Batala Industry: अंतिम सांसें गिन रहा बटाला का उद्योग, पाकिस्तान से रिश्ते खराब होने और महंगे कच्चे माल से लगे फैक्टरियों पर ताले
बटाला में बंद पड़े कारखानों के दरवाजों पर लगे ताले और खंडहर बन चुकी इमारतें बदहाली की तस्वीर बयां करने के लिए काफी हैं। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण क्षेत्र में बड़े प्लांट नहीं लगाए गए और लघु कुटीर उद्योग आखिरी सांसें गिन रहे हैं।
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पाकिस्तान से सटा बटाला एक समय टूल्स इंडस्ट्री के लिए दुनिया में विख्यात था। यहां बने खेती में इस्तेमाल होने वाले उपकरण देश के अन्य राज्यों के अलावा पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक जाते थे। युवाओं के लिए रोजगार की अच्छी खासी व्यवस्था थी। मगर अब वह निराश हैं। पाकिस्तान से रिश्ते बिगड़े और बटाला की इंडस्ट्री के बुरे दिन आ गए। आज हालत यह है कि अधिकतर इंडस्ट्री या तो बंद पड़ी हैं या बंद होने के मुहाने पर हैं। बंद पड़ी औद्योगिक इमारतों में परिंदों ने बसेरे बना लिए हैं। जहां कभी मशीनों की खटखटाहट गूंजती थी वहां अब पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है।
बटाला में बंद पड़े कारखानों के दरवाजों पर लगे ताले और खंडहर बन चुकी इमारतें बदहाली की तस्वीर बयां करने के लिए काफी हैं। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण क्षेत्र में बड़े प्लांट नहीं लगाए गए और लघु कुटीर उद्योग आखिरी सांसें गिन रहे हैं। यहां के उद्योगों में 1991 में 50,000 मजदूर काम करते थे, अब यह संख्या घटकर 15000 रह गई है। जो उद्योग बचे भी हैं वह कच्चे माल की कीमतें आसमान पर पहुंचने से बेहाल हैं। उद्योगपति इस स्थिति के लिए केंद्र और सूबे की सरकारों की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं।
खेतीबाड़ी टूल्स उद्योग हुए मंदी के शिकार: रणधीर सिंह
वरिष्ठ उद्योगपति रणधीर सिंह का कहना है कि बटाला में खेतीबाड़ी टूल्स उद्योग, मशीन टूल्स उद्योग और फाउंडरी उद्योग हैं। तीनों में लगभग एग्रीकल्चर टूल्स उद्योग बंदी के कगार पर है। जबकि बटाला का मशीन टूल्स उद्योग लगभग 80 फीसदी बंद हो गया है। फाउंडरी उद्योग करीब 50 प्रतिशत चल रहा है। उन्होंने बताया कि 1947 से बटाला के बने खेतीबाड़ी टूल्स पाकिस्तान भेजे जाते थे। जिसकी वजह से बटाला एक बड़ा औद्योगिक शहर माना जाता था। इसके बाद भारत के पाकिस्तान से संबंध बिगड़े तो दोनों देश के बीच व्यापार बंद हो गया। व्यापार बंद होते ही बटाला से पाकिस्तान जाने वाले खेतीबाड़ी टूल्स के दरवाजे भी बंद हो गए। उधर, सरकार की नई औद्योगिक नीतियों के कारण लघु और कुटीर उद्योग वैसे ही मंदी की मार झेल रहे हैं। सीमावार्ती क्षेत्र होने की वजह से यहां कोई बड़ा उद्योग लगाने को तैयार ही नहीं है। हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों की सरकारें कई तरह के लाभ दे रही हैं, उन्हें विशेष पैकेज दिए जा रहे हैं, विभिन्न प्रकार सब्सिडी दी जा रही है। जबकि बटाला का उद्योग इन सभी सहूलियतों से वंचित है। इसलिए यहां से उद्योग पलायन कर रहे हैं।
1991 में खत्म की गई फ्रेट इक्विलाइजेशन की पॉलिसी से इंडस्ट्री का हुआ नुकसान किया : सुखजिंदर सिंह
