जापानी तकनीक
यह तकनीक जापानी वनस्पति विज्ञानी अकिरा मियावाकी ने शुरू की है, जिनके नाम पर ही इस तकनीक का नाम पड़ा है। इस तकनीक के तहत थोड़ी-थोड़ी जगह पर दो टीले बनाकर पौधे लगाकर जंगली क्षेत्र तैयार किया जा सकता है। इस तकनीक से पौधे दस गुणा तेजी से बढ़ते है। वहीं, जंगल से पौधे 30 गुना घने होते हैं। दो साल में पौधो का विकास कई गुना हो जाता है। यह तकनीक प्रतिकूल वातावरण में लाभदायक रहती है।