{"_id":"66aa5a910d11500f820564a3","slug":"administration-forgot-mohammed-rafis-death-anniversary-no-program-was-organized-on-his-death-anniversary-amritsar-news-c-59-1-asr1001-107269-2024-07-31","type":"story","status":"publish","title_hn":"Amritsar News: मोहम्मद रफी की पुण्य तिथि को भूला प्रशासन, पुण्यतिथि पर नहीं हुआ कार्यक्रम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Amritsar News: मोहम्मद रफी की पुण्य तिथि को भूला प्रशासन, पुण्यतिथि पर नहीं हुआ कार्यक्रम
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
-बड़ी यादगार स्थापित करने के लिए गांव निवासी जमीन देने के लिए भी तैयार
-- -
संवाद न्यूज एजेंसी
अमृतसर। जिले के गांव कोटला सुल्तान सिंह के जर्रे जर्रे में मोहम्मद रफी के नगमे गूंजते हैंट। रफी को शहंशाह-ए-तरन्नुम के नाम से भी जाना जाता है। आज भी रफी की आवाज में गाए गीत लोगों की रूह को सुकून देते है। रफी इस गांव में कव्वालों के साथ सुर मिलाते थे। वहीं से उनको संगीत की धुन लग गई और रफी सुरों के शहंशाह बन गए।
31 जुलाई को रफी की पुण्यतिथि थी। उनके गांव कोटला सुल्तानसिंह यहां उनका जन्म हुआ था। कुछ स्वयं सेवी संगठनों ने गांव वासियों के साथ मिल कर उनको याद किया, लेकिन वहां जिला प्रशासन व राजनेताओं ने उन्हें भुला दिया। पहले कई वर्षों तक गांव कोटला सुल्तानसिंह में रफी की याद में सरकारी कार्यक्रम होता रहा है। इस बार कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं हुआ। कोई बड़ा अधिकारी और नेता भी उनको श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा।
रफी के गीत... मेरी कहानी भूलने वाले तेरा जहां आबाद रहे, तेरी खुशी पर मैं मिट जांऊ दुनिया मेरी बर्बाद रहे... आज वास्तविकता में चरितार्थ हो गया। गांव वासियों का कहना है कि मोहम्मद रफी ने गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में चौथी तक शिक्षा ग्रहण की थी। स्कूल में उनकी एक आधा पुरानी तस्वीर के अलावा और कोई निशानी मौजूद नहीं है। यह तस्वीर भी रफी साहब के किसी प्रशंसक ने बनाकर स्कूल में लगवाई थी।
विज्ञापन
गांव में लगाई गई है प्रतिमा
मोहम्मद रफी के प्रशंसक अमृतसर के रहने वाले राजन शर्मा अपने कुछ मित्रों के साथ यहां आए। राजन ने बताया कि वह प्रतिवर्ष यहां आते हैं। गांव कोटला में दशमेश स्कूल है, जहां 2012 में पंजाब सरकार की ओर से रफी साहब की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यहां प्रतिवर्ष आकर उन्हें श्रद्धा के पुष्प अर्पित करते हैं। दशमेश स्कूल के प्रिंसिपल विनोद शर्मा ने कहा कि हम अपने स्तर पर हर वर्ष यहां रफी साहिब के जन्मदिवस एवं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि भेंट करते हैं। कोटला सुल्तान में रफी का दो कमरों का मकान मिट्टी और लकड़ी के तख्तों से निर्मित था। करीब 125 वर्ग गज में बना यह मकान काफी खस्ताहाल था। 1935 में जब उनका परिवार लाहौर गया तो यह मकान हरदीप सिंह के दादा लक्ष्मण सिंह ने खरीदा था। घर के आगे छोटा सा आंगन भी हुआ था, जो अब भी है, लेकिन घर पूरी तरह उखाड़ कर दोबारा बनाया गया है। हालांकि वह कमरा यथावत है जिसमें रफी रहा करते थे।
जिस स्कूल में पढ़े, वहां रफी के नाम का कमरा
अपनी मीठी और दिल में उतर जाने वाली सुरीली आवाज में अनगिनत गीतों से रफी ने भारत के जन-जन के मन में स्थान बनाया। 24 दिसंबर, 1924 को पंजाब के अमृतसर जिले के मजीठा का गांव कोटला सुल्तान में इस आवाज वाले गायक का जन्म हुआ। उनकी यादगार के नाम पर स्कूल का कमरा है, जहां वह पढ़े थे। गांव उन्हें अभी नहीं भुला पाया है। अली मोहम्मद के घर 24 दिसंबर, 1924 को रफी का जन्म हुआ था। छह बहन-भाइयों में रफी के बचपन का नाम फीकू था। गांव निवासियों अमरीक सिंह, मंजीत सिंह और दर्शन का कहना है कि गांव में उनकी बड़ी यादगार बननी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद रखें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। हम सरकारों को इस के लिए जमीन देने के लिए तैयार हैं । गांव वासी चाहते हैं कि रफी जी को भारत रत्न दिया जाए।
