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शहीद ऊधम सिंह के पैतिक घर को संभाल नहीं पा रही सरकार
Updated Thu, 22 Jun 2017 04:59 PM IST
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शहीद ऊधम सिंह के पैतृक घर को संभाल नहीं पा रही सरकार
मुलाजिम के रिटायर होने पर धरोहर पर तालाबंदी की आई नौबत
शहीद के परिजन व लोग आहत
परिजनों ने कैप्टन को याद दिलाए वादे
शहीद की विदेश में रखी रिवाल्वर, कपड़े और अन्य सामान लाने की मांग
सुशील कुमार
सुनाम(संगरूर)।
अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देने वाले वीर सपूत शहीद ऊधम सिंह के जद्दी घर को राज्य सरकार संभाल नहीं पा रही है। दो दशक पहले पंजाब के सांस्कृतिक, पुरातत्व व अजायब घर विभाग ने सुनाम के मोहल्ला पीलबाद में स्थित शहीद के पैतृक घर को संरक्षित करके अपने कब्जे में लिया था। इसके बाद घर को देश की धरोहर का दर्जा किया गया है। घर की देख रेख के लिए विभाग की ओर से एक कर्मचारी यहां तैनात किया गया था। लेकिन मई माह में वहां तैनात मुलाजिम के सेवानिवृत हो जाने के बाद से इस घर पर तालाबंदी की नौबत आ गई। करीब तीन सप्ताह तक शहीद का पैतृक घर बंद ही पड़ा रहा। इसके बाद कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मामले को विभाग के सामने उठाया और विभाग ने संगरूर के बनासर बाग के अजायब घर के एक कर्मचारी को डेपुटेशन पर सप्ताह में एक दिन के लिए तैनात किया है।
शहीद के परिजन हैं आहत :
शहीद के घर पर तालाबंदी के हालात से उनके परिजन बेहद दुखी हैं। शहीद की बहन आस कौर के पोते जीत सिंह और इंदर सिंह ने कहा कि इसे केवल ऊधम सिंह का घर नहीं माना जा सकता है। यह घर, देश के लिए कुर्बान होने वाले एक महान शहीद के जज्बे व देश प्रेम का प्रतीक है। छोटे से कस्बे में जन्में ऊधम सिंह ने सात समुंदर पार जाकर जलियांवाला बाग में नरसंहार कराने वाले अंग्रेज अधिकारी को मार गिराया था। इस घर को रोजाना खोले जाने का स्थाई प्रबंध किया जाना चाहिए। लोगों ने मांग की है कि सरकार, उचित ढंग से इस धरोहर को संभाले। इस घर में शहीद के हस्तलिखित पत्र (जो ऊधम सिंह ने ब्रिटिश की जेलों में फांसी का इंतजार करते वक्त लिखे थे) रखे गए हैं। इन पत्रों में शहीद का देश के प्रति अटूट प्रेम साफ झलकता है। जो यहां आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।
कैप्टन को याद दिलाया वादा :
शहीद की बहन आस कौर के पोते जीत सिंह ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को दस साल पहले किया वादा याद दिलाते हुए कहा कि कैप्टन ने सीएम रहते हुए 20 जुलाई 2006 को एक बैठक में फैसला किया था कि शहीद ऊधम सिंह के रिश्तेदार जीत सिंह के बेटे जग्गा सिंह को सरकारी नौकरी दी जाएगी। सीएम के प्रमुख सचिव ने अक्टूबर 2006 में डीसी संगरूर को पत्र लिखकर नौकरी देने के आदेश दिए थे। लेकिन दस साल बीत गए हैं और उनका परिवार दिहाड़ी करके जिंदगी का गुजारा कर रहा है, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। उन्होंने मांग की कि शहीद की इंग्लैंड में पड़ी रिवाल्वर, कपड़े, डायरी व अन्य सामान लाकर सुनाम में उनके घर में रखी की जाए।
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शहीदों के मामले में खानापूर्ति शर्मनाक :
राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींडसा ने कहा कि अकाली सरकार ने हमेशा शहीदों का सत्कार किया है। लेकिन कांग्रेस, शहीदों का अपमान कर रही है। शहीद ऊधम सिंह के पैतृक घर का निरादर करके लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि देश की इस धरोहर का उचित ढंग से रख रखाव होना चाहिए। ऐसे मामलों में महज खानापूर्ति करना बेहद शर्मनाक है।
फोटो: सुनाम में शहीद ऊधम सिंह का पैतिृक घर।
