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Punjab: बाढ़ नियंत्रण के लिए नई तकनीक, क्या है जियोट्यूब? सतलुज नदी के किनारों पर चल रहा काम
Wed, 24 Jun 2026 07:00 AM IST
शाहिल शर्मा
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Wed, 24 Jun 2026 07:00 AM IST
सार
जियोट्यूब नदियों के किनारे बनाए गए धुस्सी बांधों के विकल्प के रूप में तैयार होंगे। प्लास्टिक के कट्टों में रेत भरकर उनसे दरियाओं के किनारों पर धुस्सी बांध बनाए जाते हैं।
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जियोट्यूब से मजबूत किए जा रहे नदियों के किनारे
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब में अब दरियाओं (नदियों) के बांध जियोट्यूब से मजबूत किए जाएंगे। बाढ़ नियंत्रण के मद्देनजर सूबे में पहली बार इस नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पर काम शुरू हो चुका है। फिलहाल ससराली (लुधियाना) में सतलुज नदी के किनारे जियोट्यूब को बिछाने का काम तेजी से चल रहा है।
साल 2025 जैसी बाढ़ त्रासदी का दोहराव न हो, इसके मद्देनजर पंजाब सरकार खासी गंभीर है। इसी के चलते जल स्रोत महकमा कई नई तकनीकों के साथ बाढ़ नियंत्रण कार्यों में जुटा हुआ है। महकमे की रिसर्च टीम उन तकनीकों पर लगातार काम कर रही है, जिसका इस्तेमाल उन राज्यों व देशों में किया गया है, जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा रहता है। जियोट्यूब भी उन्हीं में से एक तकनीक है।
फिलहाल इस तकनीक का इस्तेमाल सतलुज दरिया के किनारे किया जा रहा है। करीब एक किलोमीटर तक नदी के किनारे पर जियोट्यूबों को बिछाया जा रहा है। यह वे किनारे हैं जो पिछले साल बाढ़ के दौरान टूटे थे। इस वजह से आसपास इलाकों में बहुत ज्यादा तबाही मची थी। खेत बह गए थे और हजारों गांव डूब गए थे। पशु धन, घरों के साथ-साथ जान-माल का खासा नुकसान हुआ था। जियोट्यूब का यह पायलट प्रोजेक्ट कामयाब रहा तो इससे रावी और ब्यास दरियाओं के कमजोर बांधों को भी मजबूत किया जाएगा।
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साल 2025 जैसी बाढ़ त्रासदी का दोहराव न हो, इसके मद्देनजर पंजाब सरकार खासी गंभीर है। इसी के चलते जल स्रोत महकमा कई नई तकनीकों के साथ बाढ़ नियंत्रण कार्यों में जुटा हुआ है। महकमे की रिसर्च टीम उन तकनीकों पर लगातार काम कर रही है, जिसका इस्तेमाल उन राज्यों व देशों में किया गया है, जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा रहता है। जियोट्यूब भी उन्हीं में से एक तकनीक है।
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फिलहाल इस तकनीक का इस्तेमाल सतलुज दरिया के किनारे किया जा रहा है। करीब एक किलोमीटर तक नदी के किनारे पर जियोट्यूबों को बिछाया जा रहा है। यह वे किनारे हैं जो पिछले साल बाढ़ के दौरान टूटे थे। इस वजह से आसपास इलाकों में बहुत ज्यादा तबाही मची थी। खेत बह गए थे और हजारों गांव डूब गए थे। पशु धन, घरों के साथ-साथ जान-माल का खासा नुकसान हुआ था। जियोट्यूब का यह पायलट प्रोजेक्ट कामयाब रहा तो इससे रावी और ब्यास दरियाओं के कमजोर बांधों को भी मजबूत किया जाएगा।
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दरियाओं का कटाव रुकेगा, धुस्सी बांधों का विकल्प मिलेगा
जियोट्यूब दरियाओं किनारे बनाए गए धुस्सी बांधों के विकल्प के रूप में तैयार होंगे। प्लास्टिक के कट्टों में रेत भरकर उनसे दरियाओं के किनारों पर धुस्सी बांध बनाए जाते हैं मगर पानी के तेज बहाव के दौरान यह बांध रिसकर बह जाते हैं। करीब 20 मीटर लंबी और 3 मीटर व्यास वाली जियोट्यूबों को दरियाओं के किनारे बिछाया जाएगा। एक विशेष तकनीक के जरिये दरिया के भीतर से ही इन ट्यूबों में रेत भरी जाएगी। किनारों पर बिछाने के बाद इन्हें मिट्टी से ढक दिया जाएगा ताकि सूरज की तेज रोशनी का इन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
जियोट्यूब की खासियत
किनारों को कटाव से बचाने वाले जियोट्यूब बैग सिंथेटिक पॉलीमर से बनते हैं। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन व पॉलिएस्टर का भी इस्तेमाल होता है। यह वजन में हल्के, अत्यधिक मजबूत और रसायनों व एसिड के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। खास बात यह कि पानी के लगातार संपर्क में रहने के बाद भी यह सड़ते या गलते नहीं है और लंबे समय तक भारी दबाव को झेल सकते है। 20 से 30 साल तक इनकी मिआद बताई जा रही है।
जियोट्यूब दरियाओं किनारे बनाए गए धुस्सी बांधों के विकल्प के रूप में तैयार होंगे। प्लास्टिक के कट्टों में रेत भरकर उनसे दरियाओं के किनारों पर धुस्सी बांध बनाए जाते हैं मगर पानी के तेज बहाव के दौरान यह बांध रिसकर बह जाते हैं। करीब 20 मीटर लंबी और 3 मीटर व्यास वाली जियोट्यूबों को दरियाओं के किनारे बिछाया जाएगा। एक विशेष तकनीक के जरिये दरिया के भीतर से ही इन ट्यूबों में रेत भरी जाएगी। किनारों पर बिछाने के बाद इन्हें मिट्टी से ढक दिया जाएगा ताकि सूरज की तेज रोशनी का इन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
जियोट्यूब की खासियत
किनारों को कटाव से बचाने वाले जियोट्यूब बैग सिंथेटिक पॉलीमर से बनते हैं। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन व पॉलिएस्टर का भी इस्तेमाल होता है। यह वजन में हल्के, अत्यधिक मजबूत और रसायनों व एसिड के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। खास बात यह कि पानी के लगातार संपर्क में रहने के बाद भी यह सड़ते या गलते नहीं है और लंबे समय तक भारी दबाव को झेल सकते है। 20 से 30 साल तक इनकी मिआद बताई जा रही है।