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
अमृतसर। जिले के गांव कोटला सुल्तान सिंह के जर्रे जर्रे में मोहम्मद रफी के नगमे गूंजते हैंट। रफी को शहंशाह-ए-तरन्नुम के नाम से भी जाना जाता है। आज भी रफी की आवाज में गाए गीत लोगों की रूह को सुकून देते है। रफी इस गांव में कव्वालों के साथ सुर मिलाते थे। वहीं से उनको संगीत की धुन लग गई और रफी सुरों के शहंशाह बन गए।
31 जुलाई को रफी की पुण्यतिथि थी। उनके गांव कोटला सुल्तानसिंह यहां उनका जन्म हुआ था। कुछ स्वयं सेवी संगठनों ने गांव वासियों के साथ मिल कर उनको याद किया, लेकिन वहां जिला प्रशासन व राजनेताओं ने उन्हें भुला दिया। पहले कई वर्षों तक गांव कोटला सुल्तानसिंह में रफी की याद में सरकारी कार्यक्रम होता रहा है। इस बार कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं हुआ। कोई बड़ा अधिकारी और नेता भी उनको श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा।
विज्ञापन
रफी के गीत... मेरी कहानी भूलने वाले तेरा जहां आबाद रहे, तेरी खुशी पर मैं मिट जांऊ दुनिया मेरी बर्बाद रहे... आज वास्तविकता में चरितार्थ हो गया। गांव वासियों का कहना है कि मोहम्मद रफी ने गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में चौथी तक शिक्षा ग्रहण की थी। स्कूल में उनकी एक आधा पुरानी तस्वीर के अलावा और कोई निशानी मौजूद नहीं है। यह तस्वीर भी रफी साहब के किसी प्रशंसक ने बनाकर स्कूल में लगवाई थी।
विज्ञापन
गांव में लगाई गई है प्रतिमा
मोहम्मद रफी के प्रशंसक अमृतसर के रहने वाले राजन शर्मा अपने कुछ मित्रों के साथ यहां आए। राजन ने बताया कि वह प्रतिवर्ष यहां आते हैं। गांव कोटला में दशमेश स्कूल है, जहां 2012 में पंजाब सरकार की ओर से रफी साहब की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यहां प्रतिवर्ष आकर उन्हें श्रद्धा के पुष्प अर्पित करते हैं। दशमेश स्कूल के प्रिंसिपल विनोद शर्मा ने कहा कि हम अपने स्तर पर हर वर्ष यहां रफी साहिब के जन्मदिवस एवं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि भेंट करते हैं। कोटला सुल्तान में रफी का दो कमरों का मकान मिट्टी और लकड़ी के तख्तों से निर्मित था। करीब 125 वर्ग गज में बना यह मकान काफी खस्ताहाल था। 1935 में जब उनका परिवार लाहौर गया तो यह मकान हरदीप सिंह के दादा लक्ष्मण सिंह ने खरीदा था। घर के आगे छोटा सा आंगन भी हुआ था, जो अब भी है, लेकिन घर पूरी तरह उखाड़ कर दोबारा बनाया गया है। हालांकि वह कमरा यथावत है जिसमें रफी रहा करते थे।
जिस स्कूल में पढ़े, वहां रफी के नाम का कमरा
अपनी मीठी और दिल में उतर जाने वाली सुरीली आवाज में अनगिनत गीतों से रफी ने भारत के जन-जन के मन में स्थान बनाया। 24 दिसंबर, 1924 को पंजाब के अमृतसर जिले के मजीठा का गांव कोटला सुल्तान में इस आवाज वाले गायक का जन्म हुआ। उनकी यादगार के नाम पर स्कूल का कमरा है, जहां वह पढ़े थे। गांव उन्हें अभी नहीं भुला पाया है। अली मोहम्मद के घर 24 दिसंबर, 1924 को रफी का जन्म हुआ था। छह बहन-भाइयों में रफी के बचपन का नाम फीकू था। गांव निवासियों अमरीक सिंह, मंजीत सिंह और दर्शन का कहना है कि गांव में उनकी बड़ी यादगार बननी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद रखें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। हम सरकारों को इस के लिए जमीन देने के लिए तैयार हैं । गांव वासी चाहते हैं कि रफी जी को भारत रत्न दिया जाए।