रजिंदरा फाउंडरी के मालिक सुखजिंदर सिंह ने बताया कि फ्रेट (किराया) इक्विलाइजेशन की पॉलिसी खत्म होने से बटाला के उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सारा कच्चा माल दार्जिलिंग, बिहार, उड़ीसा और बंगाल आदि राज्यों से आता है। यह पॉलिसी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बनाई थी, जिसके तहत तय हुआ था कि पूरे देश में फ्रेट इक्विलाइजेशन पॉलिसी को लागू किया जाए। फैसला किया गया था कि पूरे भारत में कच्चा माल भेजने का किराया सभी जगह पर एक सा होगा, चाहे वह क्षेत्र प्लांट के पास हो या फिर दूर। पूरे भारत में एक मूल्य पर कच्चा माल मिलेगा। इस पॉलिसी से उन उद्योगपतियों को बहुत लाभ मिला जो दूर-दराज के इलाकों से थे। इसके बाद 1991 में फ्रेट इक्विलाइजेशन की पॉलिसी को खत्म कर दिया गया। इससे बटाला को ओडिशा और बंगाल से आने वाले कच्चे माल के किराए की कीमत बहुत अधिक चुकानी पड़ती है। इस वजह से भी बटाला की इंडस्ट्री का भारी नुकसान हुआ है।
फ्रेट इक्विलाइजेशन पॉलिसी के खत्म होने से अब उन्हें दूसरे शहरों के मुकाबले करीब 6000 रुपये महंगा सामान मिलता है, क्योंकि बटाला क्षेत्र इन राज्यों से काफी दूर है, जिन राज्यों से कच्चा माल आता है। बटाला की इंडस्ट्री उन यूनिटों का मुकाबला नहीं कर सकती जो कच्चा माल तैयार करने वाले प्लांटों के पास हैं। उन्होंने बताया कि पंजाब की इंडस्ट्री को इतने इन्सेंटिव नहीं दिए गए, जितने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और हरियाणा को दिए जा रहे हैं। पंजाब में जितनी भी सरकारें आईं, उन्होंने उद्योगों को पुनर्जीवित करने पर ध्यान नहीं दिया। उद्योग सहूलियतों के अभाव के कारण दिन-ब दिन गिरावट की ओर जा रहा है।
इससे पहले कच्चे माल की कीमत सरकारी एजेंसी (स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया) तय करती थी, जिसके कारण कच्चे माल की कीमत लगभग एक जैसी रहती थी, मगर सरकार ने मामले में अपने हाथ खींच लिए हैं और अब कच्चे माल की कीमत को लेकर सारा काम निजी हाथों में चला गया है। यही कारण है कि कच्चे माल में भारी उछाल आया है। इस भारी उछाल से उद्योगपतियों को कहीं न कही मंदी का सामना करना पड़ रहा है। सुखजिंदर सिंह ने बताया कि पहले देग (कच्चा लोहा) 42 से 45 रुपये प्रति टन मिलती थी, अब कीमत बढ़कर 65 रुपये प्रति टन हो गई है। कोयले की कीमत बढ़ने से भी उद्योगपति परेशान हैं। चीनी कोयला जो 25 हजार रुपये प्रति टन था, अब उसकी कीमत 75 हजार रुपये टन हो गई है। पत्थर कोयला 30 हजार रुपये टन था, जो अब 50 हजार रुपये प्रति टन है। इन कारणों से बटाला की इंडस्ट्री बेहाल है। ऐसी परिस्थितियों को देख कोई भी उद्योगपति नया ऑर्डर लेने को तैयार नहीं है। यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब बटाला का पूरा उद्योग बंद हो जाएगा।
साल 2000 में 5000 हजार औद्योगिक यूनिटें थीं, जो अब 50 ही रह गईं : इंद्र सेखड़ी
