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तस्वीरों में काशी के 12 सूर्य देव: कहीं यमराज ने तो कहीं भगवान विष्णु ने किए थे स्थापित, अद्भुत है मान्यता

Sun, 19 Nov 2023 05:33 PM IST
किरन रौतेला आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Sun, 19 Nov 2023 05:33 PM IST
सार

काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सदस्य पं. दीपक मालवीय ने बताया कि संतति की कामना व आरोग्य के लिए सूर्य षष्ठी (डाला छठ) में भगवान भास्कर की पूजा होती है। यह व्रत सर्वप्रथम द्वापर में माता कुंती ने किया था।

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12 Sun Gods of Varanasi in pictures: Some were installed by Yamraj and some by Lord Vishnu
लोलार्क कुंड - फोटो : अमर उजाला

शिव की नगरी काशी में लोक कल्याण के लिए द्वादश आदित्य भी विराजमान हैं। भदैनी से लेकर अलईपुरा तक ये द्वादश आदित्य के मंदिर स्थापित है। काशी खंड के अनुसार मंदिरों को कई देवताओं ने प्रतिष्ठित किए हैं। लोक मान्यता है कि काशी में भगवान सूर्य की किरणें सबसे पहले लोलार्क कुंड में ही पड़ती है और इसी कुंड में सूर्य का चक्र भी गिरा था। काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सदस्य पं. दीपक मालवीय ने बताया कि संतति की कामना व आरोग्य के लिए सूर्य षष्ठी (डाला छठ) में भगवान भास्कर की पूजा होती है। यह व्रत सर्वप्रथम द्वापर में माता कुंती ने किया था। वस्तुतः सूर्योपासना की परंपरा हमारे यहां वैदिक काल से है। सनातन धर्म में प्रत्यक्ष देव स्वरूप में भगवान सूर्य का पूजन होता है। काशी में तो भगवान भास्कर के बारह स्वरूपों की पूजा होती है। पेश है आलोक कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट

12 Sun Gods of Varanasi in pictures: Some were installed by Yamraj and some by Lord Vishnu
विमलादित्य मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया
लोलार्कादित्य

लोलार्क कुंड-भदैनी


काशी में सर्वप्रथम लोलार्कादित्य ने प्रवेश किया। मान्यता है कि भगवान शिव की आज्ञा से जब वह काशी में आए तो उनका मन मुग्ध हो गया और वह यहीं वस गए। सर्वप्रथम प्रतिष्ठित मंदिर मूर्ति का नाम लोलार्क पड़ा और समीपस्थ कुंड का नाम लोलार्क है।

विमलादित्य

जंगमबाड़ी-खारी कुआं काशी खंड के अनुसार विमलादित्य दर्शन करने वालों के समस्त दुखों को दूर करने वाले हैं। मान्यता है कि भगवान सूर्य यहां पर विराजते हैं। भक्तों पर अपना आशीष बरसाते रहते हैं।

सांबादित्य सूरज कुंड

कृष्ण पुत्र सांब को काशी में जिस स्थान पर मुक्ति मिली वहीं पर सांवादित्य का मंदिर विराजमान है। सूरज कुंड मोहल्ले में सांवादित्य का मंदिर सूर्य मंदिर के पास है। 50-60 साल पहले चर्मरोग से मुक्ति पाने के लिए वर्ष पर्यंत सूरजकुंड में लोग स्नान किया करते थे।

 
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उत्तरार्क का मंदिर, बकरिया कुंड - फोटो : सोशल मीडिया
उत्तरार्कादित्य

बकरिया कुंड - अलईपुर


उत्तरार्क का मंदिर, बकरियाकुंड के पास है। कुंड का नाम अर्ककुंड भी है। पूस माह के रविवार को वहां मेला लगता है। गाजीमियां के व्याह का उत्सव भी यहां जेठ माह के एक रविवार को हिंदू- मुसलमान मनाते हैं।

केशवादित्य आदिकेशवघाट

भगवान सूर्य ने इसी स्थान पर आदिकेशव को अपना गुरु मानकर आराधना शुरू की थी। काशी खंड के अनुसार जो व्यक्ति पादोदक तीर्थ में स्नान करके केशव आदित्य की पूजा करता है, उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है।

खखोलादित्य  कामेश्वर गली

खखोलादित्य का • संबंध कद्दू और विनता की कहानी से जुड़ा हुआ है। कद्दू की दासी बनने के बाद विनता ने खखोलख आदित्य के रूप में भगवान सूर्य की आराधना की थी।

 
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मयूखादित्य - फोटो : सोशल मीडिया
अरुणादित्य त्रिलोचन महादेव मंदिर 
विनता के पुत्र अरुण ने भगवान आदित्य की मूर्ति स्थापना और तपस्या से प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया। सूर्य ने वर दिया कि जिस मूर्ति की स्थापना कर तपस्या की, वह अरुणादित्य से विख्यात रहेगी

मयूखादित्य

सूर्य ने इसी स्थान पर काशी में तपस्या की थी। शिव और पार्वती ने तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान आदित्य को वरदान दिया कि जो भी भक्त रविवार कोमयूखादित्य की पूजा करेगा वह कभी बीमार नहीं पड़ेगा।

मंगलागौरी मंदिर
यमादित्य संकठा घाट


यमघाट पर यमराज ने तपस्या की थी। उन्होंने यमेश्वर शिव और यमादित्य नाम की सूर्य की भी मूर्तियां स्थापित की थीं। मंगल को चतुर्दशी तिथि पड़ने पर यमघाट में स्नान और यमेश्वर एवं यमादित्य के दर्शन से अशेष पापों से मुक्ति तथा यमयातना से छुटकारा मिलता है।

 
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गंगादित्य ललिता घाट - फोटो : संवाद
गंगादित्य ललिता घाट

काशी खंड के अनुसार जब राजा भगीरथ के का अनुसरण करती हुई गंगा वाराणसी पहुंची, तब गंगा की स्तुति करने के लिए सूर्य वहीं पहुंचे और आज तक रहकर गंगा स्तुति करते रहते हैं।

वृद्धादित्य मीरघाट

वृद्धहारीत नामक ब्राह्मण ने विशालाक्षी देवी के दक्षिण और सूर्य की प्रतिमा स्थापित कर पूजन और तपस्या करने लगा सूर्य ने प्रसन्न होकर वृद्ध हारीत को सौंदर्यपूज तारुण्य का चर दे दिया।

द्रौपदादित्य अक्षय बट के पास

तत्कालीन विश्वनाथ मंदिर के दक्षिण की और दंडपाणि मूर्ति के पास संभवतः हनुमान मंदिर में अक्षयवट के नीचे द्रौपदादित्य की प्रतिमा विद्यमान थी जो अब वर्तमान में नवनिर्मित शिव कचहरी में विराजमान हैं।
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