सुनाम में कैप्टन अमरिंदर का दस वर्ष पहले का लिखित आदेश दिखाते शहीद के परिजन जीत सिंह।
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मुलाजिम के रिटायर होने पर धरोहर पर तालाबंदी की आई नौबत
शहीद के परिजन व लोग आहत
परिजनों ने कैप्टन को याद दिलाए वादे
शहीद की विदेश में रखी रिवाल्वर, कपड़े और अन्य सामान लाने की मांग
सुशील कुमार
सुनाम(संगरूर)।
अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देने वाले वीर सपूत शहीद ऊधम सिंह के जद्दी घर को राज्य सरकार संभाल नहीं पा रही है। दो दशक पहले पंजाब के सांस्कृतिक, पुरातत्व व अजायब घर विभाग ने सुनाम के मोहल्ला पीलबाद में स्थित शहीद के पैतृक घर को संरक्षित करके अपने कब्जे में लिया था। इसके बाद घर को देश की धरोहर का दर्जा किया गया है। घर की देख रेख के लिए विभाग की ओर से एक कर्मचारी यहां तैनात किया गया था। लेकिन मई माह में वहां तैनात मुलाजिम के सेवानिवृत हो जाने के बाद से इस घर पर तालाबंदी की नौबत आ गई। करीब तीन सप्ताह तक शहीद का पैतृक घर बंद ही पड़ा रहा। इसके बाद कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मामले को विभाग के सामने उठाया और विभाग ने संगरूर के बनासर बाग के अजायब घर के एक कर्मचारी को डेपुटेशन पर सप्ताह में एक दिन के लिए तैनात किया है।
शहीद के परिजन हैं आहत :
शहीद के घर पर तालाबंदी के हालात से उनके परिजन बेहद दुखी हैं। शहीद की बहन आस कौर के पोते जीत सिंह और इंदर सिंह ने कहा कि इसे केवल ऊधम सिंह का घर नहीं माना जा सकता है। यह घर, देश के लिए कुर्बान होने वाले एक महान शहीद के जज्बे व देश प्रेम का प्रतीक है। छोटे से कस्बे में जन्में ऊधम सिंह ने सात समुंदर पार जाकर जलियांवाला बाग में नरसंहार कराने वाले अंग्रेज अधिकारी को मार गिराया था। इस घर को रोजाना खोले जाने का स्थाई प्रबंध किया जाना चाहिए। लोगों ने मांग की है कि सरकार, उचित ढंग से इस धरोहर को संभाले। इस घर में शहीद के हस्तलिखित पत्र (जो ऊधम सिंह ने ब्रिटिश की जेलों में फांसी का इंतजार करते वक्त लिखे थे) रखे गए हैं। इन पत्रों में शहीद का देश के प्रति अटूट प्रेम साफ झलकता है। जो यहां आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।
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कैप्टन को याद दिलाया वादा :
शहीद की बहन आस कौर के पोते जीत सिंह ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को दस साल पहले किया वादा याद दिलाते हुए कहा कि कैप्टन ने सीएम रहते हुए 20 जुलाई 2006 को एक बैठक में फैसला किया था कि शहीद ऊधम सिंह के रिश्तेदार जीत सिंह के बेटे जग्गा सिंह को सरकारी नौकरी दी जाएगी। सीएम के प्रमुख सचिव ने अक्टूबर 2006 में डीसी संगरूर को पत्र लिखकर नौकरी देने के आदेश दिए थे। लेकिन दस साल बीत गए हैं और उनका परिवार दिहाड़ी करके जिंदगी का गुजारा कर रहा है, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। उन्होंने मांग की कि शहीद की इंग्लैंड में पड़ी रिवाल्वर, कपड़े, डायरी व अन्य सामान लाकर सुनाम में उनके घर में रखी की जाए।
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शहीदों के मामले में खानापूर्ति शर्मनाक :
राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींडसा ने कहा कि अकाली सरकार ने हमेशा शहीदों का सत्कार किया है। लेकिन कांग्रेस, शहीदों का अपमान कर रही है। शहीद ऊधम सिंह के पैतृक घर का निरादर करके लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि देश की इस धरोहर का उचित ढंग से रख रखाव होना चाहिए। ऐसे मामलों में महज खानापूर्ति करना बेहद शर्मनाक है।
फोटो: सुनाम में शहीद ऊधम सिंह का पैतिृक घर।
सुनाम में कैप्टन अमरिंदर का दस वर्ष पहले का लिखित आदेश दिखाते शहीद के परिजन जीत सिंह।