उद्योगपति इंद्र सेखड़ी ने बताया कि उद्योगों को खोखला करने में सरकारों की नीतियों का पूरा हाथ है। बटाला में 90 प्रतिशत यूनिटें बंद हो गईं हैं। सेखड़ी ने बताया कि जब बटाला का उद्योग 2000 में शिखर पर था, तब यहां 5000 यूनिटें थीं। आज लगभग 50 यूनिटें ही रह गई हैं। रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने 2016 में एक नोटिफिकेशन जारी कर बैंकों को हिदायतें दी थीं कि कर्ज न वापस करने की सूरत में गिरवी रखी जायदाद की नीलामी सीधे तौर पर न की जाए और इसके लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया जाए, जिसमें एक सदस्य पंजाब सरकार की ओर से नामजद होगा, दूसरा सदस्य बैंक का होगा और तीसरा एक इंडस्ट्रियल विशेषज्ञ होगा। मगर अभी तक ऐसी किसी भी कमेटी का गठन ही नहीं किया जा सका है।
करीब 22 साल हो गए हैं इस नोटिफिकेशन को, उन्होंने अभी तक इसका अस्तित्व ही नहीं देखा। ऐसी परिस्थितियों में यहां की इंडस्ट्री खत्म हो रही है। बटाला का उद्योग अब सरकार की बढ़िया औद्योगिक नीतियों से ही संभव है। बटाला की सिसकती इंडस्ट्री को भी अन्य राज्यों की तरह विशेष सहूलियतें दी जाएं, ताकि उद्योगपति अपने उद्योग को एक बार दोबारा चालू करने का प्रयत्न कर सके।
इंडस्ट्री की बदतर हालत का असर रोजगार पर कहर बनकर बरसा : गुरमीत सिंह बख्तपुरा
एक्टू (ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस) के प्रादेशिक सह अध्यक्ष गुरमीत सिंह बख्तपुरा ने बताया कि बटाला की इंडस्ट्री की बदतर हालत का असर रोजगार पर कहर बनकर बरसा है। यहां की इंडस्ट्री में पांच तरह के मजदूर काम करते हैं, जिसमें मोल्डर मजदूर, बाल्टी मजदूर, वर्कशॉप मजदूर, कोयला मजदूर और डेली मजदूर शामिल हैं। बटाला कभी रोजगार का बड़ा हब था। अब स्थिति ऐसी बन गई है कि यहां इंडस्ट्री के खराब हालात के कारण इन मजदूरों को सिर्फ टोकन काम ही मिल रहा है, जबकि रेगुलर काम नहीं मिल रहा। 1991 के दौर में जब बटाला का उद्योग खुशहाल था तो उन दिनों कारखानों में मजदूर 3 शिफ्टों में रेगुलर दिन-रात काम करते थे।
इतना रोजगार था कि आसपास के गांव और यहां तक कि 40 किलोमीटर दूर गुरदासपुर से भी मजदूर बटाला काम करने आते थे। इंडस्ट्री खुशहाल स्तर पर थी तो एक माह में करीब 7 भट्ठियां चलती थीं। एक भट्ठी चलाने में 70 से 80 मजदूर काम करते थे। अब औद्योगिक मंदी के कारण आलम यह है कि हफ्ते में सिर्फ एक भट्ठी चलती है, जिसकी वजह से मजदूर को सिर्फ 15 दिन का काम ही मिल रहा है। बाकी 15 दिन का काम खत्म हो गया है। कारखानों में काम न मिलने से चौक चौराहों पर मजदूर दिहाड़ी के इंतजार में बैठे रहते हैं। कुछ की दिहाड़ी लग जाती है तो कुछ शाम को खाली हाथ घरों को चले जाते हैं। इसके अलावा बटाला की इंडस्ट्री पर आतंकवाद के दौर ने बुरा प्रभाव डाला है।
डर के कारण कई उद्योगपति अन्य राज्यों में पलायन कर गए, जिससे बटाला की बहुत सारी यूनिट बंद हो गईं। अगर हम बात 1990-91 की करें तो बटाला के औद्योगिक क्षेत्र में करीब 50,000 मजदूर काम करता था, लेकिन अब महज 15000 मजदूर को ही काम मिल रहा है। जो काम मिल रहा है वह भी नियमित नहीं है। सरकारों से उनकी अपील की है कि जैसे अन्य राज्यों को इंडस्ट्री के क्षेत्र में इन्सेंटिव दिए जाते हैं, वैसे इन्सेंटिव बटाला इंडस्ट्री को भी दिए जाएं। ताकि उद्योग पुनर्जीवित हो सके, जिससे लोगों को रोजगार मुहैया करवाया जा सके।