अमर उजाला युद्ध-नशे के विरुद्ध अभियान: एकजुट और जागरूक समाज तोड़ेगा नशे की चेन, संस्कार बनेंगे सुरक्षा कवच
अमर उजाला के युद्ध-नशे के विरुद्ध अभियान के तहत नशामुक्त हरियाणा की राह में चुनौतियां और समाधान विषय पर बुधवार को संवाद कार्यक्रम हुआ। इसमें अलग-अलग विभागों और संस्थाओं के विशेषज्ञों ने अपनी राय रखी।
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नशा सदियों से चली आ रही समस्या है। सरकार या कोई विभाग अकेले इसका खात्मा नहीं कर सकती। यह साझी जिम्मेदारी और लड़ाई है। लोगों को खुद जागरूक होना होगा और दूसरों को भी प्रेरित करना होगा। एकजुट और जागरूक समाज ही नशे को हरा सकता है। सबसे पहले हमें नशा बेचने वालों पर शिकंजा कसने के साथ नशा खरीदने वालों की संख्या कम करने पर काम करना होगा। जब नशे की मांग ही घटने लगेगी तो नशे की सप्लाई टूटने लगेगी। इसके अलावा समाज और परिवार को बच्चों में नशे के खिलाफ संस्कार पैदा करने होंगे। ये संस्कार ही नशे के खिलाफ युद्ध में सुरक्षा कवच का काम करेंगे। जब घर से ही बच्चों को नशे से दूर रहने के संस्कार मिलेंगे तो समाज में भी यही संदेश प्रचारित होगा और नशे के खिलाफ माहौल बनेगा। इससे नशे के सौदागरों का पूरा चेन सिस्टम ध्वस्त होगा।
जहां तक कानूनी पेचीदगियों की बात है तो नशे के कारोबार में लिप्त लोगों पर शिकंजा कसने के लिए एनडीपीएस एक्ट में बदलाव की जरूरत है और स्पेशल सेल नशे के खिलाफ काम करे तो यकीनन नशे के खिलाफ युद्ध में जीत हासिल होगी। अमर उजाला के युद्ध-नशे के विरुद्ध अभियान के तहत हुए बुधवार को पंचकूला के सेक्टर-1 स्थित पीडब्ल्यूडी विश्राम गृह के ऑडिटोरियम में नशामुक्त हरियाणा की राह में चुनौतियां व समाधान विषय पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने ये विचार रखे। कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ और अधिकारी शामिल हुए।
नशे से घृणा करें, नशा करने वाले से नहीं : डॉ. ब्रह्मदीप
नशे से घृणा करनी चाहिए, नशा करने वाले से नहीं, क्योंकि वे नशे के पीड़ित हैं। लेकिन समाज में उनको दुत्कार मिलती है, जबकि समाज का साथ मिलने से वे भी नशा छोड़कर मुख्य धारा में आ सकते हैं। नशे के आदि व्यक्ति के साथ एक बीमार व्यक्ति की तरह पेश आना चाहिए। नशामुक्ति केंद्रों में रहकर वे नशा छोड़ सकते हैं और ऐसे हजारों उदाहरण हैं। सबसे जरूरी है कि बच्चों पर माता-पिता न केवल नजर रखें, बल्कि लगातार उनके साथ संवाद करें। उन्हें बताएं कि नशे से दूर क्यों रहना है। अगर माता-पिता अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाएंगे तो यकीनन बच्चे नशे के पास नहीं जाएंगे। नशे के खिलाफ अभियान में खेल विभाग के साथ-साथ समाज कल्याण और शिक्षा विभाग को भी जोड़ना होगा। क्योंकि खेलों से फिर से संघर्ष कर जीत हासिल करने का हौसला मिलता है और युवा व्यस्त भी रहते हैं। हरियाणा को नशे से बचाने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे और ये रास्ते तलाश करने की शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी होगी। नशा छोड़ा जा सकता है, वे लोग आगे आएं, जिन्होंने नशा छोड़ा है। नशे को कभी प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। नशे को बढ़ावा देने वाले गानों और सोशल मीडिया से बचना होगा। पहले पुरुषों में ही नशे की बात थी, लेकिन आजकल महिलाएं भी नशा कर रही हैं। आज के समय में मोबाइल देखना भी नशा बन गया है। इसलिए मोबाइल से भी बच्चों को बचाना है। -डॉ. ब्रह्मदीप संधू, निदेशक, मेंटल हेल्थ हरियाणा।
