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Amritsar News: सभी केंद्र... 33 साल पुराने फर्जी मुठभेड़ मामले में पूर्व एसपी को 10 साल की कैद, तीन बरी
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-सीबीआई कोर्ट ने 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया, सहआरोपी एएसआई की ट्रायल के दौरान हो चुकी है मौत
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संवाद न्यूज एजेंसी
मोहाली/अमृतसर। मोहाली स्थित सीबीआई अदालत ने बुधवार को 1993 के एक फर्जी मुठभेड़ मामले में अहम फैसला सुनाया। इस मामले में पंजाब पुलिस के पूर्व एसपी परमजीत सिंह (67) को 10 साल की कैद व 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इस मामले में सहआरोपी रहे एएसआई रामलुभाया की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है। अदालत ने इस मामले में पुलिस मुलाजिम धर्म सिंह, कश्मीर सिंह व दरबारा सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
उन पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब पुलिस में तैनात दो मुलाजिमों को घर से उठाया और अवैध हिरासत में रखा। बाद में एक फर्जी मुठभेड़ में मार कर शवों का लावारिस के रूप में अंतिम संस्कार कर दिया गया। बलजिंदर सिंह सरा की अदालत ने पूर्व इंस्पेक्टर परमजीत सिंह, तत्कालीन एसएचओ ब्यास को आईपीसी की धारा 343 यानी गलत तरीके से बंधक बनाने और आईपीसी की धारा 364 यानी हत्या के उद्देश्य से अपहरण करने का दोषी ठहराया।
सीबीआई के लोक अभियोजक अनमोल नारंग ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले की जांच की जिसमें पाया गया कि सुरमुख सिंह निवासी गांव मुच्छल तहसील बाबा बकाला (अमृतसर) पंजाब पुलिस में कांस्टेबल थे। उनको 18 अप्रैल 1993 को सुबह लगभग 6 बजे थाना ब्यास के तत्कालीन एसएचओ परमजीत सिंह के नेतृत्व वाली पुलिस पार्टी ने घर से उठा लिया था। उसी दिन दोपहर लगभग 2 बजे एक अन्य पुलिस कांस्टेबल सुखविंदर सिंह निवासी खेला (अमृतसर) को थाना ब्यास के तत्कालीन एसआई राम लुभाया के नेतृत्व में पुलिस पार्टी ने घर से उठाया था। सीबीआई जांच में यह भी पता चला कि अगले दिन यानी 19 अप्रैल 1993 को सुखविंदर सिंह की मां बलबीर कौर अपने पति दिलदार सिंह के साथ थाना ब्यास गई लेकिन राम लुभाया ने उन्हें सुखविंदर सिंह से मिलने की अनुमति नहीं दी।
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आतंकवादी बता मारा, लावारिस बता कर किया अंतिम संस्कार
22 अप्रैल, 1993 को जिला मजीठा पुलिस ने अमृतसर के लोपोके थाना के तत्कालीन एसएचओ धर्म सिंह के नेतृत्व में पुलिस पार्टी, सीआईए स्टाफ और सीआरपीएफ पार्टी के साथ मुठभेड़ में दो अज्ञात आतंकवादियों को मारने का दावा किया। इस संबंध में 23 अप्रैल 1993 को थाना लोपोके में मामला दर्ज किया गया। उनके शवों का लावारिस के रूप में अंतिम संस्कार कर दिया गया। हैरानी की बात है कि इस कथित मुठभेड़ मामले में एक सप्ताह के भीतर ही इंस्पेक्टर धर्म सिंह, तत्कालीन एसएचओ थाना लोपोके ने अनट्रेस रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उल्लेख किया गया कि शवों की पहचान नहीं की गई है और आगे जांच की कोई आवश्यकता नहीं है।
पुलिस ने दस्तावेजों में भी की हेराफेरी
सीबीआई जांच में यह साफ हुआ कि लोपोके पुलिस की ओर से 22 अप्रैल 1993 को मुठभेड़ में मारे गए दिखाए गए दो युवक वास्तव में सुखविंदर सिंह और सुरमुख सिंह थे। सीबीआई जांच में यह भी साबित हुआ कि मुठभेड़ को वास्तविक साबित करने के लिए पुलिस ने दस्तावेजों में हेराफेरी की थी। सीबीआई ने 26 दिसंबर 1995 को प्रारंभिक जांच दर्ज की। दिलदार सिंह की पत्नी बलबीर कौर ने आरोप लगाया कि उसके बेटे सुखविंदर सिंह की हत्या कर दी गई है। 28 फरवरी 1997 को मामला दर्ज किया गया। जांच में मुठभेड़ को फर्जी पाया गया। अब कोर्ट ने पूर्व एसपी को 10 साल की कैद की सजा सुनाई है जबकि तीन पुलिसकर्मी सबूतों के अभाव में बरी हो गए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
