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Jalandhar News: चाचा बोले- शुभमन को देख नशा छोड़ खेल पर ध्यान दे रहे युवा, कप्तान बनने पर जलालाबाद में जश्न
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-ढाई साल की उम्र में ही थाम लिया था बल्ला, नौ साल की उम्र में दादा ने गिफ्ट किया था बैट
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अश्वनी काठपाल
जलालाबाद (फाजिल्का)। शुभमन गिल के भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान बनने के बाद फाजिल्का के जैमलसिंह वाला में उनके पैतृक गांव में खुशी को लहर दौड़ गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि शुभमन ने उनके गांव का नाम दुनिया में रोशन किया है। कप्तान बनने की घोषणा पर गांव में काफी जश्न मनाया गया।
शुभमन गिल के चाचा गुरतेज सिंह ने कहा कि हमें पूरी उम्मीद थी कि एक दिन हमारा बच्चा कप्तान बनेगा, लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा था कि उसे इतनी जल्दी यह कामयाबी मिलेगी। । शुभमन की सफलता से गांव के बाकी युवा भी प्रेरणा ले रहे हैं। वह नशे से दूर रहते हुए खेलों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। गांव में कई युवा क्रिकेटर उभर रहे हैं। गांव में शुभमन का पैतृक घर है और उनके दादा-दादी व चाचा वहीं रहते हैं।
चाचा ने कहा कि वह अब शुभमन को बड़ी जिम्मेदारी मिली है और वह उस पर खरा उतरेंगे। गांव के लोगों सुखमंदर सिंह, गुरनाम सिंह, जसविंदर सिंह ने बताया कि शुभमन का बचपन यहीं बीता है। यही कारण है कि गांव के कई युवा अब शुभमन जैसा बनना चाहते हैं।
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शुभमन के लिए गांव छोड़ मोहाली बस गए पिता
शुभमन के पिता लखविंदर सिंह ने बेटे की प्रतिभा को देखकर गांव छोड़कर मोहाली में बसने का बड़ा फैसला लिया था। तब शुभमन सिर्फ 9 साल के थे और उनका खिलौना उनके दादा दीदार सिंह से मिला बैट ही था। गिल के खेल पर अधिक ध्यान देने के लिए परिवार ने सालों तक विवाह आदि व अन्य त्योहारों से दूरी बनाए रखी। शुभमन को पहला बड़ा ब्रेक 2011 में मिला, जब भारत के पूर्व तेज गेंदबाज करसन घावरी ने उन्हें पीसीए के अंडर-14 मैच में खेलते हुए देखा। घावरी उनके तकनीकी हुनर से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें सीधे तेज गेंदबाजों के लिए आयोजित बीसीसीआई के स्पेशल कैंप में बुला लिया।
दादी ने संभाल कर रखे हैं शुभमन के बैट
शुभमन की दादी गुरमेल कौर ने उनके बचपन के सारे बैट संंभाल कर रखे हैं। उन्होंने कहा कि शुभमन गिल को बचपन से ही खेलने का काफी शौक था। ढाई साल की उम्र में ही शुभमन ने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। दादा दीदार सिंह ने मिस्त्री को घर बुलाकर बैट बनाकर दिया था। आज भी उन्होंने शुभमन की हर बैट को संभालकर रखा हुआ है। दादी ने शुभमन की ट्रफियां व के मेडल भी संभाल कर रखे हैं।
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अश्वनी काठपाल
जलालाबाद (फाजिल्का)। शुभमन गिल के भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान बनने के बाद फाजिल्का के जैमलसिंह वाला में उनके पैतृक गांव में खुशी को लहर दौड़ गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि शुभमन ने उनके गांव का नाम दुनिया में रोशन किया है। कप्तान बनने की घोषणा पर गांव में काफी जश्न मनाया गया।
शुभमन गिल के चाचा गुरतेज सिंह ने कहा कि हमें पूरी उम्मीद थी कि एक दिन हमारा बच्चा कप्तान बनेगा, लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा था कि उसे इतनी जल्दी यह कामयाबी मिलेगी। । शुभमन की सफलता से गांव के बाकी युवा भी प्रेरणा ले रहे हैं। वह नशे से दूर रहते हुए खेलों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। गांव में कई युवा क्रिकेटर उभर रहे हैं। गांव में शुभमन का पैतृक घर है और उनके दादा-दादी व चाचा वहीं रहते हैं।
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चाचा ने कहा कि वह अब शुभमन को बड़ी जिम्मेदारी मिली है और वह उस पर खरा उतरेंगे। गांव के लोगों सुखमंदर सिंह, गुरनाम सिंह, जसविंदर सिंह ने बताया कि शुभमन का बचपन यहीं बीता है। यही कारण है कि गांव के कई युवा अब शुभमन जैसा बनना चाहते हैं।
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शुभमन के लिए गांव छोड़ मोहाली बस गए पिता
शुभमन के पिता लखविंदर सिंह ने बेटे की प्रतिभा को देखकर गांव छोड़कर मोहाली में बसने का बड़ा फैसला लिया था। तब शुभमन सिर्फ 9 साल के थे और उनका खिलौना उनके दादा दीदार सिंह से मिला बैट ही था। गिल के खेल पर अधिक ध्यान देने के लिए परिवार ने सालों तक विवाह आदि व अन्य त्योहारों से दूरी बनाए रखी। शुभमन को पहला बड़ा ब्रेक 2011 में मिला, जब भारत के पूर्व तेज गेंदबाज करसन घावरी ने उन्हें पीसीए के अंडर-14 मैच में खेलते हुए देखा। घावरी उनके तकनीकी हुनर से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें सीधे तेज गेंदबाजों के लिए आयोजित बीसीसीआई के स्पेशल कैंप में बुला लिया।
दादी ने संभाल कर रखे हैं शुभमन के बैट
शुभमन की दादी गुरमेल कौर ने उनके बचपन के सारे बैट संंभाल कर रखे हैं। उन्होंने कहा कि शुभमन गिल को बचपन से ही खेलने का काफी शौक था। ढाई साल की उम्र में ही शुभमन ने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। दादा दीदार सिंह ने मिस्त्री को घर बुलाकर बैट बनाकर दिया था। आज भी उन्होंने शुभमन की हर बैट को संभालकर रखा हुआ है। दादी ने शुभमन की ट्रफियां व के मेडल भी संभाल कर रखे हैं।