{"_id":"6a97999b6c0cc5ad8509a0b2","slug":"faith-to-determine-path-to-power-political-parties-in-punjab-striking-balance-regarding-faith-2026-09-02","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"आस्था तय करेगी सत्ता का रास्ता: पंजाब में सियासी दल साध रहे आस्था का संतुलन, डेरा प्रमुखों से संवाद तेज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आस्था तय करेगी सत्ता का रास्ता: पंजाब में सियासी दल साध रहे आस्था का संतुलन, डेरा प्रमुखों से संवाद तेज
Wed, 02 Sep 2026 09:07 AM IST
Nivedita
सुशील कुमार, संवाद, सुनाम
सुशील कुमार, संवाद, सुनाम
Published by: Nivedita
Updated Wed, 02 Sep 2026 09:07 AM IST
सार
पंजाब चुनाव में डेरावाद एक असरदार कारक रहता है। कुल मिलाकर 2027 के विधानसभा चुनाव में आस्था राजनीतिक दलों के जीत-हार के समीकरण बनाने या बिगाड़ने का काम जरूर करेगी लेकिन वह एकमात्र निर्णायक फैक्टर नहीं होगी।
विज्ञापन
पंजाब चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही सूबे के सियासी गलियारों में यह सवाल फिर से तैरने लगा है कि क्या आस्था ही आने वाले चुनाव में पंजाब की सत्ता का रास्ता तय करेगी?
करीब 32 प्रतिशत दलित आबादी और समाज के विभिन्न वर्गों में डेरों की गहरी सामाजिक पैठ के कारण राज्य में राजनीति और धार्मिक आस्था का गठजोड़ हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और अहम पहलू रहा है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के चुनाव में डेरावाद एक असरदार कारक जरूर रहेगा लेकिन केवल इसके दम पर चुनावी नतीजे तय होना अब मुमकिन नहीं दिखता है। मतदाता अब अन्य मुद्दों पर अपने स्थानीय और प्रासंगिक मुद्दों को प्राथमिकता देने लगे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
करीब 32 प्रतिशत दलित आबादी और समाज के विभिन्न वर्गों में डेरों की गहरी सामाजिक पैठ के कारण राज्य में राजनीति और धार्मिक आस्था का गठजोड़ हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और अहम पहलू रहा है।
विज्ञापन
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के चुनाव में डेरावाद एक असरदार कारक जरूर रहेगा लेकिन केवल इसके दम पर चुनावी नतीजे तय होना अब मुमकिन नहीं दिखता है। मतदाता अब अन्य मुद्दों पर अपने स्थानीय और प्रासंगिक मुद्दों को प्राथमिकता देने लगे हैं।
विज्ञापन
तीन हिस्सों में बंटा सियासी और सामाजिक गणित
पंजाब का भौगोलिक और सामाजिक समीकरण इस सियासी खेल को बेहद दिलचस्प बनाता है। 117 विधानसभा सीटों वाले राज्य में 69 सीटें अकेले मालवा क्षेत्र से आती हैं, जहां डेरा सच्चा सौदा समेत कई प्रमुख संप्रदायों का अनुयायी आधार काफी मजबूत माना जाता है।
दूसरी ओर दोआबा क्षेत्र में रविदासिया समुदाय से जुड़े डेरा सचखंड बल्लां का गहरा सामाजिक प्रभाव है, जो दलित राजनीति और सामाजिक चेतना के केंद्र में रहता है। इसके ठीक विपरीत, माझा क्षेत्र में अकाल तख्त साहिब और पारंपरिक सिख पंथक सोच का दबदबा अधिक है, जहां गैर-सिख या विवादित डेरों का प्रभाव बेहद सीमित रहता है।
सियासी दलों की ताजा धार्मिक गतिविधियां
चुनाव में समय रहते बढ़त बनाने और सामाजिक-धार्मिक संतुलन साधने के लिए सभी प्रमुख दल हाल के दिनों में जमीन पर खासे सक्रिय नजर आ रहे हैं। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) ने पारंपरिक पंथक व डेरा आउटरीच के साथ-साथ शहरी और हिंदू बहुल क्षेत्रों को साधने के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर जोर दिया है। पार्टी द्वारा विभिन्न शहरों में एक शाम शिव के नाम जैसे भक्ति कार्यक्रमों के जरिये धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव का सियासी संदेश देने की कोशिश की जा रही है। पंथक वोट पर भी पार्टी नजर बनाए हुए है।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने पंजाब में दलित मतदाताओं को साधने के लिए डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास को पद्म श्री सम्मान दिए जाने के बाद डेरा प्रमुखों के साथ सीधे संवाद और आउटरीच अभियानों को तेज कर दिया है। वाराणसी से पावन माटी के जरिये समीकरण को साधने की कोशिश हो रही है।
रक्षाबंधन (रखड़ पुण्या) के मौके पर बाबा बकाला जैसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों पर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, वारिस पंजाब दे और भाजपा जैसी सभी प्रमुख पार्टियों द्वारा आयोजित समानांतर राजनीतिक-धार्मिक रैलियां यह दर्शाती हैं कि कोई भी दल आस्था से जुड़े मंचों को छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। अकाली दल अपनी खोई हुई पंथक जमीन वापस पाने और विभिन्न सिख धड़ों की गोलबंदी का प्रयास कर रहा है।