मोहाली/अमृतसर। मोहाली स्थित सीबीआई अदालत ने बुधवार को 1993 के एक फर्जी मुठभेड़ मामले में अहम फैसला सुनाया। इस मामले में पंजाब पुलिस के पूर्व एसपी परमजीत सिंह (67) को 10 साल की कैद व 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इस मामले में सहआरोपी रहे एएसआई रामलुभाया की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है। अदालत ने इस मामले में पुलिस मुलाजिम धर्म सिंह, कश्मीर सिंह व दरबारा सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
उन पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब पुलिस में तैनात दो मुलाजिमों को घर से उठाया और अवैध हिरासत में रखा। बाद में एक फर्जी मुठभेड़ में मार कर शवों का लावारिस के रूप में अंतिम संस्कार कर दिया गया। बलजिंदर सिंह सरा की अदालत ने पूर्व इंस्पेक्टर परमजीत सिंह, तत्कालीन एसएचओ ब्यास को आईपीसी की धारा 343 यानी गलत तरीके से बंधक बनाने और आईपीसी की धारा 364 यानी हत्या के उद्देश्य से अपहरण करने का दोषी ठहराया।
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सीबीआई के लोक अभियोजक अनमोल नारंग ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले की जांच की जिसमें पाया गया कि सुरमुख सिंह निवासी गांव मुच्छल तहसील बाबा बकाला (अमृतसर) पंजाब पुलिस में कांस्टेबल थे। उनको 18 अप्रैल 1993 को सुबह लगभग 6 बजे थाना ब्यास के तत्कालीन एसएचओ परमजीत सिंह के नेतृत्व वाली पुलिस पार्टी ने घर से उठा लिया था। उसी दिन दोपहर लगभग 2 बजे एक अन्य पुलिस कांस्टेबल सुखविंदर सिंह निवासी खेला (अमृतसर) को थाना ब्यास के तत्कालीन एसआई राम लुभाया के नेतृत्व में पुलिस पार्टी ने घर से उठाया था। सीबीआई जांच में यह भी पता चला कि अगले दिन यानी 19 अप्रैल 1993 को सुखविंदर सिंह की मां बलबीर कौर अपने पति दिलदार सिंह के साथ थाना ब्यास गई लेकिन राम लुभाया ने उन्हें सुखविंदर सिंह से मिलने की अनुमति नहीं दी।
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आतंकवादी बता मारा, लावारिस बता कर किया अंतिम संस्कार
22 अप्रैल, 1993 को जिला मजीठा पुलिस ने अमृतसर के लोपोके थाना के तत्कालीन एसएचओ धर्म सिंह के नेतृत्व में पुलिस पार्टी, सीआईए स्टाफ और सीआरपीएफ पार्टी के साथ मुठभेड़ में दो अज्ञात आतंकवादियों को मारने का दावा किया। इस संबंध में 23 अप्रैल 1993 को थाना लोपोके में मामला दर्ज किया गया। उनके शवों का लावारिस के रूप में अंतिम संस्कार कर दिया गया। हैरानी की बात है कि इस कथित मुठभेड़ मामले में एक सप्ताह के भीतर ही इंस्पेक्टर धर्म सिंह, तत्कालीन एसएचओ थाना लोपोके ने अनट्रेस रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उल्लेख किया गया कि शवों की पहचान नहीं की गई है और आगे जांच की कोई आवश्यकता नहीं है।
पुलिस ने दस्तावेजों में भी की हेराफेरी
सीबीआई जांच में यह साफ हुआ कि लोपोके पुलिस की ओर से 22 अप्रैल 1993 को मुठभेड़ में मारे गए दिखाए गए दो युवक वास्तव में सुखविंदर सिंह और सुरमुख सिंह थे। सीबीआई जांच में यह भी साबित हुआ कि मुठभेड़ को वास्तविक साबित करने के लिए पुलिस ने दस्तावेजों में हेराफेरी की थी। सीबीआई ने 26 दिसंबर 1995 को प्रारंभिक जांच दर्ज की। दिलदार सिंह की पत्नी बलबीर कौर ने आरोप लगाया कि उसके बेटे सुखविंदर सिंह की हत्या कर दी गई है। 28 फरवरी 1997 को मामला दर्ज किया गया। जांच में मुठभेड़ को फर्जी पाया गया। अब कोर्ट ने पूर्व एसपी को 10 साल की कैद की सजा सुनाई है जबकि तीन पुलिसकर्मी सबूतों के अभाव में बरी हो गए।