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गिरने के कगार पर मुक्तसर की जामा मस्जिद
अमर उजाला, मुक्तसर
Updated Mon, 18 Nov 2013 11:08 PM IST
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मुक्तसर की करीब एक सौ बीस वर्ष पुरानी ऐतिहासिक जामा मस्जिद गिरने की कगार पर है। मस्जिद की अंदरूनी इमारत की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं। दीवारों पर मीनाकारी भी धुंधली हो गई है।
अंदर फर्श कई जगहों से धंस गया है। मस्जिद के जर्जर हालत में पहुंचने के बावजूद इस इमारत के नीचे बने प्रार्थना हाल पर कुछ लोगों का कथित अतिक्रमण है। यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में है।
इस कारण इसका पुनर्निर्माण संभव नहीं हो पा रहा है। अगर यह इमारत गिरती है तो यहां जानमाल का भारी नुकसान हो सकता है।
रेलवे रोड पर करीब दो एकड़ जगह में बनी इस दो मंजिला जामा मस्जिद का निर्माण 1894 में हुआ था। मस्जिद के लिए जगह का इंतजाम महाराजा रणजीत सिंह के जरनैल हरी सिंह नलुआ ने किया था।
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नलुआ सभी धर्मों का सत्कार और उनकी रक्षा करते थे। उनकी अगुवाई में 16 नवंबर 1894 को मौलवी रजब अली, मियां बदरुद्दीन शाह तथा नवाब ममदोट गांव मगफूर वाली जलालाबाद (फिरोजपुर) ने नींव रख कर इस मजिस्द का निर्माण शुरू करवाया था। आज यहां न सिर्फ मुक्तसर शहर, आसपास कस्बों और गांवों के मुस्लिम समुदाय के लोग भी नमाज अता करने पहुंचते हैैं।
बंटवारे के बाद हुआ अतिक्रमण
जामा मस्जिद भारत-पाक बंटवारे के बाद से अतिक्रमण का संताप झेल रही है। 1947 में मुस्लिम भाईचारे के अधिकतर लोग पाक चले गए। इसके बाद कुछ लोगों ने यहां अवैध कब्जे कर लिए।
विभाजन के कुछ समय बाद यहां प्राइमरी खालसा स्कूल चलाया गया। मुस्लिम इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद सईद नेता ने बताया कि 1971 में दमदमी टकसाल के मुखी संत बाबा करतार सिंह ने इस धार्मिक इमारत को बेअदबी से बचाने के लिए यहां श्री निशान साहिब लगवाकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश करवा दिया था।
बाद में पंजाब के हालात कुछ बदले तो 1974 में मस्जिद में बकरीद की नमाज अता की गई। 1975 से ईद की नमाज पढ़ी जाने लगी। इसी तरह 1977 में जुम्मे की नमाज शुरू हुई।
इस दौरान मुस्लिम इंतजामिया कमेटी अस्तित्व में आई। कमेटी ने शहर के बुद्धिजीवियों तथा गणमान्य लोगों के साथ मिलकर मस्जिद को दोबारा मुस्लिम भाईचारे के सुपुर्द करने के लिए निवेदन किया।
इस मांग को दमदमी टकसाल के मुखी संत बाबा ज्ञानी ठाकुर सिंह के पास पहुंचाया। 1994 में एक जत्था मुक्तसर जामा मस्जिद में भेजा तथा फैसले के अनुसार अरदास के उपरांत मर्यादा के अनुसार श्री निशान साहिब को गुरुद्वारा श्री टिब्बी साहिब पहुंचाया। पांच जून 1994 को यह मस्जिद मुस्लिम भाईचारे के सुपुर्द कर दी गई।
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अंदर फर्श कई जगहों से धंस गया है। मस्जिद के जर्जर हालत में पहुंचने के बावजूद इस इमारत के नीचे बने प्रार्थना हाल पर कुछ लोगों का कथित अतिक्रमण है। यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में है।
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इस कारण इसका पुनर्निर्माण संभव नहीं हो पा रहा है। अगर यह इमारत गिरती है तो यहां जानमाल का भारी नुकसान हो सकता है।
रेलवे रोड पर करीब दो एकड़ जगह में बनी इस दो मंजिला जामा मस्जिद का निर्माण 1894 में हुआ था। मस्जिद के लिए जगह का इंतजाम महाराजा रणजीत सिंह के जरनैल हरी सिंह नलुआ ने किया था।
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नलुआ सभी धर्मों का सत्कार और उनकी रक्षा करते थे। उनकी अगुवाई में 16 नवंबर 1894 को मौलवी रजब अली, मियां बदरुद्दीन शाह तथा नवाब ममदोट गांव मगफूर वाली जलालाबाद (फिरोजपुर) ने नींव रख कर इस मजिस्द का निर्माण शुरू करवाया था। आज यहां न सिर्फ मुक्तसर शहर, आसपास कस्बों और गांवों के मुस्लिम समुदाय के लोग भी नमाज अता करने पहुंचते हैैं।
बंटवारे के बाद हुआ अतिक्रमण
जामा मस्जिद भारत-पाक बंटवारे के बाद से अतिक्रमण का संताप झेल रही है। 1947 में मुस्लिम भाईचारे के अधिकतर लोग पाक चले गए। इसके बाद कुछ लोगों ने यहां अवैध कब्जे कर लिए।
विभाजन के कुछ समय बाद यहां प्राइमरी खालसा स्कूल चलाया गया। मुस्लिम इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद सईद नेता ने बताया कि 1971 में दमदमी टकसाल के मुखी संत बाबा करतार सिंह ने इस धार्मिक इमारत को बेअदबी से बचाने के लिए यहां श्री निशान साहिब लगवाकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश करवा दिया था।
बाद में पंजाब के हालात कुछ बदले तो 1974 में मस्जिद में बकरीद की नमाज अता की गई। 1975 से ईद की नमाज पढ़ी जाने लगी। इसी तरह 1977 में जुम्मे की नमाज शुरू हुई।
इस दौरान मुस्लिम इंतजामिया कमेटी अस्तित्व में आई। कमेटी ने शहर के बुद्धिजीवियों तथा गणमान्य लोगों के साथ मिलकर मस्जिद को दोबारा मुस्लिम भाईचारे के सुपुर्द करने के लिए निवेदन किया।
इस मांग को दमदमी टकसाल के मुखी संत बाबा ज्ञानी ठाकुर सिंह के पास पहुंचाया। 1994 में एक जत्था मुक्तसर जामा मस्जिद में भेजा तथा फैसले के अनुसार अरदास के उपरांत मर्यादा के अनुसार श्री निशान साहिब को गुरुद्वारा श्री टिब्बी साहिब पहुंचाया। पांच जून 1994 को यह मस्जिद मुस्लिम भाईचारे के सुपुर्द कर दी गई।