सबका साथ मिले तो टूट जाएगी नशा सप्लाई चेन : पंखुड़ी
कानून की भाषा में नशा तस्करी को तीन श्रेणी में बांटा गया है। हरियाणा राज्य नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की तरफ से पिट एनडीपीएस एक्ट के तहत इस साल 63 तस्करों पर कार्रवाई की गई है। इस एक्ट के तहत नशा तस्करों पर शिकंजा कसने में देश में जम्मू कश्मीर के बाद हरियाणा दूसरे नंबर पर है। नशे के खिलाफ जंग में सफलता के लिए तस्करों की गिरफ्तारी और उन्हें सजा दिलाने के साथ नशा छोड़ने के लिए नशा पीड़ितों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। स्टॉफ की कमी के बावजूद प्रदेश की पुलिस हर चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है। नशा तस्करों पर शिकंजा कसा है, लेकिन यदि समाज और घर-परिवार का साथ मिले तो और नशे के खिलाफ और कड़ा प्रहार होगा। इस वर्ष बड़े नशा तस्करों के खिलाफ 40 फीसदी ज्यादा कार्रवाई हुई है और सजा मिलने की दर भी बढ़कर 53 फीसदी से अधिक हो गई है। इस वर्ष चार हजार से ज्यादा नशा तस्करों को सलाखों के पीछे पहुंचाया गया है। संयुक्त राष्ट्र के 2024 के आंकड़ों के अनुसार विश्वभर में 30 करोड़ से ज्यादा लोग ड्रग्स से प्रभावित हैं। हर राज्य में एंटी नारकोटिक्स टॉस्क फोर्स नहीं है, लेकिन हरियाणा में एंटी नारकोटिक्स टॉस्क फोर्स जिलास्तर पर भी सक्रिय है। आप सभी कंधे से कंधा मिलकर चलें तो नशे के खिलाफ परिवर्तन जरूर दिखेगा। -पंखुड़ी कुमार, एसपी, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो।
जब ग्राहक ही नहीं होंगे तो सप्लाई भी नहीं होगी : डॉ. अभिमन्यु
मैं अमृतसर से हूं और सुधरा हुआ नशेड़ी हूं। नशा युगों से चलता आ रहा है और ये युगों तक चलेगा। मुद्दा है नशे के खरीदार (ग्राहकों) को खत्म करने का। जब ग्राहक ही नहीं होंगे तो नशे की सप्लाई कहां होगी। इनके खिलाफ सरकार और विभागों की एक सीमित भूमिका है। जब तक हमारा समाज नशे के खिलाफ एकजुट होकर संकल्प नहीं लेगा, तब तक नशे को खत्म करना मुश्किल है। जब मैंने नशे दुष्परिणाम झेले तो मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण खुद पर लगे नशेड़ी के कलंक को हटाना था। दूसरे राज्यों की तुलना में हरियाणा में नशे के खिलाफ सरकार और सभी जिम्मेदार विभाग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन पुलिस, एनसीबी, स्वास्थ्य विभाग की भी एक सीमा है। मैं बीते 10 साल से पंचकूला में नशामुक्ति केंद्र चला रहा हूं। मैंने जमीनी स्तर पर पंजाब को भी देखा है और अब हरियाणा को देख रहा हूं। दोनों राज्यों में नशे के खिलाफ काम करने में काफी अंतर है। मैं पंजाब जाकर गर्व से कहता हूं कि हरियाणा में 10 साल में किसी अधिकारी या क्लर्क को एक रुपया देने की जरूरत नहीं पड़ी। मेरे साथी कहते हैं कि अमृतसर में भी नशामुक्ति केंद्र की एक शाखा खोल दूं, मगर मुझे पंजाब में शाखा खोलने में डर लगता है। -डॉ. अभिमन्यु रामपाल, मेहर फाउंडेशन संचालक।
