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यूरिया से बने नशीले शरबत की जद में संगोवाल
ब्यूरो/अमर उजाला, जालंधर
Updated Fri, 13 Jun 2014 10:02 PM IST
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पंजाब में सिंथेटिक या सफेद पाउडर का नशा ही नहीं बल्कि यूरिया से बना नशीला शरबत भी पैर पसार चुका है। महज दस रुपये के गिलास का सेवन कर पंजाब की युवा पीढ़ी अपनी जवानी दांव पर लगा रही है। देसी शराब का रुप कहा जाने वाला यह नशीला शरबत गांव संगोवाल के घर-घर में बिकता है, जिसमें सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि उनकी पत्नियां व बच्चे भी बराबर के भागीदार हैं। शाम ढलते ही गांव संगोवाल में मेला लग जाता है। गांव में दूर-दूर तक साइकिलों की कतार लग जाती है। कोई 70 रुपये में नशीले शरबत की बोतल खरीदता है तो कोई तत्काल नशे की पूर्ति के लिए 10 रुपये वाला गिलास पी रहा होता है।
दो हजार है संगोवाल की आबादी
गांव संगोवाल में एक खास बिरादरी के लोगों का पुश्तैनी काम ही नशे का कारोबार है। गांव सतलुज दरिया के किनारे पड़ता है और यहां की आबादी करीब दो हजार है। इसमें से आधे से ज्यादा लोगों ने नशे के धंधे को अपना रखा है।
पुलिस के आने से पहले भाग जाते हैं नशे के कारोबारी
पुलिस गांव संगोवाल के अंदर जब तक पहुंचती है तो नशीले शरबत के कारोबारी अपना तामझाम समेट चुके होते हैं। गांव में पहले ही पुलिस के आने का शोर मच जाता है। पुलिस दिखाने के लिए मुख्य मार्ग पर नाके बंदी कर उन लोगों को ही अंदर धकेलती है, जो पीकर निकलते हैं।
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यूरिया और गुड़ से बनता है नशीला शरबत
गांव के लोग गुड़, यूरिया, स्कूलों में फट्टी को पोंछने वाली गाची व पानी को मिक्स कर लेते हैं और इसको ट्रक की खाली ट्यूब में भर देते हैं। फिर इसे दरिया के किनारे रेत में जाकर दबा देते हैं। ऊपर से तिरपाल डाल दी जाती है। तपती गर्मी के कारण रेत अधिक गर्म हो जाती है और अंदर यूरिया, गुड़ और गाची मिलकर पिघलकर पानी में मिक्स हो जाते हैं। करीब 24 घंटे बाद नशीला शरबत यानी देसी दारू तैयार हो जाती है। जिसको बाद में गांव लाकर बोतलों में भर लिया जाता है।
हमारी कमाई का जरिया ही नहीं है भाजी
गांव के एक युवक से जब नशे के कारोबार के बारे में पूछा गया तो कहने लगा कि ‘भाजी पहले दरिया किनारे रेते का काम मिल जाता था। अब लेबर का काम जेसीबी मशीनों ने संभाल लिया है, हमारे पास कमाई का तो जरिया ही नहीं है। इसलिए नशीले शरबत का काम करना मजबूरी है।’ गांव में पुलिस नहीं आती, इस पर युवक का जवाब था कि भाजी हम लोग थाने को मंथली भेजते हैं। पुलिस के आने का तो पहले ही पता चल जाता है। हम लोग कारोबार समेट लेते हैं।
नशेबाज ही बनता सरदार
गांव संगोवाल के ही लोग नाम न छापने की बात पर बताते हैं कि हमारे यहां तो नशे का धंधा करने वाला ही हमारा सरदार बनता है। इसी कारण पिछले विधानसभा चुनावों में हमारे लोगों में से एक ने विधानसभा चुनाव आजाद तौर पर लड़ा था।
13 साल तक के बच्चे की हो चुकी है मौत
गांव संगोवाल में सिर्फ नशीला शरबत ही नहीं बल्कि सफेद पाउडर और हेरोइन की बिक्री भी अधिक है। नशे की लत ने गांव के 13 साल के एक बच्चे की जान ले ली, वहीं स्मैक की लत से तीन युवाओं की मौत हो चुकी है।
हमारा ऑपरेशन क्लीन तैयार है : एसएसपी (डी)
