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एसआईआर: नोटिस पर छलका सेवानिवृत्त कर्नल का दर्द, 37 साल तक की देश सेवा; अब वोट देने के लिए लड़ रहे हैं जंग

Wed, 26 Aug 2026 04:01 AM IST
दुष्यंत शर्मा सुरिंदर पाल, जालंधर
सुरिंदर पाल, जालंधर Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 26 Aug 2026 04:01 AM IST
सार

बेलारूस में भारत के राजदूत रहे रमेश चंदर (75) को जालंधर में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए नोटिस मिला है।

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SIR: Retired Colonel’s anguish spills over in notice
प्रतीक चित्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट में 37 साल तक सेवाएं देने वाले कर्नल पीसी चौहान (75) को अब अपने वोट देने के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उनका वोट विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान खारिज कर दिया गया। सेवानिवृत्त कर्नल चौहान 2009 से मतदान करते आ रहे थे। अब 2003 की मतदाता सूची में उनका रिकॉर्ड न होने के कारण उनसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं।

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कर्नल चौहान ने बताया, घर आए बीएलओ ने बताया कि 2003 के रिकॉर्ड में उनका नाम नहीं है और उनसे निर्धारित प्रपत्र भरने और दस्तावेज जमा करने को कहा। कर्नल चौहान ने पेंशन प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, बैंक दस्तावेज आदि उपलब्ध कराए। दस्तावेज जमा करने के लिए उन्हें एक स्कूल में बुलाया गया, जहां उन्हें गर्मी में काफी देर इंतजार करना पड़ा।
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फिर भी उन्होंने प्रक्रिया पूरी की। हालांकि, बाद में उनका आवेदन स्वीकार नहीं हुआ और वोट खारिज कर दिया गया। वह कहते हैं, जिस देश की रक्षा के लिए मैंने जिंदगी लगा दी, वहीं आज वोट के लिए इतनी परेशानी उठानी पड़ रही है। 
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बेलारूस में राजदूत रहे रमेश चंदर अतिरिक्त दस्तावेज के साथ तलब
बेलारूस में भारत के राजदूत रहे रमेश चंदर (75) को जालंधर में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए नोटिस मिला है। एसआईआर के दौरान उनसे पात्रता और नागरिकता से जुड़े अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए हैं। नोटिस 2003 की सूची में विवरण न मिलने के कारण जारी किया गया है।

देओल नगर के निवासी चंदर को 27 अगस्त को निर्वाचन कार्यालय में अतिरिक्त दस्तावेज के साथ उपस्थित होने को कहा गया है। सेवानिवृत्ति के बाद 2007 से लगातार जालंधर में मतदान किया है, फिर भी अब उनसे अतिरिक्त प्रमाण मांगे जा रहे हैं। 


2003 में जापान में दे रहे थे सेवाएं
चंदर के अनुसार, पंजाब में एसआईआर में वर्ष 2003 की मतदाता सूची को आधार माना जा रहा है। हालांकि, 2003 में वह जापान में भारत की राजनयिक जिम्मेदारी निभा रहे थे। ऐसे में उनका नाम उस समय की स्थानीय मतदाता सूची में नहीं होना स्वाभाविक है। 

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