हालांकि कांग्रेस अभी तक आस्था को साधने के ऐसे प्रयास नहीं कर रही है जैसे अन्य दल जुटे हैं। तमाम सियासी कोशिशों के बावजूद पिछले तीन-चार चुनावों के रुझान स्पष्ट संकेत देते हैं कि पंजाब का आम मतदाता अब आस्था के किसी प्रत्यक्ष या गुप्त सियासी निर्देश के बजाय अपने स्थानीय और प्रासंगिक मुद्दों को प्राथमिकता देने लगा है। जमीनी स्तर पर गाहे-बगाहे लोग अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि धार्मिक जुड़ाव एक तरफ है और राजनीतिक फैसले दूसरी तरफ।
पंजाब का भौगोलिक और सामाजिक समीकरण इस सियासी खेल को बेहद दिलचस्प बनाता है। 117 विधानसभा सीटों वाले राज्य में 69 सीटें अकेले मालवा क्षेत्र से आती हैं, जहां डेरा सच्चा सौदा समेत कई प्रमुख संप्रदायों का अनुयायी आधार काफी मजबूत माना जाता है।
दूसरी ओर दोआबा क्षेत्र में रविदासिया समुदाय से जुड़े डेरा सचखंड बल्लां का गहरा सामाजिक प्रभाव है, जो दलित राजनीति और सामाजिक चेतना के केंद्र में रहता है। इसके ठीक विपरीत, माझा क्षेत्र में अकाल तख्त साहिब और पारंपरिक सिख पंथक सोच का दबदबा अधिक है, जहां गैर-सिख या विवादित डेरों का प्रभाव बेहद सीमित रहता है।
सियासी दलों की ताजा धार्मिक गतिविधियां
चुनाव में समय रहते बढ़त बनाने और सामाजिक-धार्मिक संतुलन साधने के लिए सभी प्रमुख दल हाल के दिनों में जमीन पर खासे सक्रिय नजर आ रहे हैं। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) ने पारंपरिक पंथक व डेरा आउटरीच के साथ-साथ शहरी और हिंदू बहुल क्षेत्रों को साधने के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर जोर दिया है। पार्टी द्वारा विभिन्न शहरों में एक शाम शिव के नाम जैसे भक्ति कार्यक्रमों के जरिये धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव का सियासी संदेश देने की कोशिश की जा रही है। पंथक वोट पर भी पार्टी नजर बनाए हुए है।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने पंजाब में दलित मतदाताओं को साधने के लिए डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास को पद्म श्री सम्मान दिए जाने के बाद डेरा प्रमुखों के साथ सीधे संवाद और आउटरीच अभियानों को तेज कर दिया है। वाराणसी से पावन माटी के जरिये समीकरण को साधने की कोशिश हो रही है।
रक्षाबंधन (रखड़ पुण्या) के मौके पर बाबा बकाला जैसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों पर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, वारिस पंजाब दे और भाजपा जैसी सभी प्रमुख पार्टियों द्वारा आयोजित समानांतर राजनीतिक-धार्मिक रैलियां यह दर्शाती हैं कि कोई भी दल आस्था से जुड़े मंचों को छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। अकाली दल अपनी खोई हुई पंथक जमीन वापस पाने और विभिन्न सिख धड़ों की गोलबंदी का प्रयास कर रहा है।
हालांकि कांग्रेस अभी तक आस्था को साधने के ऐसे प्रयास नहीं कर रही है जैसे अन्य दल जुटे हैं। तमाम सियासी कोशिशों के बावजूद पिछले तीन-चार चुनावों के रुझान स्पष्ट संकेत देते हैं कि पंजाब का आम मतदाता अब आस्था के किसी प्रत्यक्ष या गुप्त सियासी निर्देश के बजाय अपने स्थानीय और प्रासंगिक मुद्दों को प्राथमिकता देने लगा है। जमीनी स्तर पर गाहे-बगाहे लोग अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि धार्मिक जुड़ाव एक तरफ है और राजनीतिक फैसले दूसरी तरफ।
एकमात्र निर्णायक फैक्टर नहीं होगी आस्था
वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि जब राज्य में व्यवस्था परिवर्तन, नशा, कृषि संकट, बेरोजगारी, बेअदबी और पारदर्शी शासन जैसे विषय हावी होते हैं, तब डेरों के पारंपरिक वोट बैंक का प्रभाव भी विभाजित हो जाता है। मतदाता अब आस्था को अपनी व्यक्तिगत धार्मिक भावना तक सीमित रखकर गुप्त मतदान के अधिकार का इस्तेमाल अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच के आधार पर कर रहा है।
राजनीतिक दलों के लिए डेरों के सामाजिक प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज करना जितना मुश्किल है, उतना ही केवल उनके भरोसे सत्ता की चाबी हासिल करना भी नामुमकिन है। अंततः 2027 का जनादेश आस्था के सम्मान के साथ-साथ पंजाब के आर्थिक पुनरुद्धार, युवाओं के पलायन पर रोक और ज्वलंत मुद्दों के ठोस समाधान पेश करने वाली नीति पर ही निर्भर करेगा।
वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि जब राज्य में व्यवस्था परिवर्तन, नशा, कृषि संकट, बेरोजगारी, बेअदबी और पारदर्शी शासन जैसे विषय हावी होते हैं, तब डेरों के पारंपरिक वोट बैंक का प्रभाव भी विभाजित हो जाता है। मतदाता अब आस्था को अपनी व्यक्तिगत धार्मिक भावना तक सीमित रखकर गुप्त मतदान के अधिकार का इस्तेमाल अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच के आधार पर कर रहा है।
राजनीतिक दलों के लिए डेरों के सामाजिक प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज करना जितना मुश्किल है, उतना ही केवल उनके भरोसे सत्ता की चाबी हासिल करना भी नामुमकिन है। अंततः 2027 का जनादेश आस्था के सम्मान के साथ-साथ पंजाब के आर्थिक पुनरुद्धार, युवाओं के पलायन पर रोक और ज्वलंत मुद्दों के ठोस समाधान पेश करने वाली नीति पर ही निर्भर करेगा।