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हाईकोर्ट का आदेश: दिव्यांग बेटी विवाहित तो भी पारिवारिक पेंशन की हकदार, यूटी प्रशासन पर लगाया जुर्माना
Thu, 22 May 2025 10:26 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 22 May 2025 10:26 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने कहा कि निर्देशों के अनुसार यदि बेटी किसी ऐसी दिव्यांगता से पीड़ित है, जो उसे आजीविका कमाने से रोकती है, तो उसे 25 वर्ष की आयु के बाद भी पारिवारिक पेंशन मिलती रहेगी, चाहे उसकी शादी हो या न हो।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
एक दिव्यांग विवाहित बेटी के पारिवारिक पेंशन के दावे को खारिज करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिव्यांग बेटी, जो अपने पिता की सेवानिवृत्ति के समय अविवाहित थी, को पारिवारिक पेंशन देने से इन्कार करने में प्रशासन की ओर से अपनाया गया दृष्टिकोण नियमों के विरुद्ध था।
यूटी प्रशासन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कैट के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत दिव्यांग बेटी को पारिवारिक पेंशन देने का निर्देश दिया गया था। पूनम के पिता सुरिंदर पाल 1999 में सेवानिवृत्त हुए और 2014 में उनका निधन हो गया। उनकी दिव्यांग बेटी पूनम, 2012 में अपनी मां की मृत्यु के बाद एकमात्र जीवित कानूनी उत्तराधिकारी होने के नाते, पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया। हालांकि, पेंशन नहीं दी गई।
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अधिकारियों ने उनसे दिव्यांगता प्रमाण पत्र, कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा। उन्होंने उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, यूटी चंडीगढ़ को आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए, लेकिन 2015 में उनके दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि पंजाब सिविल सेवा नियम के तहत विवाहित बेटी पारिवारिक पेंशन के लिए पात्र नहीं है। हालांकि, 2018 में कैट ने उनके दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।
यूटी चंडीगढ़ की ओर से पेश वकील ने कहा कि नियमों के अनुसार पूनम पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने के लिए पात्र नहीं है। साथ यह भी कहा कि पूनम ने अपना दिव्यांगता प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है और इस आधार पर उसे दिव्यांगता पेंशन जारी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिता की मृत्यु के तुरंत बाद बेटी ने आवेदन दायर किया था, जिसमें उल्लेख किया गया था कि वह दिव्यांग है, इसलिए उसने प्रासंगिक नियमों के आधार पर पारिवारिक पेंशन का दावा किया। कोर्ट ने कहा कि पिता की सेवानिवृत्ति के समय पूनम विवाहित नहीं थी, लेकिन अब विवाहित है। निर्देशों के अनुसार यदि बेटी किसी ऐसी दिव्यांगता से पीड़ित है, जो उसे आजीविका कमाने से रोकती है, तो उसे 25 वर्ष की आयु के बाद भी पारिवारिक पेंशन मिलती रहेगी, चाहे उसकी शादी हो या न हो। कोर्ट ने कहा कि हम एक दिव्यांग व्यक्ति के संबंध में भारत सरकार की ओर से अपनाए गए दृष्टिकोण की निंदा करते हैं।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिव्यांग बेटी, जो अपने पिता की सेवानिवृत्ति के समय अविवाहित थी, को पारिवारिक पेंशन देने से इन्कार करने में प्रशासन की ओर से अपनाया गया दृष्टिकोण नियमों के विरुद्ध था।
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यूटी प्रशासन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कैट के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत दिव्यांग बेटी को पारिवारिक पेंशन देने का निर्देश दिया गया था। पूनम के पिता सुरिंदर पाल 1999 में सेवानिवृत्त हुए और 2014 में उनका निधन हो गया। उनकी दिव्यांग बेटी पूनम, 2012 में अपनी मां की मृत्यु के बाद एकमात्र जीवित कानूनी उत्तराधिकारी होने के नाते, पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया। हालांकि, पेंशन नहीं दी गई।
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अधिकारियों ने उनसे दिव्यांगता प्रमाण पत्र, कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा। उन्होंने उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, यूटी चंडीगढ़ को आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए, लेकिन 2015 में उनके दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि पंजाब सिविल सेवा नियम के तहत विवाहित बेटी पारिवारिक पेंशन के लिए पात्र नहीं है। हालांकि, 2018 में कैट ने उनके दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।
यूटी चंडीगढ़ की ओर से पेश वकील ने कहा कि नियमों के अनुसार पूनम पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने के लिए पात्र नहीं है। साथ यह भी कहा कि पूनम ने अपना दिव्यांगता प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है और इस आधार पर उसे दिव्यांगता पेंशन जारी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिता की मृत्यु के तुरंत बाद बेटी ने आवेदन दायर किया था, जिसमें उल्लेख किया गया था कि वह दिव्यांग है, इसलिए उसने प्रासंगिक नियमों के आधार पर पारिवारिक पेंशन का दावा किया। कोर्ट ने कहा कि पिता की सेवानिवृत्ति के समय पूनम विवाहित नहीं थी, लेकिन अब विवाहित है। निर्देशों के अनुसार यदि बेटी किसी ऐसी दिव्यांगता से पीड़ित है, जो उसे आजीविका कमाने से रोकती है, तो उसे 25 वर्ष की आयु के बाद भी पारिवारिक पेंशन मिलती रहेगी, चाहे उसकी शादी हो या न हो। कोर्ट ने कहा कि हम एक दिव्यांग व्यक्ति के संबंध में भारत सरकार की ओर से अपनाए गए दृष्टिकोण की निंदा करते हैं।