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National Handloom Day: लुधियाना की गलियों में आज भी सुनाई देती है खड्डी की खटखट, निकल रहा स्व-रोजगार का रास्ता
Wed, 07 Aug 2024 01:55 PM IST
निवेदिता वर्मा
राजीव शर्मा, संवाद, लुधियाना (पंजाब)
राजीव शर्मा, संवाद, लुधियाना (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 07 Aug 2024 01:55 PM IST
सार
लुधियाना में टिब्बा रोड स्थित पंजाबी बाग के अलावा गौंसगढ़, जीवन पुर, मांगट, मेहरबान, मानकवाल, जगीरपुर इत्यादि इलाकों में खड्डियां लगी हैं। सभी बुनकरों को एक मंच पर लाने एवं उनकी समस्याओं के समाधान के लिए शमशाद ने एक संस्था हैंडलूम वीवर्स वेलफेयर सोसाइटी भी बनाई है।
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लुधियाना में चरखे पर सूत कातती कारीगर।
- फोटो : संवाद
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विस्तार
आधुनिक दौर में जहां एक तरफ औद्योगिक मशीनरी मार्डन, डिजिटल एवं ऑटोमेटिक हो गई है, बावजूद इसके लुधियाना की गलियों में आज भी खड्डी की खटखट सुनाई पड़ती है।
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खड्डी के दीवानों ने आज भी सदियों पुरानी इस धरोहर को न केवल सहेजकर रखा है, बल्कि इसका प्रचार-प्रसार भी कर रह हैं। इसके सार्थक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। उद्योग विभाग पंजाब के तहत जिला उद्योग केंद्र में करीब 600 बुनकर रजिस्टर्ड हैं, जोकि खड्डी पर कंबल, शाल, स्टॉल, पायदान, दरी इत्यादि उत्पाद तैयार करके अपनी पुरातन परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, साथ ही अपने परिवारों का गुजर-बसर भी कर रहे हैं।
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मशीनों के शहर में खड्डी की धरोहर को जिंदा रखने में अहम नाम यूपी के शामली के गांव कैराना से आए शमशाद अहमद का है। 15 साल की उम्र से खड्डी चला रहे करीब 70 वर्षीय शमशाद 1978 में खड्डी पर जयकार्ड का काम सीखने लुधियाना आए थे और यहीं के होकर रह गए। शहर में तब हैंड निटिंग मशीनों पर वुलन उत्पाद बन रहे थे, लेकिन शमशाद का मन तो खड्डी पर ही टिका था। खड्डी पर काम करके उनको सुकून मिलता है और पत्नी जुबेदा भी चरखा चलाकर उनका हाथ बंटाती हैं।
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शमशाद कहते हैं कि आधुनिक दौर में भी खड्डी पर बने कंबल, शाल एवं स्टोल की बाजार में काफी मांग है। उनको माल बेचने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता, लोग घर से आकर ही ले जाते हैं। इसके अलावा देश-विदेश में लगने वाली हैंडलूम प्रदर्शनियों में भी काफी माल बिक जाता है। शमशाद का कहना है कि यहां पर बना माल जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और स्थानीय बाजारों में ही खप जाता है।
शमशाद सरकारी ट्रेनर भी हैं। उन्होंने अब तक ढाई सौ से अधिक युवाओं खासकर महिलाओं को ट्रेंड किया है और वे खड्डी चला कर स्व-रोजगार की राह पर आगे बढ़ रही हैं। खड्डी का विस्तार होने पर शमशाद को खुशी मिलती है। उनका तर्क है कि पंजाब के जिला संगरूर के दो गांवों में दो सेंटर चल रहे हैं। इसके अलावा बठिंडा, तलवंडी साबो इत्यादि शहरों में भी लोगों को खड्डी चलाना सिखाकर काम शुरू कराया है।
शमशाद का कहना है कि सरकार ने छोटे धंधों के लिए कई स्कीमें शुरू की हैं, बावजूद इसके बैंकों से लोन लेने में दिक्कतें आ रही हैं। इसके कारण कई बार लोग धंधा नहीं शुरू कर पाते। इस बारे में सरकार से भी मंथन किया गया है। इस दिशा में समाधान होने पर खड्डी पर हैंडलूम उत्पादन को फिर से पंख लग सकते हैं।