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Ludhiana News: भूजल की कमी और अधिकता का पता लगाएगी सरकार
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-पंजाब में जल संकट पर सरकार का बड़ा कदम, भूजल पर होगा अध्ययन
-2.21 करोड़ रुपये से होगा जल अध्ययन, आईआईटी रोपड़ करेगा सहयोग
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब सरकार राज्य में जल संकट की समस्या को हल करने के लिए एक बड़े कदम के तहत एक विस्तृत जल अध्ययन करवाएगी। इस अध्ययन में आईआईटी रोपड़ का सहयोग लिया जाएगा और कुल 2.21 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस अध्ययन का उद्देश्य पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता, भूजल की स्थिति और नए जल संसाधनों की पहचान करना है।
राज्य में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वहीं कई इलाकों में सीपेज (ग्राउंड वाटर सीपेज) की समस्या भी बनी हुई है। इस अध्ययन के तहत इन दोनों समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाएगा। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि इस अध्ययन में कार्बन डेटिंग, भूगर्भ और पानी के भंडारों के आइसोटोप विश्लेषण जैसे उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा सीपेज के नमूनों की व्यापक जांच भी की जाएगी।
यह परियोजना 2.21 करोड़ रुपये के बजट से की जाएगी, जिसमें से आईआईटी रोपड़ अपने संसाधनों से 60 लाख रुपये का योगदान देगा, जबकि पंजाब सरकार द्वारा पंजाब राज्य किसान एवं खेत मजदूर कमीशन को 1.61 करोड़ रुपये का फंड उपलब्ध कराया जाएगा।
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जल संकट से निपटने के लिए यह कदम पंजाब सरकार की गंभीरता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह अध्ययन न केवल वर्तमान जल संकट को समझने में मदद करेगा, बल्कि भविष्य में जल संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण में भी सहायक होगा।
अध्ययन के उद्देश्य
-राज्य भर में उपलब्ध जल संसाधनों का ब्योरा तैयार करना।
-एक्विफरों की विशेषता का पता लगाना ताकि नीतिगत निर्णय सही ढंग से लिए जा सकें।
-हेलीकॉप्टर की मदद से जल संसाधनों का सर्वेक्षण करना और वैकल्पिक जल स्रोतों की खोज करना।
-सीपेज दरों का मूल्यांकन करने के लिए सूक्ष्म स्तरीय अध्ययन करना।
पांच चरणों में होगा सर्वेक्षण
-इस अध्ययन को पांच चरणों में विभाजित किया गया है, और इसे एक वर्ष के भीतर पूरा करने का लक्ष्य है।
-पहले चरण में सैंपलिंग साइटों का पता लगाने के लिए फील्ड सर्वेक्षण किया जाएगा।
-दूसरे चरण में प्रदेश के एक्विफर सिस्टमों का हाइड्रो जियोलॉजिकल फ्रेमवर्क विकसित किया जाएगा।
-तीसरे चरण में प्रदूषण स्तरों का मूल्यांकन और स्रोत क्षेत्रों की पहचान के लिए हाइड्रो-केमिकल और आइसोटोपिक विश्लेषण किया जाएगा।
-चौथे चरण में नहरी नेटवर्क के विस्तार के लिए क्षेत्रों की पहचान की जाएगी।
-पांचवें और अंतिम चरण में जल प्रबंधन उपायों के लिए सिफारिशें प्रस्तुत की जाएंगी।
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-2.21 करोड़ रुपये से होगा जल अध्ययन, आईआईटी रोपड़ करेगा सहयोग
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब सरकार राज्य में जल संकट की समस्या को हल करने के लिए एक बड़े कदम के तहत एक विस्तृत जल अध्ययन करवाएगी। इस अध्ययन में आईआईटी रोपड़ का सहयोग लिया जाएगा और कुल 2.21 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस अध्ययन का उद्देश्य पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता, भूजल की स्थिति और नए जल संसाधनों की पहचान करना है।
राज्य में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वहीं कई इलाकों में सीपेज (ग्राउंड वाटर सीपेज) की समस्या भी बनी हुई है। इस अध्ययन के तहत इन दोनों समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाएगा। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि इस अध्ययन में कार्बन डेटिंग, भूगर्भ और पानी के भंडारों के आइसोटोप विश्लेषण जैसे उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा सीपेज के नमूनों की व्यापक जांच भी की जाएगी।
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यह परियोजना 2.21 करोड़ रुपये के बजट से की जाएगी, जिसमें से आईआईटी रोपड़ अपने संसाधनों से 60 लाख रुपये का योगदान देगा, जबकि पंजाब सरकार द्वारा पंजाब राज्य किसान एवं खेत मजदूर कमीशन को 1.61 करोड़ रुपये का फंड उपलब्ध कराया जाएगा।
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जल संकट से निपटने के लिए यह कदम पंजाब सरकार की गंभीरता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह अध्ययन न केवल वर्तमान जल संकट को समझने में मदद करेगा, बल्कि भविष्य में जल संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण में भी सहायक होगा।
अध्ययन के उद्देश्य
-राज्य भर में उपलब्ध जल संसाधनों का ब्योरा तैयार करना।
-एक्विफरों की विशेषता का पता लगाना ताकि नीतिगत निर्णय सही ढंग से लिए जा सकें।
-हेलीकॉप्टर की मदद से जल संसाधनों का सर्वेक्षण करना और वैकल्पिक जल स्रोतों की खोज करना।
-सीपेज दरों का मूल्यांकन करने के लिए सूक्ष्म स्तरीय अध्ययन करना।
पांच चरणों में होगा सर्वेक्षण
-इस अध्ययन को पांच चरणों में विभाजित किया गया है, और इसे एक वर्ष के भीतर पूरा करने का लक्ष्य है।
-पहले चरण में सैंपलिंग साइटों का पता लगाने के लिए फील्ड सर्वेक्षण किया जाएगा।
-दूसरे चरण में प्रदेश के एक्विफर सिस्टमों का हाइड्रो जियोलॉजिकल फ्रेमवर्क विकसित किया जाएगा।
-तीसरे चरण में प्रदूषण स्तरों का मूल्यांकन और स्रोत क्षेत्रों की पहचान के लिए हाइड्रो-केमिकल और आइसोटोपिक विश्लेषण किया जाएगा।
-चौथे चरण में नहरी नेटवर्क के विस्तार के लिए क्षेत्रों की पहचान की जाएगी।
-पांचवें और अंतिम चरण में जल प्रबंधन उपायों के लिए सिफारिशें प्रस्तुत की जाएंगी।