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Manpreet Singh: कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए दोबारा हॉकी कप्तान बने जालंधर के मनप्रीत, भावुक मां बोली- पिता का सपना सच किया  

Thu, 23 Jun 2022 04:35 PM IST
निवेदिता वर्मा मनमोहन सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, जालंधर (पंजाब)
मनमोहन सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, जालंधर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 23 Jun 2022 04:35 PM IST
सार

मनप्रीत के जन्म के तीन साल बाद उसके पिता बलजीत सिंह मानसिक बीमारी का शिकार हो गए। मनप्रीत अपने बड़े भाई अमनदीप की बदौलत ही खेल पाया। उन्होंने विदेश जाकर पैसे जुटाए।

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Jalandhar Player Manpreet Singh is re appointed as captain of hockey team  
हॉकी कप्तान मनप्रीत सिंह की मां मंदीप कौर। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

जालंधर के मिट्ठापुर गांव में जन्मे मनप्रीत सिंह को दोबारा हॉकी टीम का कप्तान बनाए जाने से उनके परिवार में खुशी का माहौल है। मनप्रीत टोक्यो ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और 41 साल बाद पदक भारत की झोली में डालकर दुनिया में भारतीय हॉकी का डंका बजवा चुके हैं।

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मनप्रीत के दोबारा कप्तान बनाए जाने पर परिवार में खुशी का माहौल है। मनप्रीत सिंह की मां मंदीप कौर ने विशेष मुलाकात में कहा कि उसके पिता ने सपना देखा था कि बेटा हॉकी में देश का नाम रोशन करे। आज वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मनप्रीत ने उनका सपना साकार कर दिखाया। बेटे को हॉकी इंडिया टीम का फिर कप्तान बनाया जाना हमारे लिए फख्र की बात है। मैं रोज गुरुघर जाकर वाहेगुरु से यही अरदास करती हूं कि बेटा कामयाबी की बुलंदियां छूता रहे और देश का नाम रोशन करते रहे। इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में बेटे को इंग्लैंड में कप्तानी करते देखने जरूर जाऊंगी।
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मंदीप कौर ने बताया कि बेटे के कप्तान बनाए जाने की खबर उन्हें मनप्रीत के साथी खिलाड़ी मंदीप सिंह के पिता ने फोन पर दी। मंदीप कौर ने बताया कि मनप्रीत बचपन से ही शांत स्वभाव का है और अपने चाचा ओलंपियन परगट सिंह को देखकर कहता था कि मैं भी हॉकी खेलूंगा। मनप्रीत जब छोटा था तो एक दिन बोला मां! मुझे कुछ पैसे दे दो, मिट्ठापुर ग्राउंड में टर्फ लगवानी है। मुझे लगा एक-डेढ़ लाख की जरुरत होगी। बाद में पता चला इसके लिए तीन से चार करोड़ रुपये चाहिए। मैंने उसकी पिटाई की और घर ले आई। हॉकी के प्रति उसका जुनून कम नहीं हुआ। वह हर समय हॉकी की ही बात करता था।
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मंदीप कौर बताती हैं कि मनप्रीत के जन्म के तीन साल बाद उसके पिता बलजीत सिंह मानसिक बीमारी का शिकार हो गए। उनके इलाज में आर्थिक तंगी आड़े आने लगी। मनप्रीत और उसके दोनों बड़े भाई अमनदीप और सुखराज दोनों घर के हालात से वाकिफ थे। उनका इलाज काफी लंबा चला। एक दिन मनप्रीत मेरे सामने रोता हुआ बोला-मां! परेशान ना हो। इक दिन जदों मैं इंडिया खेलांगा तां बोरे भरके पैसे लावांगा। लोक कहणगे ओ वेखो मनप्रीत दी मां जांदी ए। मंदीप भावुक होकर बताती हैं कि मनप्रीत ने आज अपना कहा एक एक शब्द सच कर दिखाया।   

बड़े भाइयों की बदौलत मनप्रीत ने पाई कामयाबी

मनप्रीत इंडिया खेल पाया तो बड़े भाई अमनदीप की बदौलत, जिसने विदेश जाकर पैसे जुटाए। जब मनप्रीत मिट्ठापुर से बाहर निकला और सुरजीत हॉकी एकेडमी में ट्रेनिंग करना चाहता था तो बड़ा भाई सुखराज उसे प्रतिदिन साइकिल पर लेकर जाता था। कभी परेशानी आई तो ओलंपियन और विधायक परगट सिंह ने बहुत मदद की। मैंने मनप्रीत को एक बार दिल्ली में जूनियर वर्ल्ड कप में खेलते हुए देखा था तब जीत के बाद बेटे ने कहा था, वह इंडिया खेल गया, अब परेशानियां नहीं रहेंगी और आज हमें कोई कमी महसूस नहीं होती।

मां ने हौसला बढ़ाया, वापस जाकर पाकिस्तान को हराया

मंदीप कौर ने बताया कि 2006 का दिन वह कभी नहीं भूल सकती। लंबी बीमारी के बाद मनप्रीत के पिता का देहांत हो गया। मनप्रीत उस समय मलयेशिया में खेलने गया था। हमने उसके कोच को बताया उन्होंने मनप्रीत से कहा-तुम्हारे घर में कुछ ठीक नहीं है। इसलिए आज का मैच तुम नहीं खेल पाओगे। मनप्रीत ने सोचा मां शुगर की मरीज हैं। उनकी तबीयत बिगड़ गई होगी। मनप्रीत ने फोन किया तब उसे पता चला कि पिता दुनिया में नहीं रहे। हॉकी इंडिया ने तत्काल मनप्रीत को जालंधर भेजा और वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। उधर, टीम को मनप्रीत की कमी खली और भारत मैच हार गया। दो दिन बाद फिर उसका मैच था। मैंने समझाया कि तू खेल पर फोकस कर और मलयेशिया के लिए निकल। टीम को तेरी जरूरत है। मनप्रीत नहीं जाना चाहता था, लेकिन मैं उसे खुद अमृतसर एयरपोर्ट तक छोड़कर आई। अगला मैच पाकिस्तान से था। दिल में पिता की मौत का गम लिए उतरे मनप्रीत के शानदार गोल की बदौलत भारत यह मैच जीता। इस जीत को मनप्रीत ने अपने पिता को समर्पित किया। 

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