जिंदगी में अपने लिए रास्ते खुद बनाने पड़ते हैं : हरमन सिद्धू
शराब पीकर गाड़ी चलाने से होने वाले हादसों में मौतों की संख्या एक बड़ा मुद्दा है। देश में रोजाना हर मिनट सड़क हादसे में एक मौत होती है, इसमें सबसे ज्यादा नौजवान हैं। देश में दिक्कत शराब से जुड़ें गानों से है, मगर हाईवे के किनारे शराब ठेकों से किसी को आपत्ति नहीं है। सभी हाईवे पर मानक के खिलाफ ठेके खुले हुए हैं। पूरे हरियाणा में ही 2400 से अधिक शराब ठेके हैं। लोग हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए शराब पीते है और हादसा करने के साथ खुद भी मौत का शिकार होते हैं। नशे के खिलाफ कहने और करने में फर्क है। नशे पर नियंत्रण करने की बात करने का मतलब शीशे के सामने खड़े होकर झूठ बोलने जैसा होगा। नशे के खिलाफ लड़ाई बहुत लंबी है, लेकिन जिंदगी में हर किसी को अपने लिए रास्ते खुद बनाने पड़ते हैं। यदि सभी लोग ठान लें तो नशे के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है। -हरमन सिद्धू, संस्थापक, अराइव सेफ संस्था।
होलसेलर से लेकर रिटेलर तक विभाग की निगरानी : तनेजा
दवाओं को दवा के रूप में लें तो यह अमृत हैं, लेकिन आज दवाइयों को भी नशे के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ये जहर के समान है। ये आपको-हमको तय करना है कि अमृत चुनना है या जहर। दवाओं का नशे के तौर पर प्रयोग किसी भी सूरत में नहीं करने दिया जाएगा। नशे के खिलाफ हरियाणा पुलिस और एनसीबी के साथ मिलकर औषधी नियंत्रण विभाग लगातार छापेमारी कर रहा है। दवाओं के थोक विक्रेता से लेकर फुटकर विक्रेता तक की विभाग निगरानी करता है। इस साल प्रतिबंधित दवाइयां बेचने और नियमों का उल्लंघन करने वाले 35 केमिस्ट के लाइसेंस रद्द किए गए और 37 के लाइसेंस निलंबित किए गए। आम जनता को भी चाहिए कि अगर कोई नशे के लिए दवाएं बेचता है तो ऐसे लोगों की शिकायत पुलिस और विभाग को दें। -मनमोहन तनेजा, औषधी नियंत्रक, हरियाणा।
एनडीपीएस केस की जांच के लिए पुलिस को प्रशिक्षण की जरूरत : राणा
नशा तस्कर पुलिस की कमजोर जांच और कमजोर पैरवी के चलते अदालत से छूट जाते हैं। पुलिस असल कहानी को बदलकर अपनी कहानी अदालत में पेश करती है, जिसका लाभ आरोपियों को मिलता है। क्योंकि पुलिस आरोपी को पकड़ती कहीं और से है और दिखाती कहीं और से है, लेकिन मोबाइल लोकेशन इसका सारा खुलासा कर देती है। इसलिए ही एनडीपीएस एक्ट के मामलों में सजा की प्रतिशतता कम है। आज जरूरत साइंटिफिक तरीके से जांच करने की है। नारकोटिक्स ब्यूरो और हरियाणा पुलिस के जांच अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देना होगा, तभी जाकर तस्करों की कड़ी सजा मिलेगी और वे पुलिस की कमियों का लाभ नहीं उठा पाएंगे। किसी को जेल भेजना समाधान नहीं है, लेकिन पुलिस पर दबाव होता है इसलिए वे किसी नशा करने वाले को भी जेल में भेज देते हैं और वहां अपराधियों के साथ रहकर उसके अपराधी बनने की आशंका अधिक रहती है। राणा ने मुख्य तस्कर तक पुलिस के नहीं पहुंचने पर भी सवाल उठाया। जहां से नशा चला वहां से आरोपियों की गिरफ्तारी होनी चाहिए। -अभिषेक राणा, अधिवक्ता, एनडीपीएस एक्ट के विशेषज्ञ।