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अमृतसर गया लुधियाना का बुजुर्ग पहुंच गया बिहार: एआई की मदद से मिला गांव का पता, फिर ऐसे हुई वापसी

Sun, 20 Sep 2026 02:15 PM IST
शाहिल शर्मा संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना
संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना Published by: शाहिल शर्मा Updated Sun, 20 Sep 2026 02:15 PM IST
सार

चमन लाल बीते 11 सितंबर को मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना की बस से अन्य श्रद्धालुओं के साथ अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर गए थे। वहां वे अपने साथियों से बिछड़ गए और रेलवे स्टेशन पर बिहार जाने वाली ट्रेन में बैठकर बिहार के गया पहुंच गए। 

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Elderly man separated from his family in Ludhiana returns home with the help of AI
एआई की मदद से बुजुर्ग पहुंचा घर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना के तहत स्वर्ण मंदिर में माथा टेकने अमृतसर गए फतेहगढ़ गुजरां के बुजुर्ग चमन लाल रास्ता भटककर बिहार के गया पहुंच गए। मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उन्हें न अपने साथियों का पता याद था और न घर का। याद था तो सिर्फ अपने गांव का नाम- फतेहगढ़ गुजरां। यही अधूरी जानकारी आठ दिन बाद उन्हें परिवार तक पहुंचाने की कड़ी बनी। गया के युवक नीरज ने पहले गूगल मैप पर गांव तलाशा, लेकिन सही लोकेशन नहीं मिली। इसके बाद इंटरनेट और चैटजीपीटी की मदद से गांव का सुराग मिला और शनिवार को नीरज खुद बुजुर्ग को लेकर लुधियाना पहुंच गए।
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चमन लाल 11 सितंबर को मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना की बस से अन्य श्रद्धालुओं के साथ अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर गए थे। बस से उतरने के बाद श्रद्धालु गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने चले गए। इसी दौरान चमन लाल साथियों से बिछड़ गए। वह उन्हें तलाशते हुए रेलवे स्टेशन की ओर निकल गए। स्टेशन पर बिहार जाने वाली ट्रेन खड़ी थी। वह गलती से उसमें सवार हो गए और बिना टिकट सफर करते हुए गया रेलवे स्टेशन पहुंच गए।
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अमृतसर में तलाशते रहे साथी, परिवार ने दर्ज कराई शिकायत
इधर, अमृतसर में जब श्रद्धालु वापस लौटने लगे तो चमन लाल उनके साथ नहीं मिले। साथियों ने परिजनों को सूचना दी। उनका पोता सुखचैन सिंह लुधियाना से अमृतसर पहुंचा और अपने स्तर पर दादा को खोजने लगा। परिवार ने पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई। बाकी श्रद्धालु वापस लौट आए, लेकिन सुखचैन कई दिन तक अमृतसर की गलियों और संभावित स्थानों पर दादा की तलाश करता रहा। गांव फतेहगढ़ गुजरां के लोगों ने भी सोशल मीडिया पर चमन लाल की तस्वीर साझा कर उनकी तलाश में मदद मांगी। दिन गुजरते गए, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। परिवार की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी।
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गया स्टेशन पर अकेले मिले, नीरज ने घर ले जाकर रखा
दूसरी तरफ गया रेलवे स्टेशन पर चमन लाल अकेले भटक रहे थे। इसी दौरान गया निवासी नीरज की नजर उन पर पड़ी। बुजुर्ग परेशान थे और खाने के लिए मांग रहे थे। नीरज ने पहले उन्हें खाना खिलाया और फिर अपने घर ले गए। चार दिन तक उन्होंने चमन लाल को अपने पास सुरक्षित रखा। नीरज ने कई बार उनसे घर का पता पूछा, लेकिन बुजुर्ग को सिर्फ अपने गांव का नाम याद था। वह पंजाबी बोल रहे थे। इससे नीरज को अंदाजा हुआ कि वह पंजाब के रहने वाले हैं।

गूगल मैप से नहीं मिली लोकेशन, चैटजीपीटी से मिला सुराग
नीरज ने ''फतेहगढ़ गुजरां'' नाम के आधार पर गूगल मैप पर गांव खोजने की कोशिश की, लेकिन सटीक स्थान का पता नहीं चल पाया। इसके बाद उन्होंने लगातार तीन दिन तक इंटरनेट पर अलग-अलग तरीके से जानकारी जुटाई और चैटजीपीटी की मदद ली। मिली जानकारी के आधार पर उन्हें पता चला कि फतेहगढ़ गुजरां गांव लुधियाना जिले में माछीवाड़ा साहिब के आसपास है।

तकनीक से मिले इस सुराग के बाद नीरज ने सिर्फ जानकारी देकर रुकने के बजाय बुजुर्ग को खुद उनके घर तक पहुंचाने का फैसला किया। वह चमन लाल को लेकर लुधियाना रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां से बस के जरिए माछीवाड़ा पहुंचे।

सोशल मीडिया पोस्ट ने भी जोड़ी आखिरी कड़ी
शनिवार को नीरज माछीवाड़ा में लोगों को चमन लाल की तस्वीर दिखाकर उनके बारे में पूछताछ कर रहे थे। इसी दौरान कुछ लोग सीनेट चुनाव की तैयारियों में जुटे थे। नीरज ने वहां मास्टर कृष्ण लाल को तस्वीर दिखाई। उन्होंने चमन लाल को तुरंत पहचान लिया, क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर उनके लापता होने की पोस्ट देखी थी। मास्टर कृष्ण लाल ने तत्काल चमन लाल के पोते सुखचैन सिंह को सूचना दी। खबर मिलते ही सुखचैन माछीवाड़ा पहुंच गए।

दादा को देखते ही रो पड़ा पोता, नीरज के पैरों में झुका
कई दिनों से जिस पल का परिवार इंतजार कर रहा था, वह सामने था। दादा को सुरक्षित देखते ही सुखचैन ने उन्हें गले लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगे। भावुक सुखचैन ने नीरज के पैर छूकर और हाथ जोड़कर उनका आभार जताया। परिवार के लिए यह सिर्फ एक गुमशुदा सदस्य के मिलने की खुशी नहीं थी, बल्कि अनजान प्रदेश में एक अजनबी द्वारा दिखाई गई इंसानियत का भी बड़ा उदाहरण था।

नीरज के मुताबिक, वह गया में कंस्ट्रक्शन का काम करते हैं। रास्ते में भटके या लाचार नजर आने वाले लोगों की मदद करना उनके लिए नया काम नहीं है। उन्होंने बताया कि नौवीं कक्षा में पढ़ने के समय से ही वह जरूरतमंद लोगों की मदद करते आ रहे हैं।

तकनीक ने जहां फतेहगढ़ गुजरां की पहचान तक पहुंचने में मदद की, वहीं सोशल मीडिया ने उस पहचान को सही परिवार से जोड़ने का काम किया। लेकिन इस पूरी कहानी की सबसे अहम कड़ी नीरज की वह पहल रही, जिसने एक अनजान बुजुर्ग को चार दिन अपने घर में सुरक्षित रखा और फिर खुद उसे परिवार तक पहुंचाया।
 
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