एसएसपी देहात नरिंदर भार्गव गांव संगोवाल के बारे में जानकर हैरत में हैं। उनका कहना है कि हमारा सर्वेक्षण चल रहा है। हमारा फोकस अकेला गांव संगोवाल ही नहीं कई अन्य इलाके हैं। जहां पर नशे का सफाया किया जाएगा। यूरिया युक्त नशीला शरबत मिलने की बात पर हैरत व्यक्त करते हुए भार्गव ने कहा कि मेरी प्राथमिकता नशे का सफाया है। इलाके के एसएचओ व डीएसपी को लगाया जा चुका है, गांवों में पूरा खाका तैयार हो रहा है।
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दो हजार है संगोवाल की आबादी
गांव संगोवाल में एक खास बिरादरी के लोगों का पुश्तैनी काम ही नशे का कारोबार है। गांव सतलुज दरिया के किनारे पड़ता है और यहां की आबादी करीब दो हजार है। इसमें से आधे से ज्यादा लोगों ने नशे के धंधे को अपना रखा है।
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पुलिस के आने से पहले भाग जाते हैं नशे के कारोबारी
पुलिस गांव संगोवाल के अंदर जब तक पहुंचती है तो नशीले शरबत के कारोबारी अपना तामझाम समेट चुके होते हैं। गांव में पहले ही पुलिस के आने का शोर मच जाता है। पुलिस दिखाने के लिए मुख्य मार्ग पर नाके बंदी कर उन लोगों को ही अंदर धकेलती है, जो पीकर निकलते हैं।
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यूरिया और गुड़ से बनता है नशीला शरबत
गांव के लोग गुड़, यूरिया, स्कूलों में फट्टी को पोंछने वाली गाची व पानी को मिक्स कर लेते हैं और इसको ट्रक की खाली ट्यूब में भर देते हैं। फिर इसे दरिया के किनारे रेत में जाकर दबा देते हैं। ऊपर से तिरपाल डाल दी जाती है। तपती गर्मी के कारण रेत अधिक गर्म हो जाती है और अंदर यूरिया, गुड़ और गाची मिलकर पिघलकर पानी में मिक्स हो जाते हैं। करीब 24 घंटे बाद नशीला शरबत यानी देसी दारू तैयार हो जाती है। जिसको बाद में गांव लाकर बोतलों में भर लिया जाता है।
हमारी कमाई का जरिया ही नहीं है भाजी
गांव के एक युवक से जब नशे के कारोबार के बारे में पूछा गया तो कहने लगा कि ‘भाजी पहले दरिया किनारे रेते का काम मिल जाता था। अब लेबर का काम जेसीबी मशीनों ने संभाल लिया है, हमारे पास कमाई का तो जरिया ही नहीं है। इसलिए नशीले शरबत का काम करना मजबूरी है।’ गांव में पुलिस नहीं आती, इस पर युवक का जवाब था कि भाजी हम लोग थाने को मंथली भेजते हैं। पुलिस के आने का तो पहले ही पता चल जाता है। हम लोग कारोबार समेट लेते हैं।
नशेबाज ही बनता सरदार
गांव संगोवाल के ही लोग नाम न छापने की बात पर बताते हैं कि हमारे यहां तो नशे का धंधा करने वाला ही हमारा सरदार बनता है। इसी कारण पिछले विधानसभा चुनावों में हमारे लोगों में से एक ने विधानसभा चुनाव आजाद तौर पर लड़ा था।
13 साल तक के बच्चे की हो चुकी है मौत
गांव संगोवाल में सिर्फ नशीला शरबत ही नहीं बल्कि सफेद पाउडर और हेरोइन की बिक्री भी अधिक है। नशे की लत ने गांव के 13 साल के एक बच्चे की जान ले ली, वहीं स्मैक की लत से तीन युवाओं की मौत हो चुकी है।
हमारा ऑपरेशन क्लीन तैयार है : एसएसपी (डी)
एसएसपी देहात नरिंदर भार्गव गांव संगोवाल के बारे में जानकर हैरत में हैं। उनका कहना है कि हमारा सर्वेक्षण चल रहा है। हमारा फोकस अकेला गांव संगोवाल ही नहीं कई अन्य इलाके हैं। जहां पर नशे का सफाया किया जाएगा। यूरिया युक्त नशीला शरबत मिलने की बात पर हैरत व्यक्त करते हुए भार्गव ने कहा कि मेरी प्राथमिकता नशे का सफाया है। इलाके के एसएचओ व डीएसपी को लगाया जा चुका है, गांवों में पूरा खाका तैयार हो रहा है।